इस्लाम में तहारत यानी पाकीज़गी को ईमान का आधा हिस्सा (शतरुल ईमान) क़रार दिया गया है। जब कोई बंदा अल्लाह तआला के हुक्म के मुताबिक़ वुज़ू (Wudu) मुकम्मल करता है, तो उसके जिस्मानी अज़ाब और चेहरे के गुनाह पानी के आख़िरी क़तरे के साथ झड़ जाते हैं। इस पाकीज़गी की अज़ीम नेमत का शुक्राना अदा करने के लिए रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने वुज़ू के तुरंत बाद दो रकअत नफ़्ल नमाज़ अदा करने की खास तालीम दी है, जिसे शरीअत में ताहिय्यतुल वज़ू (Tahiyyat al-Wudu) कहा जाता है।
यह वह मुबारक़ नमाज़ है जिसकी बदौलत हज़रत बिलाल हब्शी (रज़ियल्लाहु अन्हु) के कदमों की आहट नबी-ए-करीम ﷺ ने जन्नत में अपने आगे सुनी थी। इस विस्तृत गाइड में हम ताहिय्यतुल वज़ू की हक़ीक़त, सहीह हदीसों से साबित फ़ज़ीलत, नीयत का सही तरीका, नमाज़ अदा करने का क़दम-दर-क़दम सुन्नत तरीका और इसके औक़ात के शरीई मसाइल को मुकम्मल तफ़सील से समझेंगे।
ताहिय्यतुल वज़ू 2 रकअत नफ़्ल नमाज़ है, जो वुज़ू करने के फ़ौरन बाद पढ़ी जाती है। इसके पढ़ने से पिछले गुनाह माफ़ हो जाते हैं और दिल की हुज़ूरी के साथ पढ़ने वाले पर जन्नत वाजिब हो जाती है। इसे मकरूह औक़ात (सूरज निकलते, डूबते और ज़वाल के समय) को छोड़कर कभी भी पढ़ा जा सकता है।
ताहिय्यतुल वज़ू क्या है? (What is Tahiyyatul Wudu?)
अरबी ज़बान में ‘ताहिय्यत’ (Tahiyyah) का अर्थ सलाम, इज़्ज़त या तोहफ़ा पेश करना होता है, और ‘वुज़ू’ का अर्थ शरीई पाकीज़गी हासिल करना है। शरीअत की इस्लाह में, जब कोई मुसलमान सही तरीके से वुज़ू मुकम्मल करता है, तो वुज़ू की उस तहारत और रूहानी तरोताज़गी की हालत में अल्लाह तआला के हुज़ूर शुक्राने के तौर पर जो दो रकअत नफ़्ल नमाज़ पढ़ी जाती है, उसे ताहिय्यतुल वज़ू कहते हैं।
शरीई हुक्म के एतबार से यह नमाज़ सुन्नत-ए-मुस्तहब्बा (नफ़्ल) है। यानी इसे पढ़ने वाले को बहुत बड़ा सवाब और दरजात मिलते हैं, लेकिन अगर कोई किसी वजह से न पढ़ सके, तो उस पर कोई गुनाह या अज़ाब नहीं होता।
ताहिय्यतुल वज़ू की अज़ीम फ़ज़ीलत और हदीस के हवाले
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी कई मुबारक़ हदीसों में ताहिय्यतुल वज़ू की बेमिसाल फ़ज़ीलतों का बयान फ़रमाया है। सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम की मुस्तनद रिवायतें इसकी अहमियत को वाज़ेह करती हैं:
हदीस 1: हज़रत बिलाल (रज़ि.) और जन्नत में कदमों की आहट
सहीह बुखारी (हदीस संख्या 1149) और सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या 2458) में हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फज्र की नमाज़ के वक़्त हज़रत बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) से फ़रमाया:
