इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रमुल हराम (Muharram) अल्लाह तआला के मुक़र्रर किए गए चार हुरमत (अदब व एहतिराम) वाले मुक़द्दस महीनों में से एक है। इस महीने की दसवीं तारीख़ को इस्लामी इतिहास में यौम-ए-आशूरा (Day of Ashura) के नाम से जाना जाता है। आशूरा का दिन अपनी तारीखी अज़मत, हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और बनी इसराईल को फ़िरऔन के ज़ुल्म से नजात मिलने, और नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और शोहदा-ए-कर्बला की अज़ीम शहादत की वजह से बेहद अहमियत रखता है।
इस मुबारक़ दिन और इसकी रात (शब-ए-आशूरा) में अल्लाह तआला की रज़ा, गुनाहों की माफ़ी और दर्जात की बुलंदी के लिए नफ़्ल नमाज़ें, रोज़ा, तिलावत और दुआएं करना बहुत बड़ी फ़ज़ीलत का बाइस है। इस मुकम्मल गाइड में हम आशूरा की नमाज़ का तरीका (Ashura Ki Namaz Ka Tarika), रकअतों की तादाद, नीयत, सही वक़्त, आशूरा का रोज़ा और इस दिन के मसनून आमाल को शरीअत की रोशनी में तफ़सील से जानेंगे।
आशूरा के दिन कोई मख़सूस फ़र्ज़ नमाज़ नहीं है, बल्कि यह नफ़्ल इबादत का दिन है। शब-ए-आशूरा या 10 मुहर्रम के दिन 2, 4 या 6 रकअत नफ़्ल नमाज़ पढ़ना और सलातुत तस्बीह अदा करना मुस्तहब है। साथ ही 9वीं और 10वीं मुहर्रम का रोज़ा रखना सुन्नत-ए-मुअक्कदा है जिससे पिछले एक साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं।
आशूरा क्या है और इसकी शरई हैसियत? (What is Ashura?)
अरबी भाषा में ‘अशरा’ (Ashara) का अर्थ ‘दस’ (10) होता है, और मुहर्रम के दसवें दिन को इसी मुनासबत से आशूरा कहा जाता है। सहीह बुखारी (हदीस 2004) में हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ लाए, तो आपने देखा कि यहूदी आशूरा के दिन रोज़ा रखते हैं। आप ﷺ ने उनसे दरियाफ़्त फ़रमाया कि यह कैसा दिन है जिसमें तुम रोज़ा रखते हो?
उन्होंने अर्ज़ किया कि यह वह मुबारक़ दिन है जब अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनकी क़ौम को फ़िरऔन से नजात दी और फ़िरऔन को लश्कर समेत दरिया-ए-नील (लाल सागर) में ग़र्क़ कर दिया। इसलिए हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के शुक्राने के तौर पर रोज़ा रखा था। इस पर रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “मूसा (अलैहिस्सलाम) पर तुम्हारा जितना हक़ है, उससे कहीं ज़्यादा हक़ हमारा है।” इसके बाद आप ﷺ ने ख़ुद भी रोज़ा रखा और सहाबा-ए-किराम को भी इस दिन रोज़ा रखने और इबादत करने का हुक्म दिया।
आशूरा की नमाज़ कितनी रकअत होती है? (Kitni Rakat Hoti Hai?)
