इस्लाम में जुमे का दिन तमाम दिनों का सरदार (सय्यिदुल अय्याम) माना गया है। इस मुकद्दस दिन की फ़ज़ीलत, बरकतें और मसनून आमाल मर्द और औरत दोनों के लिए बेहद अज़ीम हैं। अक्सर ख़वातीन (महिलाओं) के ज़हन में यह सवाल रहता है कि औरतों के लिए जुमा की नमाज़ का तरीका (Jumma Ki Namaz Ka Tarika For Ladies In Hindi) क्या है, क्या औरतों पर जुमा फ़र्ज़ है, घर पर जुमे के दिन कौन सी नमाज़ पढ़ी जाती है और उसकी सही नियत क्या है।
दीनी मालूमात की कमी की वजह से कई ख़वातीन यह समझती हैं कि उन्हें घर पर 2 रकात जुमे की नमाज़ पढ़नी होती है, जबकि कुछ समझती हैं कि जब तक मस्जिद में जुमा ख़त्म न हो तब तक घर पर नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती। इस जामे गाइड में हम हनफ़ी फ़िक़्ह और सहीह अहादीस की रौशनी में औरतों के लिए जुमे की नमाज़ के तमाम शरई अहकाम, घर पर ज़ुहर की 12 रकात की तरतीब, नियत के सही अलफ़ाज़ और जुमे के मसनून आमाल को आसान हिंदी में जानेंगे।
बुनियादी शरई हुक्म: शरीअत-ए-इस्लामिया के मुताबिक़ औरतों पर जुमे की नमाज़ फ़र्ज़ नहीं है। ख़वातीन जुमे के दिन अपने घर पर मामूल के मुताबिक़ ज़ुहर (Zohr) की नमाज़ ही अदा करेंगी। जुमे की 2 रकात नमाज़ सिर्फ मस्जिद में जमाअत और ख़ुत्बे के साथ ही अदा होती है, घर पर अकेले जुमे की नमाज़ नहीं होती।
क्या औरतों पर जुमे की नमाज़ फ़र्ज़ है? (हदीस का हवाला)
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जुमे की नमाज़ की फ़र्ज़ियत के हवाले से साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया है:
“जुमे की नमाज़ जमाअत के साथ अदा करना हर मुसलमान पर हक़ और फ़र्ज़ है, सिवाय चार अफ़राद के: गुलाम, औरत, बच्चा और बीमार।”
— (सुनन अबू दाऊद: 1067)
इस हदीस शरीफ़ से बिल्कुल वाज़ेह है कि ख़वातीन पर मस्जिद जाकर जुमे की नमाज़ पढ़ना लाज़िम नहीं किया गया। अल्लाह तआला ने औरतों के घरेलू पर्दा और मसरूफ़ियात को देखते हुए उन पर यह आसानी फ़रमाई है कि वे अपने घर के अंदरूनी हिस्से में सुकून से ज़ुहर की नमाज़ अदा करें।
जुमे के दिन घर पर औरतों की नमाज़ का वक़्त (एक आम ग़लतफ़हमी)
अवाम में यह बात बहुत मशहूर है कि जुमे के दिन औरतें घर पर तब तक नमाज़ नहीं पढ़ सकतीं जब तक मोहल्ले की मस्जिद में जुमा ख़त्म न हो जाए। यह ख्याल शरीअत के एतबार से दुरुस्त नहीं है:
- सहीह मसला: जैसे ही ज़ुहर का शरई वक़्त शुरू हो जाए (यानी दोपहर में ज़वाल ख़त्म होते ही), औरतें तुरंत अपने घर पर ज़ुहर की नमाज़ अदा कर सकती हैं।
- मस्जिद के जुमे का इंतज़ार ज़रूरी नहीं: मस्जिद में जुमे की जमाअत कब ख़त्म होती है या ख़ुत्बा कब होता है, इससे घर पर नमाज़ पढ़ने वाली ख़वातीन का कोई ताल्लुक़ नहीं है। वे पहले वक़्त में ही अपनी नमाज़ पूरी कर सकती हैं।
जुमे के दिन औरतों की नमाज़ की रकात संख्या (कुल 12 रकात)
चूंकि औरतें घर पर ज़ुहर की नमाज़ पढ़ती हैं, इसलिए जुमे के दिन भी आम दिनों की ज़ुहर की तरह कुल 12 रकात नमाज़ अदा की जाएगी:
| क्रम संख्या | नमाज़ की किस्म | रकात | शरई दर्जा |
|---|---|---|---|
| 1 | पहले की 4 रकात सुन्नत | 4 रकात (एक सलाम से) | सुन्नत-ए-मुअक्कदा |
| 2 | ज़ुहर के 4 रकात फ़र्ज़ | 4 रकात (एक सलाम से) | फ़र्ज़-ए-ऐन |
| 3 | फ़र्ज़ के बाद 2 रकात सुन्नत | 2 रकात (एक सलाम से) | सुन्नत-ए-मुअक्कदा |
| 4 | आख़िर में 2 रकात नफ़्ल | 2 रकात (एक सलाम से) | नफ़्ल (मुस्तहब) |
| कुल रकात संख्या | 12 रकात | ||
जुमे के दिन औरतों की नमाज़ की नियत (Niyat In Hindi, English & Arabic)
दिल में यह इरादा होना कि आप अल्लाह के लिए ज़ुहर की नमाज़ अदा कर रही हैं, नमाज़ के सही होने के लिए काफ़ी है। ज़बान से नियत कहना मुस्तहब (बेहतर) है। यहाँ जुमे के दिन पढ़ी जाने वाली नमाज़ की नियत दी जा रही है:
4 रकात फ़र्ज़ की नियत हिंदी में:
“नियत की मैंने 4 रकात नमाज़ ज़ुहर की फ़र्ज़, वास्ते अल्लाह तआला के, वक़्त ज़ुहर का, रुख मेरा काबा शरीफ़ की तरफ, अल्लाहु अकबर।”
फ़र्ज़ की नियत रोमन इंग्लिश में:
“Niyat ki maine 4 rakat namaz Zohr ki Farz, waaste Allah Ta’ala ke, waqt Zohr ka, rukh mera Kaaba shareef ki taraf, Allahu Akbar.”
