हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) अल्लाह तआला के उलुल-अज़्म (महान) पैग़म्बरों में से हैं, जिनकी दास्तान क़ुरआने मजीद में हक़ और बातिल के फ़र्क़ को वाज़ेह करने वाला एक अज़ीम मोजिज़ा है। सदियों से दुनिया भर के इतिहासकारों, पुरातत्वविदों (Archaeologists) और आम लोगों के ज़हन में यह बड़ा सवाल रहता है कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती कहाँ है (Nooh Alaihis Salam Ki Kashti Kahan Hai) और यह इस वक़्त किस मुक़ाम पर मौजूद है। क़ुरआने करीम ने आज से चौदह सौ साल पहले ही सूरह हूद (आयत 44) में यह साफ़ ऐलान फ़रमा दिया था कि महाप्रलय (तूफ़ान-ए-नूह) के बाद कश्ती माउंट जूदी (Jabal Judi) पर जाकर ठहरी थी। इस विस्तृत और शोधपरक लेख में आप क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी, आधुनिक सैटेलाइट खोज, रडार परीक्षणों, बाइबिल व क़ुरआन के तुलनात्मक भूगोल और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर जानेंगे कि हज़रत नूह की कश्ती अभी कहाँ है, कहाँ मिली थी और इस वाक़ये से इंसानियत के लिए क्या सबक़ है।
وَقِيلَ يَا أَرْضُ ابْلَعِي مَاءَكِ وَيَا سَمَاءُ أَقْلِعِي وَغِيضَ الْمَاءُ وَقُضِيَ الْأَمْرُ وَاسْتَوَتْ عَلَى الْجُودِيِّ ۖ وَقِيلَ بُعْدًا لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
हिंदी उच्चारण: ‘वक़ी-ल या अरदुब्-ल’ई मा-अकि वया समा-उ अक़्लि’ई वग़ीज़ल-मा-उ वक़ुज़ियल अम्रु वस्तवत ‘अलल-जूदी वक़ी-ल बु’दल-लिल्क़ौमिज़-ज़ालिमीन।’
तर्जुमा: "और हुक्म दिया गया: ऐ ज़मीन! अपना पानी निगल ले, और ऐ आसमान! थम जा। चुनांचे पानी सुखा दिया गया, मामला तय पा गया और कश्ती ‘जूदी’ पहाड़ पर जा टिकी, और फ़रमा दिया गया कि ज़ालिम कौम के लिए हलाकत और दूरी है!" (क़ुरआन: सूरह हूद, आयत 44)
| पहलू (Aspect) | प्रमाणिक विवरण व क़ुरआनी हक़ीक़त |
|---|---|
| कश्ती ठहरने का स्थान | माउंट जूदी (Cudi Dağı / Jabal Judi) |
| वर्तमान भौगोलिक स्थिति | सिरनाक प्रांत (Şırnak Province), दक्षिण-पूर्वी तुर्की (सीरिया व इराक़ सीमा के क़रीब) |
| क़ुरआनी प्रमाण | सूरह हूद (11:44), सूरह अल-अंकबूत (29:14-15), सूरह अल-क़मर (54:13-15) |
| कश्ती की बनावट व सामग्री | मज़बूत तख़्तों (Planks) और कीलों (Nails) से निर्मित 3 मंज़िला विशाल जहाज़ |
| सवार होने वाले लोग व जीव | हज़रत नूह (अ.स.), लगभग 80 मोमिन और प्रत्येक जीव-जंतु का एक-एक नर-मादा जोड़ा |
| पुरातात्विक अनुसंधान | रडार इमेजिंग (GPR), 500 फ़ीट नौका-आकार आकृति और 5000 ईसा पूर्व के जीवाश्म |
1. क़ुरआने करीम की स्पष्ट गवाही: माउंट जूदी पर कश्ती का ठहरना
क़ुरआने मजीद किसी भी घटना का ज़िक्र बिना किसी लाग-लपेट के निहायत सटीकता के साथ करता है। जब हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की क़ौम ने 950 वर्षों की निरंतर दावत और नसीहत के बावजूद अल्लाह की वहदानियत को झुठला दिया और सरकशी की तमाम हदें पार कर दीं, तब अल्लाह तआला का अज़ाब तूफ़ान की शक्ल में नाज़िल हुआ। ज़मीन के चश्मों ने पानी उगलना शुरू किया और आसमान से मूसलाधार बारिश की झड़ी लग गई, जिससे समूची वादी जलमग्न हो गई।
अल्लाह तआला ने सूरह हूद की आयत 44 में लफ़्ज़ ‘वस्तवत अलल-जूदी’ (وَاسْتَوَتْ عَلَى الْجُودِيِّ) फ़रमाया। अरबी ज़बान में ‘इस्तिवा’ का अर्थ होता है किसी चीज़ का बिल्कुल सीधा, स्थिर और सुरक्षित तरीक़े से जम जाना। इसका अर्थ यह है कि तूफ़ान की प्रचंड लहरों और थपेड़ों के बाद कश्ती हिचकोले खाती हुई किसी घातक गड्ढे में नहीं गिरी, बल्कि पूरी हिफ़ाज़त के साथ माउंट जूदी की चपटी चोटी पर टिक गई।