“ऐ बिलाल! मुझे अपना वह अमल बताओ जिस पर तुम्हें इस्लाम में सबसे ज़्यादा अज्र की उम्मीद हो, क्योंकि मैंने आज रात जन्नत में अपने आगे-आगे तुम्हारे जूतों की चाप (कदमों की आहट) सुनी है।”
हज़रत बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अर्ज़ किया: “या रसूलुल्लाह! मैंने ऐसा कोई ख़ास अमल नहीं किया, सिवाय इसके कि जब भी मैंने दिन या रात की किसी भी घड़ी में वुज़ू किया, तो उस वुज़ू के बाद जितनी नमाज़ मेरे मुकद्दर में लिखी थी (ताहिय्यतुल वज़ू), मैंने ज़रूर अदा की।”
— सहीह अल-बुखारी: 1149, सहीह मुस्लिम: 2458
हदीस 2: पिछले तमाम गुनाहों की मुकम्मल माफ़ी
सहीह बुखारी (हदीस 159) और सहीह मुस्लिम (हदीस 226) में हज़रत हुमरान (रह.) बयान करते हैं कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत उस्मान गनी (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने वुज़ू का पानी मंगवाया और मुकम्मल सुन्नत के मुताबिक़ बेहतरीन वुज़ू करके दिखाया, फिर फ़रमाया कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
“जो शख़्स मेरे इस वुज़ू की तरह वुज़ू करे, फिर खड़े होकर दो रकअत नमाज़ इस तरह पढ़े कि उसमें अपने दिल में दुनियावी ख़्यालात न आने दे (यानी पूरी तवज्जोह और ख़ुशू के साथ पढ़े), तो अल्लाह तआला उसके पिछले तमाम (सगीरा) गुनाह माफ़ फ़रमा देता है।”
— सहीह अल-बुखारी: 159, सहीह मुस्लिम: 226
हदीस 3: जन्नत का लाज़मी व वाजिब हो जाना
सहीह मुस्लिम (हदीस 234) में हज़रत उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया:
“जो भी मुसलमान अच्छी तरह और कामिल तरीके से वुज़ू करता है, फिर खड़े होकर अपने दिल और चेहरे की पूरी तवज्जोह के साथ दो रकअत नमाज़ पढ़ता है, तो उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती है (वजबत लहुल जन्नत)।”
— सहीह मुस्लिम: 234
ताहिय्यतुल वज़ू की नीयत (Niyat Ka Tarika)
शरीअत में नीयत दिल के पुख़्ता इरादे का नाम है। नमाज़ के लिए ज़बान से नीयत के अल्फ़ाज़ कहना फ़र्ज़ नहीं है, लेकिन दिल के इरादे को ज़बान से दोहरा लेना मुस्तहब (बेहतर) माना गया है ताकि दिल और ज़बान दोनों मुत्तहिद हो जाएं।
हिंदी में ताहिय्यतुल वज़ू की नीयत
“नीयत की मैंने दो रकअत नमाज़ ताहिय्यतुल वज़ू नफ़्ल, वास्ते अल्लाह तआला के, मुँह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहु अकबर।”
English / Roman Urdu Niyyah
“Niyyat ki maine do rakat namaz Tahiyyatul Wazu nafl, waste Allah Ta’ala ke, rukh mera Qibla Sharif ki taraf, Allahu Akbar.”
