ईद उल अज़हा (Eid ul Adha), जिसे आम बोलचाल में बकरीद (Bakra Eid) भी कहा जाता है, इस्लाम के दो सबसे बड़े और मुक़द्दस त्योहारों में से एक है। यह अज़ीम दिन हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की बेमिसाल क़ुरबानी और अल्लाह तआला के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ को न्योछावर करने के जज़्बे की याद दिलाता है। इस मुबारक़ दिन की शुरुआत ईदगाह या जामा मस्जिद में दो रकअत ईद उल अज़हा की नमाज़ अदा करके की जाती है।
इस्लामी शरीअत (ख़ासकर फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी) में ईद उल अज़हा की नमाज़ हर उस मुसलमान मर्द पर वाजिब (Wajib) है जिस पर जुमा की नमाज़ फ़र्ज़ है। चूँकि यह नमाज़ साल में सिर्फ़ एक बार पढ़ी जाती है, इसलिए बहुत से नमाज़ी 6 ज़ायद तकबीरात (अतिरिक्त तकबीरों), हाथ उठाने या छोड़ने के तरीक़े में उलझ जाते हैं। इस विस्तृत और मुकम्मल गाइड में हम ईद उल अज़हा की नमाज़ की नियत, 6 ज़ायद तकबीरात का चार्ट, क़दम-दर-क़दम तरीक़ा, महिलाओं के अहकाम और तकबीर-ए-तशरीक़ के तमाम ज़रूरी मसाइल को तफ़सील से समझेंगे।
संक्षिप्त सारांश (Quick Summary):
ईद उल अज़हा की नमाज़ 2 रकअत वाजिब है जो बा-जमाअत (इमाम के पीछे) अदा की जाती है। इसमें कुल 6 ज़ायद तकबीरें होती हैं — पहली रकअत में क़िराअत (सूरह) से पहले 3 ज़ायद तकबीरें, और दूसरी रकअत में क़िराअत के बाद रुकूअ में जाने से पहले 3 ज़ायद तकबीरें। नमाज़ के बाद इमाम का ख़ुत्बा सुनना वाजिब है, और नमाज़ मुकम्मल होने से पहले क़ुरबानी करना जायज़ नहीं है।
ईद उल अज़हा की नमाज़ का शरई हुक्म और वक़्त
अहनाफ़ (फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी) के नज़दीक ईद उल अज़हा की नमाज़ उन तमाम आक़िल, बालिग़ और आज़ाद मर्दों पर वाजिब है जो मुक़ीम (resident) हों और जिन पर जुमा की नमाज़ वाजिब होती है। मुसाफ़िर, मरीज़, कमज़ोर और औरतों पर यह नमाज़ वाजिब नहीं है, हालाँकि वे चाहें तो शरई पर्दों के साथ ईदगाह में शामिल हो सकती हैं।
ईद की नमाज़ का वक़्त (Namaze Eid Ka Waqt):
- शुरू होने का वक़्त: सूरज निकलने के लगभग 15 से 20 मिनट बाद (जब सूरज एक नेज़े के बराबर ऊपर आ जाए और मकरूह वक़्त ख़त्म हो जाए, जिसे चाश्त का वक़्त कहते हैं) ईद की नमाज़ का वक़्त शुरू होता है।
- ख़त्म होने का वक़्त: ज़वाल (दुपहर के ठीक 12 बजे यानी जब सूरज बिल्कुल सर पर आ जाए) से पहले-पहले तक इसका वक़्त रहता है।
- मुस्तहब (पसंदीदा) तरीक़ा: सुन्नत यह है कि ईद उल अज़हा की नमाज़ ईद उल फ़ित्र के मुक़ाबले थोड़ी जल्दी अदा की जाए, ताकि नमाज़ से फ़ारिग़ होकर लोग जल्द से जल्द अल्लाह के नाम पर क़ुरबानी पेश कर सकें।
ईद उल अज़हा की नमाज़ की नियत (Eid ul Adha Namaz Ki Niyat)
नियत दिल के पक्के इरादे का नाम है। अगर आपके दिल में यह बात तय है कि “मैं आज ईद उल अज़हा की 2 रकअत वाजिब नमाज़ 6 ज़ायद तकबीरों के साथ इस इमाम के पीछे अल्लाह की रज़ा के लिए पढ़ रहा हूँ”, तो नियत मुकम्मल हो जाती है। ज़बान से कहना मुस्तहब (पसंदीदा) है ताकि दिल को इत्मीनान हासिल हो सके।
हिंदी में ईद उल अज़हा की नियत:
“नियत की मैंने दो रकअत नमाज़ ईद उल अज़हा वाजिब, मय 6 ज़ायद तकबीरों के, वास्ते अल्लाह तआला के, पीछे इस इमाम के, रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहु अकबर।”
Roman Urdu / English Niyyah:
“Niyyat ki maine do rakat namaz Eid ul Adha wajib, may 6 zaid takbeeron ke, waste Allah Ta’ala ke, peechhe is Imam ke, rukh mera Qibla shareef ki taraf, Allahu Akbar.”