इसके अतिरिक्त सूरह अल-क़मर (आयत 15) में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: "और बेशक हमने इस कश्ती को एक निशानी (आयत) बनाकर छोड़ दिया, तो क्या कोई है जो इससे नसीहत हासिल करे?" यह आयत इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि कश्ती का वजूद इतिहास में हमेशा के लिए मिटाया नहीं गया, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए एक जीवित गवाही के तौर पर महफ़ूज़ रखा गया।
2. माउंट जूदी (Cudi Dağı) कहाँ स्थित है? आधुनिक भूगोल व स्थिति
इंटरनेट पर लोग अक्सर खोजते हैं कि nooh ali salam ki kashti abhi kahan hai या nooh ali salam ki kashti kahan per hai। भौगोलिक मानचित्र के अनुसार, माउंट जूदी (तुर्की ज़बान में: Cudi Dağı) वर्तमान में तुर्की (Turkey) के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में सिरनाक (Şırnak) प्रांत में स्थित है।
- अक्षांश व देशांतर (Coordinates): 37°22′ उत्तर और 42°28′ पूर्व।
- ऊंचाई (Elevation): लगभग 2,089 मीटर (6,854 फ़ीट)।
- त्रिकोणीय सीमा (Border Intersection): यह पर्वत तुर्की, सीरिया और इराक़ की सीमाओं के अत्यंत निकट स्थित है।
- मेसोपोटामिया की घाटी: यह पर्वत दजला नदी (Tigris River) और प्राचीन मेसोपोटामिया के मैदानी इलाकों के ठीक मुहाने पर पड़ता है, जहाँ हज़रत नूह (अ.स.) की क़ौम आबाद थी।
माउंट जूदी की चोटी एक चौड़े और समतल पठार जैसी है। प्राचीन इतिहासकार बेरोसस (Berossus – ईसा पूर्व तीसरी सदी), बेबीलोन के अभिलेख, और मशहूर यहूदी इतिहासकार फ्लेवियस जोसीफस (Flavius Josephus – पहली सदी ईस्वी) ने अपनी किताबों में लिखा था कि कुर्दिस्तान के कॉर्डियन पहाड़ों (माउंट जूदी) पर नूह की कश्ती के हिस्से मौजूद हैं और लोग उसकी लकड़ी व अलकतरे को ताबीज़ व बरकत के लिए इस्तेमाल करते थे।
3. क़ुरआन बनाम बाइबिल: माउंट जूदी या माउंट अरारात?
पश्चिमी मीडिया और ईसाई धर्मग्रंथों में आमतौर पर ‘माउंट अरारात’ (Mount Ararat) का ज़िक्र मिलता है, जबकि क़ुरआने मजीद ने बिना किसी संशय के माउंट जूदी का नाम लिया है। आधुनिक भूवैज्ञानिक और ऐतिहासिक शोध यह साबित करते हैं कि क़ुरआन का बयान हर लिहाज़ से वैज्ञानिक और तार्किक कसौटी पर खरा उतरता है।
| मापदंड (Criteria) | क़ुरआने मजीद (माउंट जूदी) | बाइबिल की आधुनिक व्याख्या (माउंट अरारात) |
|---|---|---|
| पहाड़ का सटीक नाम | अल-जूदी (الجُودِيّ – Mount Judi) | अरारात के पहाड़ (Mountains of Ararat – जेनेसिस 8:4) |
| ऊंचाई व भौगोलिक बनावट | 2,089 मीटर; समतल पठार जहाँ से सुरक्षित उतरना आसान है | 5,137 मीटर; खड़ी ढलान, जानलेवा बर्फीली चोटी व ग्लेशियर |
| जीवन व उतरने की सुगमता | जानवरों, वृद्धों व बच्चों के लिए उतरना और खेती करना संभव | -40°C तापमान और खड़ी चट्टानों से उतरना असंभव |
| ऐतिहासिक सहमति | प्रारंभिक यहूदी (टार्गुम), ईसाई और मुस्लिम सभी स्रोत सहमत | 11वीं-12वीं सदी के बाद पश्चिमी क्रूसेडर्स द्वारा गढ़ा गया नाम |