ताहिय्यतुल वज़ू की नमाज़ का क़दम-दर-क़दम तरीका (Step-by-Step)
ताहिय्यतुल वज़ू की नमाज़ आम नफ़्ल या सुन्नत नमाज़ों की तरह ही 2 रकअत पढ़ी जाती है। इसमें किसी खास सूरह की शर्त नहीं है, क़ुरआन करीम की जो सूरह भी याद हो पढ़ी जा सकती है। नीचे इसका मुकम्मल और आसान तरीका दिया गया है:
पहली रकअत का तरीका:
- तकबीर-ए-तहरीमा: क़िब्ला रुख़ खड़े होकर दोनों हाथों को कानों की लौ तक उठाएं (महिलाएं कंधों तक उठाएं) और ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए नाफ़ के नीचे हाथ बांध लें (दायां हाथ बाएं हाथ पर रखें)।
- सना पढ़ें: ‘सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका व तबारकस्मूका व तआला जद्दुका व ला इलाहा गैरुक।’
- तअव्वुज़ व तस्मिया: ‘अऊजु बिल्लाहि मिनश शैतानिर रजीम’ और ‘बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम’ पढ़ें।
- सूरह फ़ातिहा: पूरी सूरह फ़ातिहा (अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन…) पढ़ें और आख़िर में आहिस्ता से ‘आमीन’ कहें।
- क़ुरआन की सूरह मिलाना: सूरह फ़ातिहा के बाद क़ुरआन मजीद की कोई भी सूरह या कम से कम 3 छोटी आयतें पढ़ें (जैसे सूरह अल-काफ़िरून या सूरह अल-इख़्लास पढ़ना अफ़ज़ल है)।
- रुकूअ: ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए रुकूअ में जाएं और कम से कम 3 बार ‘सुब्हाना रब्बियल अज़ीम’ पढ़ें।
- क़ौमा (सीधे खड़े होना): ‘समिअल्लाहु लिमन हमिदह’ कहते हुए सीधे खड़े हों और कहें ‘रब्बना लकल हम्द’।
- सजदा: ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए सजदे में जाएं। सजदे में पेशानी और नाक ज़मीन पर जमाएं और कम से कम 3 बार ‘सुब्हाना रब्बियल आला’ कहें।
- जलसा और दूसरा सजदा: अल्लाहु अकबर कहते हुए बैठें (जलसा), फिर दूसरा सजदा उसी तरह 3 बार तस्बीह के साथ करें। इसके बाद अल्लाहु अकबर कहते हुए दूसरी रकअत के लिए सीधे खड़े हो जाएं।
दूसरी रकअत का तरीका:
- दूसरी रकअत में सना और तअव्वुज़ नहीं पढ़ना है। सीधे ‘बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम’ से शुरू करें।
- सूरह फ़ातिहा पढ़ें और उसके बाद कोई दूसरी सूरह (जैसे सूरह अल-फ़लक़ या सूरह अन-नास) मिलाएं।
- पहली रकअत की तरह रुकूअ, क़ौमा और दोनों सजदे मुकम्मल करें।
- क़ादा (बैठक): दूसरे सजदे के बाद ज़मीन पर बैठ जाएं और निम्नलिखित दुआएं तरतीबवार पढ़ें:
- तशह्हुद (अत्तहिय्यात): अत्तहिय्यातु लिल्लाहि वस सलवातु वत तय्यिबातु… (अशहदु अल्ला इलाहा पर शहादत की उंगली उठाएं और इल्लल्लाह पर गिरा दें)।
- दुरूद-ए-इब्राहीमी: अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व अला आलि मुहम्मद…
- दुआ-ए-मासूरा: अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तु नफ़्सी ज़ुल्मन कसीरा…
- सलाम: पहले दाएं कंधे की तरफ़ मुंह फेरते हुए कहें ‘अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाह’, फिर बाएं कंधे की तरफ़ मुंह फेरते हुए कहें ‘अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाह’।