इस्लामी शरीअत में आशूरा के दिन कोई अलग से ‘फ़र्ज़’ या ‘वाजिब’ नमाज़ मुक़र्रर नहीं है। फ़र्ज़ नमाज़ें सिर्फ़ वही 5 वक़्त की हैं जो रोज़ाना पढ़ी जाती हैं। आशूरा के दिन पढ़ी जाने वाली तमाम नमाज़ें नफ़्ल (स्वैच्छिक इबादत) होती हैं।
हदीस और फ़ुक़हा-ए-किराम (जैसे शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. की ‘ग़ुन्यतुत तालिबीन’ और इमाम ग़ज़ाली रह. की ‘एहयाउल उलूम’) की रोशनी में आशूरा के दिन और रात में निम्नलिखित नफ़्ल नमाज़ें पढ़ी जाती हैं:
- 4 रकअत नफ़्ल नमाज़ (एक सलाम के साथ): यह सबसे मशहूर और मामूल का तरीका है जिसमें सूरह फ़ातिहा के बाद आयतल कुर्सी और सूरह इख़्लास की कसरत की जाती है।
- 2-2 रकअत करके 4 या 6 रकअत नफ़्ल: चाश्त (दोपहर से पहले) या इशराक़ के वक़्त 2-2 रकअत करके नफ़्ल पढ़ना।
- सलातुत तस्बीह (4 रकअत): यौम-ए-आशूरा के दिन सलातुत तस्बीह पढ़ना अफ़ज़ल तरीन आमाल में से है, जिससे तमाम ज़िंदगी के गुनाह माफ़ होने की बशारत हदीस में आई है।
आशूरा की नमाज़ का सही वक़्त (Ashura Namaz Timing)
आशूरा की नफ़्ल नमाज़ दो अलग-अलग औक़ात में पढ़ी जा सकती है:
- शब-ए-आशूरा (9वीं और 10वीं मुहर्रम की रात): ईशा की नमाज़ के बाद से लेकर फज्र की अज़ान तक का वक़्त शब-ए-आशूरा की इबादत का है। सबसे अफ़ज़ल वक़्त रात का आख़िरी तिहाई पहर यानी तहज्जुद का समय होता है।
- यौम-ए-आशूरा (10 मुहर्रम का दिन): सूरज निकलने के 15-20 मिनट बाद (इशराक़ के वक़्त) से लेकर ज़वाल (दोपहर 12 बजे से पहले चाश्त के वक़्त) तक, या ज़ुहर की नमाज़ के बाद अस्र तक नफ़्ल नमाज़ पढ़ी जा सकती है।
सूरज निकलते समय (तुलू-ए-आफ़ताब), ठीक दोपहर के वक़्त (ज़वाल/निस्फ़ुन्नहार) और सूरज डूबते समय (ग़ुरूब-ए-आफ़ताब) किसी भी क़िस्म की नफ़्ल नमाज़ पढ़ना मकरूह-ए-तहरीमी (मना) है। इन औक़ात में सिर्फ़ ज़िक्र व अस्तग़फ़ार करें।
आशूरा की नमाज़ की नीयत (Niyat Ka Tarika)
नमाज़ के लिए दिल का इरादा ही काफ़ी होता है, लेकिन ज़बान से भी दोहरा लेना मुस्तहब है ताकि ज़हन पूरी तरह नमाज़ की तरफ़ मुतवज्जेह हो जाए:
4 रकअत नफ़्ल नमाज़ की नीयत (हिंदी में)
“नीयत की मैंने चार रकअत नमाज़ नफ़्ल आशूरा (यौम-ए-आशूरा), वास्ते अल्लाह तआला के, मुँह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहु अकबर।”
2 रकअत नफ़्ल नमाज़ की नीयत
“नीयत की मैंने दो रकअत नमाज़ नफ़्ल आशूरा, वास्ते अल्लाह तआला के, मुँह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़, अल्लाहु अकबर।”
आशूरा की नमाज़ का क़दम-दर-क़दम तरीका (Step-by-Step)
आशूरा के दिन 4 रकअत नफ़्ल नमाज़ एक सलाम के साथ पढ़ने का तरीका बुज़ुर्गाने दीन से मनक़ूल है। इसका क़दम-दर-क़दम मुकम्मल तरीका नीचे दिया गया है:
पहली रकअत:
- क़िब्ला रुख़ खड़े होकर ‘अल्लाहु अकबर’ कहें और हाथ बांध लें।
- सना पढ़ें: ‘सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका व तबारकस्मूका व तआला जद्दुका व ला इलाहा गैरुक।’
- तअव्वुज़ (अऊजु बिल्लाहि…) और तस्मिया (बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम) पढ़ें।
- पूरी सूरह फ़ातिहा (अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन…) पढ़ें और आमीन कहें।
- सूरह फ़ातिहा के बाद एक बार आयतल कुर्सी पढ़ें, और उसके बाद 3 बार (या 11 बार) सूरह अल-इख़्लास (क़ुल हुवल्लाहु अहद) पढ़ें। (अगर आयतल कुर्सी याद न हो, तो सिर्फ़ सूरह इख़्लास भी पढ़ सकते हैं)।
- ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए रुकूअ में जाएं और 3 बार ‘सुब्हाना रब्बियल अज़ीम’ पढ़ें।
- ‘समिअल्लाहु लिमन हमिदह’ कहते हुए सीधे खड़े हों (क़ौमा) और कहें ‘रब्बना लकल हम्द’।
- दो सजदे मुकम्मल करें, हर सजदे में 3 बार ‘सुब्हाना रब्बियल आला’ कहें। फिर दूसरी रकअत के लिए खड़े हो जाएं।
दूसरी रकअत:
- बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह फ़ातिहा पढ़ें।
- सूरह फ़ातिहा के बाद पहली रकअत की तरह एक बार आयतल कुर्सी और 3 बार सूरह इख़्लास पढ़ें।
- रुकूअ, क़ौमा और दोनों सजदे अदा करें।
- दूसरे सजदे के बाद क़ादा-ए-उला (पहली बैठक) में बैठें और सिर्फ़ अत्तहिय्यात (तशह्हुद) पढ़ें। इसके बाद सलाम फेरे बिना ‘अल्लाहु अकबर’ कहते हुए तीसरी रकअत के लिए सीधे खड़े हो जाएं।
तीसरी रकअत:
- तीसरी रकअत में खड़े होकर सना और तअव्वुज़ नहीं पढ़ना है, सीधे बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह फ़ातिहा पढ़ें।
- सूरह फ़ातिहा के बाद एक बार आयतल कुर्सी और 3 बार सूरह इख़्लास पढ़ें।
- रुकूअ, क़ौमा और दोनों सजदे मुकम्मल करके चौथी रकअत के लिए खड़े हों।
चौथी रकअत:
- बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह फ़ातिहा पढ़ें, और उसके बाद आयतल कुर्सी व 3 बार सूरह इख़्लास मिलाएं।
- रुकूअ, क़ौमा और दोनों सजदे मुकम्मल करें।
- क़ादा-ए-अख़ीरा (अंतिम बैठक): ज़मीन पर बैठ जाएं और तरतीबवार अत्तहिय्यात, दुरूद-ए-इब्राहीमी और दुआ-ए-मासूरा पढ़ें।
- पहले दाएं कंधे की तरफ़ और फिर बाएं कंधे की तरफ़ ‘अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाह’ कहकर नमाज़ मुकम्मल करें।
आशूरा के दिन सलातुत तस्बीह पढ़ने का तरीका
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने चचा हज़रत अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) को सलातुत तस्बीह की तालीम देते हुए फ़रमाया था कि इस नमाज़ से इंसान के अगले-पिछले, पुराने-नए, अनजाने और जानबूझकर किए गए तमाम गुनाह माफ़ हो जाते हैं (अबू दाऊद: 1297)।
आशूरा के दिन 4 रकअत सलातुत तस्बीह पढ़ना निहायत ही बाइस-ए-सवाब है। इसमें पूरी नमाज़ के दौरान 300 बार तीसरा कलमा पढ़ा जाता है:
“सुब्हानल्लाहि वल हम्दु लिल्लाहि व ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर”
(Subhanallahi Wal Hamdulillahi Wa La Ilaha Illallahu Wallahu Akbar)
हर रकअत में यह तस्बीह 75 बार पढ़ी जाती है (सूरह फ़ातिहा व सूरह के बाद 15 बार, रुकूअ में 10 बार, क़ौमा में 10 बार, पहले सजदे में 10 बार, जलसा में 10 बार, दूसरे सजदे में 10 बार, और दूसरे सजदे के बाद बैठकर 10 बार)। इस तरह 4 रकअतों में कुल 300 मर्तबा तस्बीह मुकम्मल होती है।
आशूरा का रोज़ा (Fasting on the Day of Ashura)
आशूरा के दिन की सबसे बड़ी और सहीह हदीस से साबित इबादत रोज़ा (Fasting) है। नफ़्ल नमाज़ों के साथ रोज़ा रखना आशूरा की सबसे अफ़ज़ल सुन्नत है:
“रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से आशूरा के दिन के रोज़े के बारे में पूछा गया, तो आप ﷺ ने फ़रमाया: यह पिछले एक साल के (सगीरा) गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है।”
— सहीह मुस्लिम: 1162
दो रोज़े रखने की सुन्नत (9 और 10 मुहर्रम)
