2 Kalma in Hindi: इस्लाम में दूसरा कलमा, जिसे कलिमा शहादत (Kalima Shahadat) कहा जाता है, ईमान और अकीदे की खुली गवाही देने का सबसे अहम कलिमा है। ‘शहादत’ का अरबी में अर्थ होता है ‘गवाही देना’ या ‘साक्षी होना’। जब कोई बंदा कलिमा शहादत पढ़ता है, तो वह पूरी दुनिया के सामने यह गवाही देता है कि वह केवल एक अल्लाह को अपना माबूद और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को अल्लाह का सच्चा बंदा और रसूल मानता है। इस मुकम्मल गाइड में दूसरे कलमे की शुद्ध अरबी इबारत (एराब सहित), हिंदी उच्चारण, शब्द-दर-शब्द तर्जुमा, वज़ू के बाद इसे पढ़ने की अज़ीम फ़ज़ीलत और हदीस के हवाले तफ़सील से दिए गए हैं।
दूसरा कलमा: अरबी इबारत, हिंदी उच्चारण और तर्जुमा
कलिमा शहादत को तशह्हुद (अत्तहियात) और अज़ान के कलिमात में भी पढ़ा जाता है। यह हर मुसलमान के दिन-रात के आमाल का अहम हिस्सा है:
हिंदी उच्चारण (Transliteration): अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीका लहू, व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।
अंग्रेज़ी उच्चारण (English): Ash-hadu an laa ilaaha illal-laahu wahdahoo laa shareeka lahoo, wa ash-hadu anna Muhammadan ‘abduhoo wa rasooluh.
हिंदी तर्जुमा (Meaning): मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार (शरीक) नहीं है; और मैं गवाही देता हूँ कि हज़रत मुहम्मद ﷺ उसके सच्चे बंदे और रसूल हैं।
दूसरे कलमे का शब्द-दर-शब्द अर्थ (Word by Word)
| अरबी शब्द | हिंदी उच्चारण | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|
| أَشْهَدُ | अशहदु | मैं गवाही देता हूँ |
| أَنْ لَّا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ | अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु | कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं |
| وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ | वहदहू ला शरीका लहू | वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं |
| وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا | व अशहदु अन्ना मुहम्मदन | और मैं गवाही देता हूँ कि हज़रत मुहम्मद ﷺ |
| عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ | अब्दुहू व रसूलुहू | अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं |
“अब्दुहू व रसूलुहू” का गहरा रूहानी रहस्य
दूसरे कलमे में हज़रत मुहम्मद ﷺ के लिए दो अलक़ाब (Titles) इस्तेमाल किए गए हैं:
- अब्दुहू (अल्लाह के बंदे): पहले यह इकरार किया गया कि आप ﷺ अल्लाह के बंदे हैं। इसका मक़सद यह है कि उम्मत किसी ग़लतफ़हमी में न पड़े, जैसे पिछली उम्मतों ने अपने नबियों को माबूद या खुदा का बेटा बना लिया था (जैसे ईसाइयों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथ किया)। आप ﷺ मखलूक हैं और केवल अल्लाह ही खालिक है।
- रसूलुहू (अल्लाह के रसूल): बंदा होने के बाद तुरंत यह गवाही दी गई कि आप ﷺ अल्लाह के रसूल हैं, ताकि कोई आपकी शान में ज़रा भी गुस्ताखी न कर सके। आप तमाम कायनात के लिए रहमतुल्लिल आलमीन और खातम-उन-नबिय्यीन (अंतिम पैगंबर) हैं।
हदीस शरीफ में कलिमा शहादत की अज़ीम फ़ज़ीलत
हदीस की किताबों में दूसरे कलमे के कई बेमिसाल इनाम बयान किए गए हैं:
- जन्नत के आठों दरवाज़े खुलना: सहीह मुस्लिम (234) की रिवायत में हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जो शख़्स अच्छी तरह मुकम्मल वज़ू करे और फिर कलिमा शहादत पढ़े, उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, वह जिस दरवाज़े से चाहे दाखिल हो जाए।”
- जहन्नम की आग हराम होना: सहीह बुखारी (128) की हदीस में हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: “जो बंदा सच्चे दिल से यह गवाही देता है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं, अल्लाह तआला उस पर जहन्नम की आग को हराम कर देता है।”
- अज़ान के बाद शफ़ाअत: जो शख़्स मुअज़्ज़िन की अज़ान के बाद कलिमा शहादत और दुरूद शरीफ पढ़ता है, उसके लिए नबी-ए-करीम ﷺ की शफ़ाअत वाजिब हो जाती है।
इस्लाम के अन्य कलिमे और ज़रूरी दुआएं:
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. दूसरा कलमा कौन सा है और इसे क्या कहते हैं?
दूसरे कलमे को ‘कलिमा शहादत’ कहा जाता है। इसके बोल हैं: “अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीका लहू व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।”
2. वज़ू के बाद दूसरा कलमा पढ़ने की क्या फ़ज़ीलत है?
सहीह मुस्लिम की हदीस के अनुसार, जो शख़्स अच्छी तरह वज़ू करने के बाद कलिमा शहादत पढ़ता है, उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और वह अपनी पसंद के किसी भी दरवाज़े से दाखिल हो सकता है।
3. पहले और दूसरे कलमे में मुख्य अंतर क्या है?
पहले कलमे (कलिमा तय्यिबा) में तौहीद और रिसालत का सीधा बयान है, जबकि दूसरे कलमे (कलिमा शहादत) में बंदा ‘अशहदु’ (मैं गवाही देता हूँ) कहकर व्यक्तिगत तौर पर अल्लाह के एक होने और नबी ﷺ के रसूल होने की आधिकारिक गवाही पेश करता है।
4. क्या नमाज़ के अंदर भी कलिमा शहादत पढ़ा जाता है?
हाँ, नमाज़ की कायदा (बैठक) में तशह्हुद (अत्तहियात) पढ़ते समय कलिमा शहादत पढ़ा जाता है और “अशहदु अल्ला इलाहा” कहते वक़्त शहादत की उंगली उठाई जाती है।
5. क्या गैर-मुस्लिम के इस्लाम स्वीकार करने के लिए कलिमा शहादत पढ़ना ज़रूरी है?
हाँ, जब कोई इंसान इस्लाम में दाखिल होता है, तो वह कलिमा शहादत को अपनी ज़बान से इकरार करके और दिल से मानकर इस्लाम का अकीदा अपनाता है।