फ़र्ज़ की नियत अरबी में:
نَوَيْتُ أَنْ أُصَلِّيَ لِلّٰهِ تَعَالَى أَرْبَعَ رَكَعَاتِ صَلَاةِ الظُّهْرِ فَرْضَ اللّٰهِ تَعَالَى مُتَوَجِّهًا إِلَى جِهَةِ الْكَعْبَةِ الشَّرِيْفَةِ، اَللّٰهُ أَكْبَرُ
4 रकात सुन्नत की नियत (हिंदी में):
“नियत की मैंने 4 रकात नमाज़ ज़ुहर की सुन्नत, सुन्नत-ए-रसूलुल्लाह, वास्ते अल्लाह तआला के, रुख मेरा काबा शरीफ़ की तरफ, अल्लाहु अकबर।”

औरतों की नमाज़ पढ़ने का मुकम्मल तरीका (अरकान व बनावट)
हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ औरतों की नमाज़ में पर्दे और हया की हिफ़ाज़त के लिए कुछ मख़सूस आदाब मुक़र्रर हैं। नमाज़ अदा करते वक़्त इन बातों का ध्यान रखें:
- तकबीर-ए-तहरीमा: चादर या दुपट्टे के अंदर ही दोनों हाथों को कांधों या सीने की सीध तक उठाएं और “अल्लाहु अकबर” कहें (मर्दों की तरह कान की लौ तक नहीं ले जाना है)।
- हाथ बांधना: दाहिने हाथ की हथेली को बाएं हाथ की पुश्त पर रखकर सीने के ऊपर बांधें।
- क़ियाम व क़िराअत: पहले सना (सुब्हाना कल्लाहुम्मा…), फिर अऊज़ुबिल्लाह, बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह फ़ातिहा पढ़ें और उसके बाद क़ुरआन की कोई सूरह मिलाएं। औरतें तमाम किरात आहिस्ता आवाज़ में पढ़ेंगी।
- रुकू का अंदाज़: रुकू में बहुत ज़्यादा न झुकें। सिर्फ इतना झुकें कि हाथ घुटनों तक पहुंच जाएं। उंगलियों को मिलाकर घुटनों पर रखें और कुहनियों को पसलियों से चिपका कर रखें। 3 बार “सुब्हाना रब्बियल अज़ीम” कहें।
- सजदे का अंदाज़: सिमट कर सजदा करें। पेट को रानों से मिलाकर रखें, दोनों कुहनियां ज़मीन पर बिछाएं और दोनों पैर दाहिनी तरफ निकाल कर बिछा दें। 3 बार “सुब्हाना रब्बियल आला” कहें।
- क़ादा में बैठना (तवर्रुक): दोनों पैर दाहिनी तरफ निकाल कर बाएं कूल्हे के बल बैठें। अत्तहिय्यात, दुरूद-ए-इब्राहिमी और दुआ-ए-मासूरा पढ़कर दाएं-बाएं सलाम फेर दें।
अगर कोई ख़ातून मस्जिद में जुमे की नमाज़ पढ़े तो?
