रमज़ानुल मुबारक का मुकद्दस महीना इबादतों और रहमतों की बहार लेकर आता है। इस महीने में रोज़ा रखने के साथ-साथ रातों को कयाम करना यानी 20 रकात तरावीह की नमाज़ अदा करना बेहद अफ़ज़ल और सुन्नत-ए-मुअक्कदा इबादत है। अक्सर ख़वातीन (महिलाओं) के ज़हन में यह सवाल रहता है कि घर पर औरतों के लिए तरावीह की नमाज़ की नियत (Taraweeh Ki Namaz Ki Niyat For Female In Hindi) कैसे की जाती है, औरतों की नमाज़ का तरीका मर्दों से कैसे अलग है, और 20 रकात में कौन-सी सूरह पढ़ी जाएं।
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तालीमात के मुताबिक़ औरतों के लिए मस्जिद के मुकाबले अपने घर के अंदरूनी व पुरसुकून हिस्से में नमाज़ पढ़ना ज़्यादा बाइस-ए-सवाब करार दिया गया है। इस मुकम्मल गाइड में हम औरतों के लिए तरावीह की नियत, 2-2 रकात अदा करने का शरई तरीका, सजदा व रुकू की ख़ास कैफियत, सूरह तरावीह की तरतीब, तरावीह की दुआ और औरतों से मुताल्लिक़ ज़रूरी शरई मसाइल को आसान हिंदी में तफ़सील से जानेंगे।
अहम शरई उसूल: तरावीह की नमाज़ मर्द और औरत दोनों के लिए सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। ख़वातीन इसे अपने घरों में तन्हा (अकेले) 2-2 रकात करके कुल 20 रकात अदा करेंगी। इसके बाद 3 रकात वित्र की नमाज़ भी तन्हा अदा की जाएगी।
औरतों के लिए तरावीह की नमाज़ की नियत (Taraweeh Ki Niyat For Ladies In Hindi)
नियत दरअसल दिल के पक्के इरादे का नाम है। नमाज़ शुरू करते वक़्त दिल में यह यक़ीन होना काफ़ी है कि आप अल्लाह की रज़ा के लिए रमज़ान की 2 रकात सुन्नत तरावीह पढ़ रही हैं। लेकिन ज़बान से भी नियत के अलफ़ाज़ दोहरा लेना मुस्तहब (बेहतर) है ताकि दिल और ज़बान दोनों में यकसूई पैदा हो सके।
तरावीह की नियत हिंदी में (Hindi Niyat):
“नियत की मैंने 2 रकात नमाज़ तरावीह की, सुन्नत-ए-रसूलुल्लाह, वास्ते अल्लाह तआला के, वक़्त इशा का, रुख मेरा काबा शरीफ़ की तरफ, अल्लाहु अकबर।”
तरावीह की नियत रोमन इंग्लिश में (Transliteration):
“Niyat ki maine 2 rakat namaz taraweeh ki, Sunnat-e-Rasoolullah, waaste Allah Ta’ala ke, waqt Isha ka, rukh mera Kaaba shareef ki taraf, Allahu Akbar.”
तरावीह की नियत अरबी में (Arabic Niyat):
نَوَيْتُ أَنْ أُصَلِّيَ لِلّٰهِ تَعَالَى رَكْعَتَيْ صَلَاةِ التَّرَاوِيْحِ سُنَّةَ رَسُوْلِ اللّٰهِ مُتَوَجِّهًا إِلَى جِهَةِ الْكَعْبَةِ الشَّرِيْفَةِ، اَللّٰهُ أَكْبَرُ
ध्यान रहे: 20 रकात तरावीह 2-2 रकात करके 10 सलामों के साथ पढ़ी जाती है। हर 2 रकात की शुरुआत में यही नियत की जाएगी।
औरतों की नमाज़ के ख़ास अरकान व अंदाज़ (Hanafi Fiqh)
शरीअत-ए-इस्लामिया में ख़वातीन की हया, पर्दा और जिस्मानी नज़ाकत को मद्देनज़र रखते हुए नमाज़ के अरकान में मर्दों के मुक़ाबले कुछ मुतअय्यन फर्क रखे गए हैं। हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ औरतों को अपनी नमाज़ में इन 5 ख़ास बातों की पाबंदी करनी चाहिए:
- तकबीर-ए-तहरीमा में हाथ उठाना: औरतें हाथ कानों तक नहीं उठाएंगी, बल्कि दोनों हाथों को अपनी चादर या दुपट्टे के अंदर रखते हुए सिर्फ सीने या कांधों की सीध तक उठाएंगी।