सहीह मुस्लिम (हदीस 1134) में हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है कि जब सहाबा ने अर्ज़ किया कि या रसूलुल्लाह! यहूदी और ईसाई भी आशूरा के दिन की ताज़ीम करते हैं, तो आप ﷺ ने फ़रमाया: “अगर मैं आइंदा साल ज़िंदा रहा, तो नौवीं मुहर्रम का रोज़ा भी (दसवीं के साथ) ज़रूर रखूँगा।” इसलिए सुन्नत यह है कि सिर्फ़ 10 मुहर्रम का अकेला रोज़ा न रखा जाए, बल्कि 9वीं और 10वीं मुहर्रम (या 10वीं और 11वीं मुहर्रम) के दो रोज़े रखे जाएं।
आशूरा के दिन के मुस्तहब आमाल और दुआएं
नमाज़ और रोज़े के अलावा आशूरा के दिन निम्नलिखित नेक आमाल करने की खास ताकीद उलमा और मुहद्दिसीन ने की है:
- अहलो अयाल पर ख़र्च में वुसअत करना: हदीस शरीफ़ में आता है कि “जो शख़्स आशूरा के दिन अपने बाल-बच्चों और घरवालों पर खाने-पीने और ख़र्च में कुशादगी (दिल खोलकर ख़र्च) करेगा, अल्लाह तआला पूरे साल उसके रिज़्क़ में बरकत और कुशादगी अता फ़रमाएगा।” (अल-बैहक़ी: शुअबुल ईमान)।
- दुआ-ए-आशूरा पढ़ना: नमाज़ और इबादत के बाद ‘दुआ-ए-आशूरा’ पढ़ना निहायत बाबरकत माना जाता है।
- कसरत से तौबा व अस्तग़फ़ार: हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा इसी दिन क़बूल हुई थी, इसलिए इस दिन ‘अस्तग़फ़िरुल्लाहा रब्बी मिन कुल्लि ज़म्बिव व अतूबु इलैह’ कसरत से पढ़ें।
- सदक़ा व खैरात: ग़रीबों, मिस्कीनों और यतीमों की मदद करना और उन पर शफ़क़त का हाथ फेरना बहुत बड़े सवाब का काम है।
आशूरा के दिन किन ग़लत रसूमात से बचना चाहिए?
जहाँ आशूरा का दिन इबादत और दुआ का है, वहीं इस दिन शरीअत के ख़िलाफ़ रसूमात और बिदअत से बचना बेहद ज़रूरी है:
- सीना-कोबी और मातम की मनाही: सहीह बुखारी (हदीस 1294) में रसूलुल्लाह ﷺ ने साफ़ इरशाद फ़रमाया: “वह शख़्स हममें से नहीं है जो अपने रुख़सार (गाल) पीटे, गिरेबान फाड़े और जाहिलियत जैसी चीख़-पुकार करे।” हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) की शहादत पर ग़म होना स्वाभाविक है, लेकिन जिस्म को ज़ख़्मी करना शरीअत में हराम है।
- ईसाल-ए-सवाब का सही तरीका: शोहदा-ए-कर्बला की याद में क़ुरआन ख्वानी करना, सदक़ा देना, ग़रीबों को खाना खिलाना और उनके लिए दर्जात की बुलंदी की दुआ करना ही सुन्नत तरीका है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
नहीं, आशूरा के दिन कोई फ़र्ज़ नमाज़ नहीं होती। इस दिन पढ़ी जाने वाली तमाम नमाज़ें नफ़्ल (मुस्तहब) हैं। इन्हें पढ़ने से बेहिसाब सवाब मिलता है, लेकिन न पढ़ने पर कोई गुनाह नहीं होता।
शब-ए-आशूरा में तहज्जुद के वक़्त (रात के आख़िरी पहर) नमाज़ पढ़ना सबसे अफ़ज़ल है। दिन के समय सूरज निकलने के 20 मिनट बाद से लेकर दोपहर 12 बजे तक चाश्त के वक़्त, या ज़ुहर के बाद नफ़्ल नमाज़ पढ़ी जा सकती है।
सिर्फ़ 10 मुहर्रम का अकेला रोज़ा रखना मकरूह-ए-तंजीही (नापसंदीदा) बताया गया है ताकि यहूदियों से मुशाबहत न हो। बेहतर और सुन्नत तरीका यह है कि 9वीं और 10वीं मुहर्रम, या 10वीं और 11वीं मुहर्रम के दो रोज़े रखे जाएं।
जी हाँ! महिलाओं के लिए घर के एकांत में नफ़्ल नमाज़, सलातुत तस्बीह और क़ुरआन की तिलावत करना मर्दों की मस्जिद की इबादत के बराबर अज़ीम सवाब रखता है।
हदीस शरीफ़ में आया है कि जो शख़्स आशूरा के दिन अपने अहलो अयाल पर ख़र्च में वुसअत (उदारता) करता है, अल्लाह तआला पूरे साल उसके रिज़्क़ और रोज़ी में बरकत अता फ़रमाता है। हज़रत सुफ़ियान सौरी (रह.) फ़रमाते हैं कि हमने पचास साल इसका तजुर्बा किया और हमेशा बरकत ही पाई।