सलाम फेरने के बाद 3 बार ‘अस्तग़फ़िरुल्लाह’ कहें और एक बार ‘अल्लाहुम्मा अन्तस सलाम व मिनकस सलाम तबारक्ता या ज़ल जलालि वल इकराम’ पढ़कर अपने गुनाहों की माफ़ी और जन्नत की तलब के लिए दुआ मांगें।
ताहिय्यतुल वज़ू का सही वक़्त और मुद्दत
ताहिय्यतुल वज़ू के सही वक़्त के सिलसिले में फ़ुक़हा-ए-किराम और उलमा ने मुस्तनद उसूल बयान फ़रमाए हैं:
- अफ़ज़ल वक़्त: जैसे ही वुज़ू मुकम्मल हो, फ़ौरन नमाज़ के लिए खड़ा हो जाना चाहिए। मुस्तहब यह है कि वुज़ू के आंज़ा (हाथ-पैर और चेहरा) पूरी तरह सूखने से पहले यह नमाज़ पढ़ ली जाए।
- अगर पानी सूख जाए: अगर किसी वजह से वुज़ू के आजा सूख भी जाएं, तब भी जब तक वुज़ू बाक़ी है और कोई मकरूह वक़्त नहीं हुआ है, ताहिय्यतुल वज़ू की नमाज़ पढ़ी जा सकती है।
- दिन और रात की कोई क़ैद नहीं: हज़रत बिलाल (रज़ि.) की हदीस से साबित है कि दिन हो या रात, जब भी वुज़ू किया जाए, यह नमाज़ पढ़ी जा सकती है, बशर्ते कि वह मकरूह औक़ात में न हो।
किन औक़ात में ताहिय्यतुल वज़ू नहीं पढ़ सकते? (मकरूह औक़ात)
शरीअत में कुछ ऐसे औक़ात मुक़र्रर किए गए हैं जिनमें कोई भी नफ़्ल नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी (मना) है। इन औक़ात में ताहिय्यतुल वज़ू की नमाज़ भी नहीं पढ़ी जा सकती:
| मकरूह वक़्त (Forbidden Time) | शरीई हुक्म | वैकल्पिक अमल (क्या करें?) |
|---|---|---|
| सूरज निकलते समय (तुलू-ए-आफ़ताब): सूरज निकलने से लेकर लगभग 15-20 मिनट बाद तक। | नफ़्ल नमाज़ सख्त मना है | इशराक़ का वक़्त होने का इंतज़ार करें, फिर पढ़ें। |
| ज़वाल का वक़्त (निस्फ़ुन्नहार): ठीक दोपहर के वक़्त जब सूरज ठीक सर के ऊपर हो। | नफ़्ल नमाज़ सख्त मना है | ज़ुहर का वक़्त शुरू होने (अज़ान) के बाद पढ़ें। |
| सूरज डूबते समय (ग़ुरूब-ए-आफ़ताब): सूरज की रोशनी पीली पड़ने से लेकर पूरी तरह डूबने तक। | नफ़्ल नमाज़ सख्त मना है | मग़रिब की नमाज़ के बाद नफ़्ल पढ़ें। |
| फज्र और अस्र के बाद (हनफ़ी फ़िक़्ह): फज्र की नमाज़ के बाद से सूरज निकलने तक, और अस्र की नमाज़ के बाद से मग़रिब तक। | नफ़्ल नमाज़ मकरूह-ए-तहरीमी है | नमाज़ के बजाय ज़िक्र, अस्तग़फ़ार और दुरूद शरीफ़ पढ़ें। |
ताहिय्यतुल वज़ू और ताहिय्यतुल मस्जिद में क्या फ़र्क़ है?
अक्सर लोग ताहिय्यतुल वज़ू और ताहिय्यतुल मस्जिद (Tahiyyat al-Masjid) को एक ही समझ लेते हैं या दोनों में उलझ जाते हैं। दोनों नमाज़ों में बुनियादी फ़र्क़ निम्नलिखित है:
| पैमाना (Attribute) | ताहिय्यतुल वज़ू (Tahiyyatul Wazu) | ताहिय्यतुल मस्जिद (Tahiyyatul Masjid) |
|---|---|---|
| मक़सद | वुज़ू की पाकीज़गी का शुक्र अदा करना। | अल्लाह के घर (मस्जिद) की ताज़ीम व इज़्ज़त करना। |
| जगह | घर, दफ़्तर, मस्जिद — कहीं भी पढ़ी जा सकती है। | सिर्फ़ और सिर्फ़ मस्जिद के अंदर ही पढ़ी जाती है। |
| पढ़ने का समय | वुज़ू मुकम्मल करने के तुरंत बाद। | मस्जिद में दाखिल होकर बैठने से पहले। |
| क्या दोनों को मिला सकते हैं? | हाँ! मस्जिद में वुज़ू करके दाखिल होने पर 2 रकअत में दोनों की साझी नीयत की जा सकती है। | |
अगर फ़र्ज़ नमाज़ का वक़्त हो जाए तो क्या करें?