यदि किसी इलाके या मस्जिद में औरतों के लिए मुकम्मल शरई पर्दे, अलग वज़ूखाने और महफ़ूज़ रास्ते का इंतज़ाम हो और कोई ख़ातून मस्जिद में जाकर जुमे की जमाअत में शरीक होती हैं, तो उसके शरई अहकाम इस प्रकार हैं:
- नमाज़ दुरुस्त होगी: इमाम के पीछे 2 रकात जुमे की नमाज़ अदा करने से उनका जुमा मुकम्मल हो जाएगा।
- ज़ुहर पढ़ने की ज़रूरत नहीं: जब जुमा अदा हो गया, तो उन पर से उस दिन की ज़ुहर साक़ित हो गई। उन्हें अलग से घर आकर ज़ुहर पढ़ने की ज़रूरत नहीं होगी।
- मस्जिद में नियत: ऐसी सूरत में वे “2 रकात नमाज़ जुमे की फ़र्ज़, पीछे इस इमाम के” की नियत करेंगी।
- अफ़ज़ल क्या है? हदीस के मुताबिक़ ख़वातीन के लिए घर के अंदर नमाज़ पढ़ना मस्जिद जाने के मुक़ाबले ज़्यादा सवाब और अफ़ज़लियत रखता है।
जुमे के दिन औरतों के लिए 5 मसनून आमाल
जुमे के दिन की बरकतों को समेटने के लिए ख़वातीन को नमाज़ के साथ-साथ इन ख़ास मसनून आमाल का एहतिमाम करना चाहिए:
- ग़ुस्ल व पाकीज़गी: जुमे के दिन ग़ुस्ल करना, मिस्वाक करना, नाख़ून काटना और साफ़-सुथरे कपड़े पहनना सुन्नत है।
- सूरह अल-कहफ़ की तिलावत: हदीस में आता है कि जो शख़्स जुमे के दिन सूरह कहफ़ पढ़ता है, उसके लिए एक जुमे से दूसरे जुमे तक नूर रोशन रहता है। ख़वातीन जुमे के दिन सूरह कहफ़ की तिलावत ज़रूर करें।
- कसरत से दुरूद शरीफ़: जुमे के दिन नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर कसरत से दुरूद भेजना चाहिए। ख़ास तौर पर असर के बाद 80 मर्तबा दुरूद-ए-पाक पढ़ने की बड़ी फ़ज़ीलत आई है।
- दुआ-ए-इजाबत (क़ुबूलियत की घड़ी): जुमे के दिन एक घड़ी ऐसी आती है जिसमें बंदा जो जायज़ दुआ मांगता है, अल्लाह तआला उसे क़ुबूल फ़रमाता है। अक्सर उलमा के मुताबिक़ यह घड़ी असर से मग़रिब के बीच होती है।
- सदक़ा व ख़ैरात: जुमे के दिन ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को सदक़ा देना आम दिनों से ज़्यादा बाइस-ए-सवाब है।
दीनी रहनुमाई और नमाज़ से जुड़े अहम मक़ालात:
- सूरह कहफ़ हिंदी में तर्जुमा और फ़ज़ीलत (जुमे की ख़ास तिलावत)
- औरतों के लिए तरावीह की नमाज़ की नियत और तरीका (20 रकात)
- सलातुत तस्बीह की नमाज़ का तरीका और तस्बीह के कलिमात
- आयत ए खमसा हिंदी में तर्जुमा सहित (क़ुरआन मजीद की 5 मुबारका आयतें)
- दुआ ए निस्फ शाबान हिंदी में तर्जुमा सहित (शब-ए-बरात की मसनून दुआ)
- तहियतुल वज़ू की नमाज़ का सही तरीका, नियत और फ़ज़ीलत
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या औरतों को जुमे के दिन जुमा पढ़ना होता है या ज़ुहर?
औरतों पर जुमे की नमाज़ फ़र्ज़ नहीं है। ख़वातीन जुमे के दिन अपने घर पर मामूल के मुताबिक़ ज़ुहर की नमाज़ (कुल 12 रकात: 4 सुन्नत, 4 फ़र्ज़, 2 सुन्नत, 2 नफ़्ल) ही अदा करेंगी।
2. क्या औरतें घर पर अकेले 2 रकात जुमे की नमाज़ पढ़ सकती हैं?
नहीं, घर पर तन्हा (अकेले) जुमे की नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती। जुमे की नमाज़ के लिए जमाअत, ख़ुत्बा और हाकिम/इमाम की मौजूदगी शर्त है। घर पर सिर्फ 4 रकात ज़ुहर की नमाज़ ही पढ़ी जाएगी।
3. क्या घर पर नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद के जुमा ख़त्म होने का इंतज़ार करना होगा?
बिल्कुल नहीं। जैसे ही ज़ुहर का शरई वक़्त शुरू हो, औरतें तुरंत अपने घर पर ज़ुहर की नमाज़ पढ़ सकती हैं। मस्जिद में जुमे की जमाअत पूरी होने का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं है।
4. अगर कोई महिला मस्जिद जाकर जुमे की नमाज़ पढ़ ले तो क्या ज़ुहर पढ़नी होगी?
अगर कोई महिला मस्जिद में जाकर शरई पर्दे के साथ इमाम के पीछे 2 रकात जुमे की नमाज़ अदा कर लेती है, तो उसका फ़र्ज़ अदा हो जाएगा और उसे अलग से ज़ुहर की नमाज़ पढ़ने की ज़रूरत नहीं होगी।
5. जुमे के दिन औरतों के लिए सबसे अफ़ज़ल अमल क्या है?
अपने घर पर अव्वल वक़्त में ज़ुहर की नमाज़ पढ़ना, सूरह कहफ़ की तिलावत करना, कसरत से दुरूद शरीफ़ पढ़ना और असर से मग़रिब के बीच अल्लाह से दुआ मांगना सबसे अफ़ज़ल आमाल में शुमार हैं।