इस्लाम में इंसान की पैदाइश से लेकर वफ़ात तक हर मोड़ पर अल्लाह की रज़ा, सब्र और शुक्र की तालीम दी गई है। जब भी किसी इंसान पर कोई मुसीबत आती है, किसी अज़ीज़ के इंतिक़ाल की ख़बर मिलती है, या कोई माली व जिस्मानी तकलीफ़ पहुंचती है, तो मुसलमान की ज़बान पर सबसे पहले जो कलमा आता है वह है ‘इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन’ (Inna Lillahi Wa Inna Ilayhi Raji’un)। इसे इस्लामी शरीयत में ‘इस्तिरजा’ (Istirja) कहा जाता है। आम तौर पर लोग इसे सिर्फ़ मौत की ख़बर सुनने पर ही पढ़ते हैं, लेकिन शरीयत और सुन्नत-ए-रसूल ﷺ के मुताबिक इसका दायरा बहुत वसीअ (व्यापक) है।
इस विस्तृत लेख में हम जानेंगे कि Inna Lillahi Wa Inna Ilayhi Raji’un Meaning in Hindi क्या है, इसका सही अरबी मतन और हिंदी उच्चारण क्या है, कुरआन मजीद की किस आयत में इसका हुक्म आया है, इसे कब-कब पढ़ना सुन्नत है और किसी के इंतिक़ाल पर इसका सही सुन्नत जवाब क्या देना चाहिए।
आयत-ए-इस्तिरजा का सारांश
अरबी मतन: إِنَّا لِلَّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
हिंदी उच्चारण: इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन
हिंदी तर्जुमा: “बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और हम सबको उसी की तरफ लौट कर जाना है।”
कुरआनी संदर्भ: सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah), आयत संख्या 156।
इना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन: लफ्जी व तफ़्सीली मतलब
इस मुबारक़ कलमे के हर एक लफ्ज़ में तौहीद, बंदगी और इंसान की हक़ीक़त का गहरा फलसफ़ा छिपा हुआ है:
| अरबी लफ्ज़ | हिंदी उच्चारण | लफ्जी अर्थ (Word-by-Word Meaning) |
|---|---|---|
| إِنَّا (Inna) | इन्ना | बेशक हम (यानी हम तमाम इंसान) |
| لِلَّٰهِ (Lillahi) | लिल्लाहि | अल्लाह के लिए हैं / अल्लाह ही की मिल्कियत हैं |
| وَإِنَّا (Wa Inna) | वा इन्ना | और बेशक हम सब |
| إِلَيْهِ (Ilayhi) | इलैहि | उसी (अल्लाह तआला) की तरफ |
| رَاجِعُونَ (Raji’un) | राजिऊन | लौट कर जाने वाले हैं (पलटने वाले हैं) |
इस कलमे को पढ़कर मोमिन यह इक़रार करता है कि मेरी जान, माल, औलाद, सेहत और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब अल्लाह तआला की अमानत है। जब मालिक अपनी अमानत वापस लेता है, तो बंदे को शिकवा या शिकायत करने के बजाय सब्र करना चाहिए, क्योंकि एक दिन खुद उसे भी अपने रब की बारगाह में हाज़िर होना है।
कुरआन मजीद में आयत-ए-इस्तिरजा का संदर्भ (सूरह अल-बक़रह)
कुरआन करीम के दूसरे पारे में सूरह अल-बक़रह की आयत संख्या 155 और 156 में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फरमाता है:
وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَيْءٍ مِّنَ الْخَوْفِ وَالْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ الْأَمْوَالِ وَالْأَنفُسِ وَالثَّمَرَاتِ ۗ وَبَشِّرِ الصَّابِرِينَ الَّذِينَ إِذَا أَصَابَتْهُم مُّصِيبَةٌ قَالُوا إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
हिंदी तर्जुमा: “और हम ज़रूर तुम्हें थोड़ा डर, भूख, और मालों, जानों और फलों की कमी के ज़रिए आज़माएंगे; और (ऐ नबी ﷺ!) सब्र करने वालों को खुशखबरी सुना दीजिए। वो लोग कि जब उन पर कोई मुसीबत आती है, तो कह उठते हैं: बेशक हम अल्लाह ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं।” (सूरह अल-बक़रह: 155-156)
‘इन्ना लिल्लाहि…’ कब-कब पढ़ना चाहिए?