अगर कोई शख़्स मस्जिद में आया और उसने वुज़ू किया, लेकिन उस वक़्त फ़र्ज़ नमाज़ की जमाअत खड़ी होने वाली हो या सुन्नत-ए-मुअक्कदा पढ़ने का वक़्त कम हो, तो शरीअत का उसूल यह है कि:
- फ़ुक़हा-ए-किराम फ़रमाते हैं कि अगर वुज़ू के बाद कोई भी फ़र्ज़ या सुन्नत नमाज़ अदा कर ली जाए, तो बंदे को ताहिय्यतुल वज़ू का सवाब भी बफ़ज़ल-ए-इलाही हासिल हो जाता है, क्योंकि वुज़ू के बाद नमाज़ अदा करने का बुनियादी मक़सद पूरा हो जाता है।
- जमाअत छोड़ कर या सुन्नत-ए-मुअक्कदा को टाल कर अलग से ताहिय्यतुल वज़ू पढ़ना दुरुस्त नहीं है। फ़र्ज़ और सुन्नत-ए-मुअक्कदा का मर्तबा नफ़्ल से कहीं बुलंद है।
महिलाओं (औरतों) के लिए ताहिय्यतुल वज़ू का तरीका
इस्लाम में ताहिय्यतुल वज़ू की फ़ज़ीलत मर्दों और औरतों दोनों के लिए एक समान है। खवातीन अपने घरों में जब भी नमाज़ या क़ुरआन की तिलावत के लिए वुज़ू करें, तो उन्हें चाहिए कि इस अज़ीम सुन्नत को अपनी आदत में शामिल करें।
महिलाओं के नमाज़ पढ़ने का तरीका बिल्कुल सामान्य नमाज़ जैसा ही है, बस शरीअत के मुताबिक़ पर्दे और आदाब का ख़्याल रखा जाए:
- तकबीर-ए-तहरीमा में हाथ कानों तक नहीं, बल्कि सीने/कंधों तक उठाएं।
- क़ियाम में हाथ सीने पर बांधें।
- रुकूअ में सिर्फ़ इतना झुकें कि हाथ घुटनों तक पहुँच जाएं और उंगलियां मिली रहें।
- सजदे में सिमट कर सजदा करें यानी कोहनियां ज़मीन पर बिछी हों और पेट रानों से मिला हुआ हो।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
नहीं, ताहिय्यतुल वज़ू न तो फ़र्ज़ है और न ही वाजिब। यह सुन्नत-ए-मुस्तहब्बा यानी नफ़्ल नमाज़ है। इसे पढ़ने पर हदीस के मुताबिक़ जन्नत की बशारत और गुनाहों की माफ़ी का अज़ीम सवाब मिलता है, लेकिन न पढ़ने पर कोई गुनाह नहीं होता।
अफ़ज़ल तरीका यह है कि वुज़ू मुकम्मल होने के फ़ौरन बाद, जब तक वुज़ू के आजा सूख न जाएं, यह नमाज़ पढ़ ली जाए। लेकिन अगर पानी सूख भी जाए, तब भी जब तक वुज़ू क़ायम रहे और मकरूह वक़्त न हो, इसे पढ़ा जा सकता है।
हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़, फज्र की फ़र्ज़ नमाज़ के बाद से सूरज निकलने तक और अस्र की नमाज़ के बाद से सूरज डूबने (मग़रिब) तक नफ़्ल नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी है। इसलिए इन औक़ात में ताहिय्यतुल वज़ू न पढ़ें, बल्कि ज़िक्र और दुरूद शरीफ़ पढ़ें।
ताहिय्यतुल वज़ू के लिए कोई ख़ास सूरह मुक़र्रर नहीं है। क़ुरआन मजीद की जो भी सूरह याद हो पढ़ी जा सकती है। उलमा पहली रकअत में सूरह अल-काफ़िरून (क़ुल या अय्युहल काफ़िरून) और दूसरी रकअत में सूरह अल-इख़्लास (क़ुल हुवल्लाहु अहद) पढ़ना बेहतर बताते हैं।
जिन लोगों के ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ें बाक़ी हों, उनके लिए अफ़ज़ल और लाज़मी यह है कि वे नफ़्ल नमाज़ों के बजाय अपनी क़ज़ा नमाज़ों को पहले अदा करें। हालांकि अगर कोई ताहिय्यतुल वज़ू पढ़ ले, तो नमाज़ अदा हो जाएगी और उसका सवाब भी मिलेगा।