अरबी में नियत (Arabic Formulation):
نَوَيْتُ أَنْ أُصَلِّيَ لِلّٰهِ تَعَالَى رَكْعَتَيْ صَلَاةِ عِيْدِ الْأَضْحَى وَاجِبًا مَعَ سِتِّ تَكْبِيْرَاتٍ زَوَائِدَ، مُقْتَدِيًا بِهٰذَا الْإِمَامِ، مُتَوَجِّهًا إِلَى جِهَةِ الْكَعْبَةِ الشَّرِيْفَةِ، اَللّٰهُ أَكْبَرُ.
6 ज़ायद तकबीरात का मुकम्मल चार्ट (कब हाथ उठाएं और कब बांधें?)
ईद की नमाज़ में सबसे अहम बात यह समझना है कि किस तकबीर पर हाथ कानों तक उठाकर नीचे छोड़ देने हैं, और किस तकबीर पर नाफ़ के नीचे बांधने हैं। इसके लिए एक आसान शरई उसूल याद रखें: “जिस तकबीर के बाद कुछ पढ़ना हो, उसमें हाथ बांधें; और जिस तकबीर के बाद कुछ न पढ़ना हो, उसमें हाथ छोड़ दें।”
ईद उल अज़हा की नमाज़ का क़दम-दर-क़दम तरीका (Step-by-Step Guide)
ईद की नमाज़ के लिए न तो अज़ान दी जाती है और न ही इक़ामत कही जाती है। सफ़ें दुरुस्त करने के बाद इमाम साहब के पीछे इस तरह नमाज़ शुरू करें:
पहली रकअत का तरीक़ा:
- क़िबला रुख़ सीधे खड़े होकर दिल में ईद उल अज़हा की नियत करें।
- इमाम के ‘अल्लाहु अकबर’ कहने पर दोनों हाथ कानों तक उठाएं और नाफ़ के नीचे बांध लें (तकबीर-ए-तहरीमा)।
- आहिस्ता आवाज़ में सना (सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका…) पूरी पढ़ें।
- सना के बाद इमाम साहब तीन ज़ायद तकबीरें कहेंगे:
- पहली तकबीर: इमाम के साथ दोनों हाथ कानों तक उठाएं और नीचे आज़ाद छोड़ दें।
- दूसरी तकबीर: फिर हाथ कानों तक उठाएं और नीचे आज़ाद छोड़ दें।
- तीसरी तकबीर: फिर हाथ कानों तक उठाएं और इस बार नीचे छोड़ने के बजाय नाफ़ के नीचे बांध लें।
- अब इमाम साहब तअव्वुज़ (अऊज़ु बिल्लाह…), तस्मिया (बिस्मिल्लाह…) और सूरह फ़ातिहा व क़ुरआन की कोई सूरह ज़ोर से (जहरी) पढ़ेंगे। मुक़्तदी ख़ामोश खड़े होकर ध्यान से क़िराअत सुनेंगे।
- क़िराअत पूरी होने पर इमाम तकबीर कहकर रुकूअ में जाएंगे। मामूल के मुताबिक़ रुकूअ, क़ौमा (सीधे खड़े होना) और दोनों सजदे मुकम्मल करके दूसरी रकअत के लिए खड़े हो जाएं।
दूसरी रकअत का तरीक़ा:
- दूसरी रकअत में खड़े होते ही हाथ बंधे रहेंगे। इमाम साहब पहले बिस्मिल्लाह, सूरह फ़ातिहा और कोई दूसरी सूरह की क़िराअत फ़रमाएंगे।
- क़िराअत ख़त्म होने के बाद (रुकूअ में जाने से पहले) इमाम साहब चार बार ‘अल्लाहु अकबर’ कहेंगे:
- पहली ज़ायद तकबीर: हाथ कानों तक उठाएं और नीचे छोड़ दें।
- दूसरी ज़ायद तकबीर: हाथ कानों तक उठाएं और नीचे छोड़ दें।
- तीसरी ज़ायद तकबीर: हाथ कानों तक उठाएं और नीचे छोड़ दें।
- चौथी तकबीर (रुकूअ की): इस बार हाथ नहीं उठाना है, बल्कि सीधे रुकूअ में चले जाना है।
- रुकूअ के बाद क़ौमा करें, फिर दोनों सजदे पूरे करें।