- हाथ बांधने का मकाम (क़ियाम): तकबीर कहकर दाहिने हाथ की हथेली को बाएं हाथ की पुश्त पर सीने के ऊपर रखेंगी (मर्दों की तरह नाफ़ के नीचे नहीं बांधना है)।
- रुकू की कैफियत: रुकू में बहुत ज़्यादा नहीं झुकना है, बल्कि सिर्फ इतना झुकेंगी कि दोनों हाथ घुटनों तक आसानी से पहुंच जाएं। उंगलियों को मिलाकर घुटनों पर रखेंगी, कुहनियों को पसलियों से सटा कर रखेंगी और घुटने हल्के मुड़े रहेंगे।
- सजदे की कैफियत (सिमट कर सजदा): सजदे में औरतें पूरी तरह सिमट कर झुकेंगी। पेट दोनों रानों (जांघों) से मिला रहेगा, दोनों कुहनियां ज़मीन पर बिछी रहेंगी और बगलें बंद रहेंगी। पैर खड़े रखने के बजाय दाहिनी तरफ निकाल कर बिछा दिए जाएंगे।
- क़ादा में बैठने का तरीका (तवर्रुक): दोनों पैरों को दाहिनी तरफ बाहर निकालकर बाएं कूल्हे (सुर्रीन) के बल ज़मीन पर बैठेंगी। दोनों हाथों को रानों पर उंगलियां मिलाकर सीधा रखेंगी।

घर पर औरतों की तरावीह की नमाज़ का स्टेप-बाय-स्टेप तरीका (20 रकात)
इशा के 4 रकात फ़र्ज़ और 2 रकात सुन्नत अदा करने के बाद तरावीह की 20 रकात नमाज़ शुरू की जाती है। इसका तरीका आम 2 रकात नफ़्ल या सुन्नत नमाज़ की तरह ही है:
पहली रकात:
- किबला रुख खड़ी होकर तरावीह की नियत करें और दोनों हाथ सीने तक उठाकर “अल्लाहु अकबर” कहते हुए सीने पर बांध लें।
- सना पढ़ें: “सुब्हाना कल्लाहुम्मा व बिहम्दिका व तबारकस्मुका व तआला जद्दुका व ला इलाहा गैरुक।”
- तअव्वुज़ (अऊज़ु बिल्लाहि मिनश शैतानिर रजीम) और तस्मिया (बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम) पढ़ें।
- सूरह अल-फ़ातिहा (अलहम्दु शरीफ़) पढ़ें और आहिस्ता आवाज़ में “आमीन” कहें।
- क़ुरआन मजीद की कोई भी सूरह (जैसे सूरह अल-फ़ील) पढ़ें।
- “अल्लाहु अकबर” कहते हुए रुकू में जाएं और 3 बार “सुब्हाना रब्बियल अज़ीम” कहें।
- “समिअल्लाहु लिमन हमिदह” कहते हुए सीधी खड़ी हों और कहें “रब्बना लकल हम्द”।
- “अल्लाहु अकबर” कहते हुए सिमट कर सजदे में जाएं और 3 बार “सुब्हाना रब्बियल आला” कहें।
- तकबीर कहते हुए बैठकर जलसा करें, फिर दूसरा सजदा उसी तरह मुकम्मल करें।
दूसरी रकात:
- तकबीर कहते हुए दूसरी रकात के लिए खड़ी हो जाएं।
- बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह फ़ातिहा पढ़ें, फिर कोई दूसरी सूरह (जैसे सूरह कुरैश) मिलाएँ।
- रुकू और दोनों सजदे पहली रकात की तरह मुकम्मल करें।
- दूसरे सजदे के बाद क़ादा में तवर्रुक की कैफियत से बैठें।
- अत्तहिय्यात (तशह्हुद) पढ़ें, कलिमा-ए-शहादत पर शहादत की उंगली से इशारा करें और नीचे गिरा लें।
- दुरूद-ए-इब्राहिमी और दुआ-ए-मासूरा पढ़ें।
- पहले दाएं कंधे की तरफ “अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह” कहें, फिर बाएं कंधे की तरफ सलाम फेर दें।
इस तरह आपकी 2 रकात मुकम्मल हुईं। इसी तरह 2-2 रकात करके कुल 10 सलामों में 20 रकात तरावीह पूरी करनी है।
सूरह तरावीह का आसान चार्ट (आख़िरी 10 सूरतों की तरतीब)
जो ख़वातीन पूरा क़ुरआन हिफ़्ज़ नहीं रखती हैं, उनके लिए सबसे आसान और मारूफ़ तरीका यह है कि वे क़ुरआन मजीद की आख़िरी 10 सूरतों (सूरह अल-फ़ील से सूरह अन-नास तक) को तरतीबवार पढ़ें। पहले 10 रकात में इन 10 सूरतों को पढ़ा जाता है, और फिर अगली 10 रकात में इन्हीं को दोबारा दोहराया जाता है:
| जोड़ा (सलाम) | रकात संख्या | पहली 10 रकात की सूरह | दूसरी 10 रकात की सूरह |
|---|---|---|---|
| पहला सलाम | रकात 1 व 2 | सूरह अल-फ़ील (105) व सूरह कुरैश (106) | सूरह अल-फ़ील व सूरह कुरैश |
| दूसरा सलाम | रकात 3 व 4 | सूरह अल-माऊन (107) व सूरह अल-कौसर (108) | सूरह अल-माऊन व सूरह अल-कौसर |
| तीसरा सलाम | रकात 5 व 6 | सूरह अल-काफ़िरून (109) व सूरह अन-नस्र (110) | सूरह अल-काफ़िरून व सूरह अन-नस्र |
| चौथा सलाम | रकात 7 व 8 | सूरह अल-लहब (111) व सूरह अल-इख़्लास (112) | सूरह अल-लहब व सूरह अल-इख़्लास |
| पांचवां सलाम | रकात 9 व 10 | सूरह अल-फ़लक़ (113) व सूरह अन-नास (114) | सूरह अल-फ़लक़ व सूरह अन-नास |
नोट: यदि किसी ख़ातून को ये सभी 10 सूरह याद न हों, तो वे जो भी सूरह याद हों (जैसे सूरह इख़्लास, सूरह कौसर, सूरह नास), उन्हें हर रकात में बार-बार दोहराकर भी अपनी 20 रकात मुकम्मल कर सकती हैं। नमाज़ दुरुस्त हो जाएगी।
तरावीह की तस्बीह और दुआ (हर 4 रकात के बाद)
तरावीह का लफ़्ज़ ‘तरवीहा’ से बना है जिसका मतलब है आराम करना। हर 4 रकात (यानी दो सलाम) मुकम्मल होने पर थोड़ी देर बैठकर आराम करना और अल्लाह की हम्द व सना करना मुस्तहब है। इस वक़्फ़े में मशहूर तरावीह की तस्बीह पढ़ी जाती है:
तरावीह की दुआ अरबी में:
سُبْحَانَ ذِي الْمُلْكِ وَالْمَلَكُوْتِ، سُبْحَانَ ذِي الْعِزَّةِ وَالْعَظَمَةِ وَالْهَيْبَةِ وَالْقُدْرَةِ وَالْكِبْرِيَاءِ وَالْجَبَرُوْتِ، سُبْحَانَ الْمَلِكِ الْحَيِّ الَّذِيْ لَا يَنَامُ وَلَا يَمُوْتُ، سُبُّوْحٌ قُدُّوْسٌ رَبُّنَا وَرَبُّ الْمَلَائِكَةِ وَالرُّوْحِ، لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ نَسْتَغْفِرُ اللّٰهَ نَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَنَعُوْذُ بِكَ مِنَ النَّارِ۔
तरावीह की दुआ हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration):
“सुब्हाना ज़िल मुल्कि वल मलकूत, सुब्हाना ज़िल इज़्ज़ति वल अज़मति वल हयबति वल कुदरति वल किबरिया-इ वल जबरूत, सुब्हानल मलिकिल हय्यिल लज़ी ला यनामु व ला यमूत, सुब्बुहुन कुद्दूसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति वर-रूह, ला इलाहा इल्लल्लाहु नस्तग़फिरुल्लाह, नसअलुकल जन्नता व नऊज़ु बिका मिनन-नार।”
तरावीह की दुआ का हिंदी तर्जुमा (Meaning):
“पाक है वह ज़ात जो ज़मीन और आसमान की बादशाही वाली है। पाक है वह ज़ात जो इज़्ज़त, बुज़ुर्गी, हैबत, क़ुदरत, बड़ाई और दबदबे वाली है। पाक है वह हक़ीक़ी बादशाह जो ज़िंदा है, जिसे न कभी नींद आती है और न मौत। वह निहायत पाकीज़ा और बेऐब है, जो हमारा रब है और फ़रिश्तों और जिब्रील का रब है। अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, हम अल्लाह से बख़्शिश मांगते हैं, तुझसे जन्नत का सवाल करते हैं और दोज़ख़ की आग से तेरी पनाह चाहते हैं।”
औरतों की तरावीह से जुड़े अहम शरई मसाइल व अहकाम
ख़वातीन को तरावीह अदा करते वक़्त इन मुतअल्लिक़ा शरई मसाइल का इल्म होना ज़रूरी है:
- क्या औरतें आपस में जमाअत बना सकती हैं? हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ औरतों की अपनी अलग जमाअत बनाना और किसी औरत का इमामत कराना मकरूह-ए-तहरीमी है। लिहाज़ा हर ख़ातून को अपने घर पर अकेले (तन्हा) ही तरावीह अदा करनी चाहिए।