अक्सर लोग समझते हैं कि यह कलमा सिर्फ़ मौत की ख़बर सुनने पर ही पढ़ा जाता है, लेकिन हदीस शरीफ़ की रोशनी में इसे हर तरह की तकलीफ़, नुक़सान और परेशानी के वक़्त पढ़ना चाहिए:
- किसी के इंतिक़ाल की ख़बर मिलने पर: रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी या किसी भी मुसलमान के वफ़ात की ख़बर सुनते ही सबसे पहले यह दुआ पढ़ी जाती है।
- माली या कारोबारी नुक़सान होने पर: व्यापार में घाटा, पैसा खो जाना या चोरी हो जाना।
- बीमारी या जिस्मानी चोट लगने पर: जब कोई अचानक बीमार पड़ जाए या जिस्म पर कोई चोट आ जाए।
- छोटी से छोटी परेशानी पर भी: हदीस शरीफ़ में आता है कि नबी करीम ﷺ का चिराग़ अचानक बुझ गया तो आपने पढ़ा: ‘इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन’। हज़रत आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि.) ने पूछा: क्या यह भी मुसीबत है? आप ﷺ ने फरमाया: “हाँ, जो चीज़ भी मोमिन को तकलीफ़ पहुँचाए वह मुसीबत है।” (मिश्कातुल मसाबीह)।
- रास्ते में कांटा चुभने या जूती का तस्मा टूटने पर: यहाँ तक कि अगर रास्ते में चलते हुए पैर में ठोकर लग जाए या कांटा चुभ जाए, तब भी यह कलमा पढ़ना सुन्नत है।
मुसीबत के वक़्त की मुकम्मल मसनून दुआ (सहीह मुस्लिम)
सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या 918) में उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: “जब किसी बंदे को कोई मुसीबत पहुंचे और वह ये दुआ पढ़े, तो अल्लाह तआला उसे उस मुसीबत का बेहतरीन अज्र (बदला) देता है और जो चीज़ छीनी गई है उससे बेहतर नेअमत अता फरमाता है:”
إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ، اللَّهُمَّ أْجُرْنِي فِي مُصِيبَتِي، وَأَخْلِفْ لِي خَيْرًا مِنْهَا
हिंदी उच्चारण: इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन, अल्लाहुम्मा-जुर्नी फ़ी मुसिबती, व-अख्लिफ़ ली खै़रम-मिन्हा।
हिंदी तर्जुमा: “बेशक हम अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी इस मुसीबत में अज्र अता फरमा, और मुझे इसका इससे बेहतर बदल अता फरमा।”
हज़रत उम्मे सलमा (रज़ि.) फरमाती हैं कि जब मेरे शौहर हज़रत अबू सलमा (रज़ि.) का इंतिक़ाल हुआ, तो मैंने यह दुआ पढ़ी। फिर अल्लाह तआला ने मुझे हज़रत अबू सलमा से भी बेहतर बदल यानी नबी-ए-करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ का निकाह अता फरमाया।
मौत की ख़बर सुनने पर ताज़ियत (सुन्नत जवाब) क्या दें?
जब कोई व्यक्ति आपको किसी के इंतिक़ाल की ख़बर दे, तो सबसे पहले ‘इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़ें। इसके बाद मरहूम के अहले-खाना (परिवार) को तसल्ली और सब्र की ताकीद करने के लिए नबी करीम ﷺ के ये मसनून अल्फाज़ कहें:
أَعْظَمَ اللَّهُ أَجْرَكَ، وَأَحْسَنَ عَزَاءَكَ، وَغَفَرَ لِمَيِّتِكَ
उच्चारण: आ’ज़मल्लाहु अज्रक, व अह्स-ना अज़ा-अक, व ग़फ़-रा लिमय्यितिक।
तर्जुमा: “अल्लाह तआला आपके सब्र का अज्र बड़ा करे, आपको बेहतरीन सब्र की तौफ़ीक़ दे, और आपके मरहूम की मग़फ़िरत (माफ़ी) फरमाए।”
सब्र करने वालों के लिए अल्लाह तआला के 3 अज़ीम इनाम
सूरह अल-बक़रह की आयत 157 में अल्लाह तआला उन लोगों के लिए तीन बड़े इनामों का ज़िक्र फरमाता है जो मुसीबत के वक़्त इस्तिरजा पढ़ते हैं और सब्र का दामन थामते हैं:
| इनाम (Inam) | अरबी लफ्ज़ | शरीअत में फ़ज़ीलत व फ़ायदा |
|---|---|---|
| 1. सलावात (ख़ास इनायतें) | صَلَوَاتٌ | अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की तरफ से उस बंदे की तारीफ़ और गुनाहों की बख़्शिश होती है। |
| 2. रहमत (ख़ास दया) | رَحْمَةٌ | दिल को सुकून, इत्मीनान और दोनों जहान की भलाई नसीब होती है। |
| 3. हिदायत याफ्ता होना | الْمُهْتَدُونَ | अल्लाह तआला ऐसे सब्र करने वालों को सीधे रास्ते पर क़ायम रखता है। |
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन का हिंदी में क्या मतलब होता है?
इसका हिंदी तर्जुमा है: “बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और हम सबको उसी की तरफ लौट कर जाना है।” यह कलमा इंसान को याद दिलाता है कि दुनिया की हर चीज़ और खुद इंसान अल्लाह की मिल्कियत है।
2. क्या यह कलमा सिर्फ किसी की मौत पर ही पढ़ा जाता है?
जी नहीं। मौत के अलावा किसी भी तरह की परेशानी, माली नुक़सान, बीमारी, जिस्मानी चोट, या छोटी से छोटी तकलीफ़ (जैसे रास्ते में ठोकर लगना या लाइट जाना) पर भी इसे पढ़ना नबी करीम ﷺ की मसनून सुन्नत है।
3. जब कोई यह दुआ पढ़े तो उसका जवाब क्या देना चाहिए?
अगर किसी के इंतिक़ाल की ख़बर दी गई हो, तो आप भी ‘इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन’ कहें और साथ में कहें: ‘आ’ज़मल्लाहु अज्रक, व अह्स-ना अज़ा-अक, व ग़फ़-रा लिमय्यितिक’ (अल्लाह आपके सब्र का अज्र बड़ा करे और मरहूम की मग़फ़िरत फरमाए)।
4. कुरआन मजीद की किस सूरह में यह आयत आई है?
यह पवित्र कुरआन के दूसरे पारे में मौजूद सूरह अल-बक़रह (Surah Al-Baqarah) की आयत संख्या 156 का हिस्सा है।
5. मुसीबत के वक़्त इस कलमे के साथ कौन सी मसनून दुआ पढ़नी चाहिए?
सहीह मुस्लिम के अनुसार यह मुकम्मल दुआ पढ़नी चाहिए: ‘इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन, अल्लाहुम्मा-जुर्नी फ़ी मुसिबती, व-अख्लिफ़ ली खै़रम-मिन्हा’। अल्लाह तआला इसका बेहतरीन अज्र और खोई हुई चीज़ से बेहतर बदल अता फरमाता है।