- सजदों के बाद क़ादा-ए-अख़ीरा में बैठ जाएं और अत्तहिय्यात (तशह्हुद), दुरूद-ए-इब्राहीमी और दुआ-ए-मासूरा पढ़कर दोनों तरफ़ सलाम फेर दें। इस तरह आपकी 2 रकअत ईद की नमाज़ मुकम्मल हो जाएगी।
ईद का ख़ुत्बा और उसके शरई अहकाम
सलाम फेरने के तुरंत बाद उठकर चले जाना या बातें शुरू कर देना सख़्त मना है। जुमा और ईद की नमाज़ में एक बुनियादी फ़र्क़ यह है कि जुमा का ख़ुत्बा नमाज़ से पहले होता है और उसका सुनना फ़र्ज़ है, जबकि ईद का ख़ुत्बा नमाज़ के बाद होता है और उसका सुनना वाजिब है।
ख़ुत्बे के दौरान इन बातों का ख़ास ख़्याल रखें:
- इमाम साहब मिम्बर पर खड़े होकर दो ख़ुत्बे देंगे, जिनके बीच में थोड़ी देर बैठेंगे।
- ख़ुत्बे के दौरान आपस में बातचीत करना, सलाम-मुसाफ़हा करना, मोबाइल चलाना या उठकर जाना मकरूह-ए-तहरीमी है।
- ख़ुत्बा मुकम्मल होने के बाद इमाम के साथ इज्तिमाई दुआ में शामिल हों और फिर एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद दें।
सऊदी अरब और 12 तकबीरात का तरीका (Shafi’i & Hanbali Method)
जो लोग सऊदी अरब, यूएई या खाड़ी देशों में रहते हैं, या हरमैन शरीफ़ैन (मक्का व मदीना) में हज या उमराह के दौरान ईद की नमाज़ पढ़ते हैं, वहाँ 12 ज़ायद तकबीरात (हनबली व शाफ़ई तरीक़ा) के साथ नमाज़ पढ़ाई जाती है। यदि कोई हनफ़ी नमाज़ी ऐसी जमाअत में शामिल हो, तो उसके लिए इमाम की पैरवी करना ज़रूरी है:
- पहली रकअत: तकबीर-ए-तहरीमा के अलावा 7 ज़ायद तकबीरें कही जाती हैं (कुल 8 तकबीरें), जिसके बाद सूरह फ़ातिहा और सूरह पढ़ी जाती है।
- दूसरी रकअत: सजदे से उठने की तकबीर के अलावा 5 ज़ायद तकबीरें कही जाती हैं, जिसके बाद क़िराअत होती है।
- शरई हुक्म: हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़, अगर इमाम 12 तकबीरें कहे तो मुक़्तदी को भी इमाम की इत्तिबा (फॉलो) करते हुए 12 तकबीरें ही कहनी चाहिए, इससे नमाज़ बिल्कुल सही और दुरुस्त होती है।
महिलाओं (औरतों) के लिए ईद की नमाज़ के अहकाम (Eid Namaz for Ladies)
महिलाएं अक्सर यह सवाल पूछती हैं कि क्या उन पर ईद की नमाज़ वाजिब है, और क्या वे घर पर ईद की नमाज़ पढ़ सकती हैं? इसके शरई अहकाम निम्नलिखित हैं:
- महिलाओं पर नमाज़ वाजिब नहीं: फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी के मुताबिक़ औरतों पर न तो जुमा वाजिब है और न ही ईदैन (ईद उल फ़ित्र व ईद उल अज़हा) की नमाज़ वाजिब है।
- घर पर तन्हा ईद की नमाज़: ईद की नमाज़ केवल बा-जमाअत (जमाअत के साथ) ही अदा की जा सकती है। कोई भी औरत या मर्द घर पर अकेले तन्हा “ईद की नमाज़” नहीं पढ़ सकता।
- घर पर क्या पढ़ें? महिलाएं ईद के दिन सूरज निकलने के बाद अपने घर पर 2 या 4 रकअत सलातुद-दुहा (चाश्त की नफ़्ल नमाज़) पढ़ सकती हैं, जिसका बहुत बड़ा सवाब हदीस में आया है।