- क्या घर के महरम मर्द की इमामत में पढ़ सकती हैं? हाँ, अगर घर में बाप, भाई या शौहर तरावीह पढ़ा रहे हों, तो घर की औरतें उनकी पुश्त (पीछे) अलग सफ़ में पर्दा कायम रखते हुए जमाअत में शरीक हो सकती हैं।
- हैज़ (माहवारी/Periods) के दौरान तरावीह का हुक्म: माहवारी या निफ़ास की हालत में औरतों के लिए नमाज़ और रोज़ा दोनों माफ़ हैं। इन दिनों छूटी हुई तरावीह की कोई कज़ा नहीं होती। पाकी हासिल करने के बाद अगले दिनों की तरावीह जारी रखें।
- क़ुरआन देखकर पढ़ने का हुक्म: हनफ़ी मसलक के मुताबिक़ नमाज़ की हालत में मुसहफ़ (क़ुरआन मजीद) खोलकर देखकर पढ़ना नमाज़ को फ़ासिद (बातिल) कर देता है। इसलिए जो सूरह ज़बानी याद हों, वही पढ़ी जाएं।
- वित्र की नमाज़ कब पढ़ें? तरावीह की पूरी 20 रकात मुकम्मल करने के बाद 3 रकात वित्र वाजिब दुआ-ए-कुनूत के साथ तन्हा अदा करें।
नमाज़ और इबादत से मुताल्लिक़ दीगर मुफ़ीद मक़ालात:
- तरावीह की नमाज़ की नियत और मुकम्मल तरीका (20 रकात व दुआ)
- सलातुत तस्बीह की नमाज़ का तरीका और तस्बीह के कलिमात
- तहियतुल वज़ू की नमाज़ का सही तरीका, नियत और फ़ज़ीलत
- आयत ए खमसा हिंदी में तर्जुमा सहित (क़ुरआन मजीद की 5 मुबारका आयतें)
- औरतों के लिए जुमा की नमाज़ का तरीका, नियत और रकात
- ग़ुस्ल की दुआ, नियत और तरीका (3 फ़र्ज़ व मुकम्मल पाकी)
- ईदुल अज़हा की नमाज़ का तरीका और 6 ज़ायद तकबीरात
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या औरतों पर तरावीह की 20 रकात नमाज़ पढ़ना वाजिब या सुन्नत है?
तरावीह की नमाज़ मर्दों और औरतों दोनों के लिए सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। ख़ुलफ़ा-ए-राशीदीन और इज्मा-ए-उम्मत के मुताबिक़ तरावीह 20 रकात ही है, जिसे 2-2 रकात करके अदा किया जाता है।
2. औरतों के लिए तरावीह की नमाज़ की नियत कैसे करें?
ज़बान से इस तरह कहें: “नियत की मैंने 2 रकात नमाज़ तरावीह की, सुन्नत-ए-रसूलुल्लाह, वास्ते अल्लाह तआला के, रुख मेरा काबा शरीफ़ की तरफ, अल्लाहु अकबर।” हर दो रकात की शुरुआत में यही नियत की जाएगी।
3. अगर 20 रकात तरावीह पढ़ने की ताक़त न हो तो क्या 8 रकात पढ़ सकते हैं?
मुकम्मल सुन्नत-ए-मुअक्कदा का सवाब 20 रकात पढ़ने से ही हासिल होता है। लेकिन अगर कोई ख़ातून बीमारी, बुढ़ापे या सख्त कमज़ोरी की वजह से 20 रकात न पढ़ सकें, तो वे जितनी रकात आसानी से पढ़ सकती हैं पढ़ लें, अल्लाह तआला नीयतों के मुताबिक़ अज्र अता फ़रमाता है। बिना उज्र 20 रकात छोड़ना मकरूह है।
4. क्या औरतें मस्जिद में जाकर तरावीह पढ़ सकती हैं?
हदीस शरीफ़ के मुताबिक़ औरतों के लिए मस्जिद के मुकाबले अपने घर के अंदर नमाज़ पढ़ना ज़्यादा अफ़ज़ल और बाइस-ए-सवाब है। अगर मस्जिद में मुकम्मल शरई पर्दे का इंतज़ाम हो और कोई फ़ित्ना न हो तो जाना हराम नहीं, लेकिन घर पर पढ़ना ही बेहतर है।
5. अगर तरावीह की दुआ याद न हो तो 4 रकात के बाद क्या पढ़ें?
तरावीह की मख़सूस दुआ पढ़ना फ़र्ज़ या वाजिब नहीं बल्कि मुस्तहब है। अगर यह दुआ याद न हो तो आप तीसरा कलिमा, इस्तिग़फ़ार (अस्तग़फ़िरुल्लाह), दुरूद शरीफ़ पढ़ सकती हैं या ख़ामोशी से आराम भी कर सकती हैं।