- ईदगाह में शिरकत: यदि किसी शहर या मस्जिद में महिलाओं के लिए अलग से पर्दादार, सुरक्षित और शरई उसूलों के मुताबिक़ इंतिज़ाम मौजूद हो, तो वे जमाअत में शामिल होकर ईद की नमाज़ पढ़ सकती हैं।
तकबीर-ए-तशरीक़ (Takbeer-e-Tashreeq) के अहकाम और अल्फाज़
ईद उल अज़हा के दिनों का सबसे ख़ास और वाजिब ज़िक्र तकबीर-ए-तशरीक़ है। यह 9 ज़ुलहिज्जा की फ़ज्र की नमाज़ से लेकर 13 ज़ुलहिज्जा की अस्र की नमाज़ तक (कुल 23 फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद) हर बालिग़ मुसलमान पर फ़र्ज़ नमाज़ के तुरंत बाद एक मर्तबा बा-आवाज़े-बुलंद (ऊंची आवाज़ में) पढ़ना वाजिब है।
तकबीर-ए-तशरीक़ के मुबारक़ अल्फ़ाज़:
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، وَلِلَّهِ الْحَمْدُ
हिंदी उच्चारण: “अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द।”
हिंदी तर्जुमा: “अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, और तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं।”
याद रखें: मर्द हज़रात इसे बुलंद आवाज़ से पढ़ें, जबकि औरतें अपने घरों में आहिस्ता आवाज़ में पढ़ें ताकि उनकी आवाज़ नामहरम तक न पहुंचे। यदि कोई नमाज़ी सलाम के बाद भूल जाए और मस्जिद से बाहर निकल जाए या बात कर ले, तो तकबीर साक़ित (छूट) हो जाएगी, इसलिए सलाम फेरते ही फ़ौरन यह तकबीर पढ़ें।
ईद उल अज़हा के दिन की मस्नून सुन्नतें और आदाब
नबी करीम ﷺ की सुन्नतों पर अमल करने से ईद की ख़ुशियाँ और बरकतें दोगुनी हो जाती हैं। ईद उल अज़हा की सुबह इन आदाब का एहतिमाम ज़रूर करें:
- सुबह जल्दी उठना: फ़ज्र की नमाज़ अपनी मोहल्ले की मस्जिद में बा-जमाअत अदा करना।
- मिस्वाक और ग़ुस्ल: नमाज़े ईद के लिए पाकी हासिल करना, मिस्वाक करना और ग़ुस्ल करना सुन्नत है।
- उम्दा लिबास व ख़ुशबू: जो सबसे साफ़-सुथरे और अच्छे कपड़े हों (चाहे नए हों या धुले हुए) वे पहनना और इतर (ख़ुशबू) लगाना।
- नमाज़ से पहले कुछ न खाना: ईद उल फ़ित्र में नमाज़ से पहले मीठा (खजूर) खाना सुन्नत है, लेकिन ईद उल अज़हा में नमाज़ से पहले न खाना सुन्नत है। सुन्नत यह है कि नमाज़ और क़ुरबानी के बाद सबसे पहले अपनी क़ुरबानी के गोश्त (कलेजी आदि) से दिन का पहला खाना खाया जाए।
- रास्ते में तकबीर पढ़ना: घर से ईदगाह जाते समय रास्ते भर बुलंद आवाज़ में तकबीर-ए-तशरीक़ पढ़ते हुए जाना।
- रास्ता बदलना: जिस रास्ते से ईदगाह जाएं, नमाज़ के बाद दूसरे रास्ते से वापस घर लौटना सुन्नत है।
- पैदल जाना: अगर ईदगाह ज़्यादा दूर न हो और कोई उज़्र (मजबूरी) न हो, तो पैदल जाना अफ़ज़ल है।
ज़रूरी मसाइल: अगर नमाज़ छूट जाए या देर से पहुंचे तो क्या करें?
नमाज़ के दौरान पेश आने वाली सूरतों के शरई हल नीचे दिए गए हैं:
- अगर पहली रकअत की तकबीरें छूट जाएं: यदि आप ऐसे वक़्त शामिल हुए जब इमाम तकबीरें कह चुका था और क़िराअत कर रहा था, तो नियत बांधते ही पहले तीन ज़ायद तकबीरें ख़ुद कह लें, फिर चुपचाप क़िराअत सुनें।
- अगर इमाम रुकूअ में हो तब पहुंचे: नियत बांधकर अगर रुकूअ में इमाम को पा सकते हों, तो खड़े-खड़े 3 तकबीरें कहकर रुकूअ में जाएं। अगर डर हो कि इमाम रुकूअ से उठ जाएगा, तो सीधे रुकूअ में चले जाएं और रुकूअ की हालत में ही हाथ उठाए बिना दिल-दिल में 3 बार अल्लाहु अकबर कह लें।
- अगर एक पूरी रकअत छूट जाए: जब इमाम सलाम फेर दे, तो आप खड़े हो जाएं। पहले सना पढ़ें, फिर सूरह फ़ातिहा और कोई सूरह पढ़ें। क़िराअत के बाद 3 ज़ायद तकबीरें कहें और चौथी तकबीर पर रुकूअ में जाएं।
- अगर पूरी नमाज़ छूट जाए: ईद की नमाज़ की कोई क़ज़ा नहीं होती। अगर किसी शहर में दूसरी जगह ईद की नमाज़ हो रही हो तो वहाँ जाकर शामिल हो सकते हैं। अगर कहीं न मिले तो अपने घर पर 4 रकअत चाश्त की नफ़्ल नमाज़ पढ़ लें।
- क़ुरबानी का सही वक़्त: जिस शहर या बस्ती में ईद की नमाज़ होती है, वहाँ नमाज़े ईद से पहले क़ुरबानी करना हराम व बातिल है। अगर किसी ने नमाज़ से पहले जानवर ज़बह कर दिया, तो वह आम गोश्त माना जाएगा, क़ुरबानी नहीं मानी जाएगी और उसे दोबारा जानवर ज़बह करना होगा (सहीह बुख़ारी: 5545)।
इस्लामी इबादत व नमाज़ की अन्य उपयोगी गाइड:
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या ईद उल अज़हा की नमाज़ से पहले कुछ खाना चाहिए?
नहीं, सुन्नत यह है कि ईद उल अज़हा (बकरीद) के दिन नमाज़ से पहले कुछ न खाया जाए। नमाज़ और क़ुरबानी के बाद अपनी क़ुरबानी के गोश्त से दिन का पहला भोजन करना सुन्नत व मुस्तहब है। इसके विपरीत, ईद उल फ़ित्र में नमाज़ से पहले मीठा खाकर जाना सुन्नत है।
2. क्या औरतें घर पर अकेले ईद की नमाज़ पढ़ सकती हैं?
नहीं, शरीअत में औरतों पर ईद की नमाज़ वाजिब नहीं है और ईद की नमाज़ अकेले (तन्हा) नहीं पढ़ी जा सकती। महिलाएं घर पर 2 या 4 रकअत चाश्त (सलातुद-दुहा) की नफ़्ल नमाज़ पढ़ सकती हैं। यदि ईदगाह में मुकम्मल शरई पर्दा हो, तो वे जमाअत में शामिल हो सकती हैं।
3. तकबीर-ए-तशरीक़ कब से कब तक पढ़ी जाती है?
तकबीर-ए-तशरीक़ 9 ज़ुलहिज्जा (यौम-ए-अरफ़ा) की फ़ज्र की नमाज़ से शुरू होकर 13 ज़ुलहिज्जा की अस्र की नमाज़ तक, यानी कुल 5 दिनों की 23 फ़र्ज़ नमाज़ों के तुरंत बाद एक बार पढ़ना वाजिब है।
4. क्या ईद की नमाज़ से पहले क़ुरबानी की जा सकती है?
बिल्कुल नहीं। जिस शहर, क़स्बे या गाँव में ईद की नमाज़ अदा की जाती है, वहाँ ईद की नमाज़ और ख़ुत्बे से पहले क़ुरबानी का जानवर ज़बह करना हराम है। यदि किसी ने पहले ज़बह कर दिया तो वह क़ुरबानी नहीं मानी जाएगी और नमाज़ के बाद दोबारा क़ुरबानी करनी होगी (बुख़ारी: 5545)।
5. अगर कोई नमाज़ी ज़ायद तकबीर कहना भूल जाए तो क्या नमाज़ हो जाएगी?
अगर इमाम ज़ायद तकबीर कहना भूल जाए और रुकूअ में याद आए, तो रुकूअ में ही तकबीर कह ले। यदि बिल्कुल छूट जाए तो सजदा-ए-सहव वाजिब होता है, लेकिन ईद की इतनी बड़ी जमाअत में फ़ितने और उलझन से बचने के लिए उलमा ने सजदा-ए-सहव न करने की इजाज़त दी है और नमाज़ दुरुस्त हो जाएगी।
6. सऊदी अरब में 12 तकबीरें क्यों पढ़ी जाती हैं?
सऊदी अरब में इमाम अहमद बिन हन्बल (रह.) और इमाम शाफ़ई (रह.) के तरीक़े पर अमल होता है, जिसमें पहली रकअत में 7 और दूसरी में 5 ज़ायद तकबीरें कही जाती हैं। दोनों तरीक़े हदीसों से साबित हैं। हनफ़ी नमाज़ियों को वहाँ के इमाम की इत्तिबा करते हुए 12 तकबीरें ही कहनी चाहिए।