बाइबिल की मूल हिब्रू भाषा में शब्द ‘उरारतु’ (Urartu) का उपयोग हुआ है, जो पूरे आर्मेनियाई पर्वतीय क्षेत्र का प्राचीन नाम था। माउंट जूदी स्वयं इसी वृहद भौगोलिक क्षेत्र की दक्षिणी सीमा में आता है। आधुनिक समय में जिसे ‘ग्रेट अरारात’ कहा जाता है, वह एक सक्रिय ज्वालामुखी पर्वत है जहाँ लगभग 5,137 मीटर की ऊंचाई पर हमेशा माइनस तापमान और ख़तरनाक बर्फ़ रहती है। वहाँ कश्ती का टिकना और हज़ारों जानवरों व इंसानों का ज़िंदा नीचे उतरना भौगोलिक रूप से संभव नहीं था। इसके विपरीत, माउंट जूदी की स्थिति हर लिहाज़ से उपयुक्त और जीवन की नई शुरुआत के लिए आदर्श थी।
4. पुरातात्विक खोज और वैज्ञानिक सबूत: कश्ती कहाँ मिली? (Nooh Ki Kashti Kahan Mili)
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में उपग्रह (सैटेलाइट), हवाई सर्वेक्षण और भू-भेदक रडार (Ground Penetrating Radar – GPR) के ज़रिए इस क्षेत्र में कई आश्चर्यजनक खोजें सामने आई हैं। जब लोगों के मन में यह सवाल आता है कि nooh ali salam ki kashti kahan mili, तो मुख्य रूप से दो प्रमुख शोध केंद्र में आते हैं:

दुरूपिनार संरचना (Durupınar Site) व रडार स्कैन
1959 में तुर्की वायुसेना के कैप्टन इलहान दुरुपिनार ने हवाई सर्वेक्षण के दौरान एक विशालकाय नौका के आकार की चट्टानी संरचना देखी। जब वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने 3D सब-सरफ़ेस रडार इमेजिंग की, तो ज़मीन के नीचे लकड़ी की बीम (Timbers), समानांतर ढाँचा (Ribs) और कीलों जैसी धातु के अवशेषों की स्पष्ट उपस्थिति दर्ज की गई। इस आकृति की लंबाई ठीक 515 फ़ीट (लगभग 157 मीटर) मापी गई, जो प्राचीन ग्रंथों में दर्ज कश्ती के पैमानों से हूबहू मेल खाती है।
तुर्की विश्वविद्यालयों की ताज़ा वैज्ञानिक जांच (2021-2024)
इस्तांबुल टेक्निकल यूनिवर्सिटी (ITU) और आग़री इब्राहिम सेसेन यूनिवर्सिटी (AİÇÜ) के भूवैज्ञानिकों व पुरातत्वविदों के संयुक्त दल ने इस क्षेत्र से मिट्टी और पत्थरों के लगभग 30 नमूने एकत्रित किए। प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया कि इन नमूनों में समुद्री मिट्टी, समुद्री जीवों के जीवाश्म और समुद्री सामग्री मौजूद है, जो साबित करती है कि यह पर्वतीय क्षेत्र 5000 से 3000 ईसा पूर्व (चालकोलिथिक काल) के दौरान भीषण जलप्रलय में डूबा हुआ था। यह कालक्रम तूफ़ान-ए-नूह के ऐतिहासिक समय से पूरी तरह मेल खाता है।
पत्थरीभूत लकड़ी (Petrified Wood) व विशाल लंगर पत्थर (Anchor Stones)
माउंट जूदी और आसपास के गांवों में भारी-भरकम तराशे हुए पत्थर मिले हैं, जिनमें कश्ती को स्थिर रखने वाले लंगर (Droge Stones / Anchor Stones) के सुराख़ मौजूद हैं। इसके अलावा वहाँ से ऐसी लकड़ी के टुकड़े प्राप्त हुए हैं जो हज़ारों वर्षों में खनिजों के प्रभाव से पत्थर में तब्दील (Petrified) हो चुके हैं और जिन पर कृत्रिम राल (Resin/Pitch) की परत चढ़ाई गई थी।
5. हज़रत नूह (अलैहि.) की कश्ती का निर्माण और तूफ़ान-ए-नूह का पूरा वाक़या
क़ुरआने मजीद में हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) का ज़िक्र 43 मर्तबा आया है और सूरह नूह नाम से एक मुकम्मल सूरह भी मौजूद है। अल्लाह तआला ने सूरह अल-अंकबूत (आयत 14) में फ़रमाया कि हज़रत नूह अपनी क़ौम में 950 साल तक रहे और उन्हें बुराइयों, शिर्क और ज़ुल्म से रोककर एक अल्लाह की इबादत की दावत देते रहे। लेकिन क़ौम के सरदारों ने उनका मज़ाक़ उड़ाया और उन्हें पागल व झूठा कहा।
सूखे मैदान में कश्ती बनाने का ईश्वरीय हुक्म
जब क़ौम की सरकशी हद से बढ़ गई, तो अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए वह्य भेजी: "और हमारी निगरानी में और हमारे हुक्म के मुताबिक़ एक कश्ती तैयार करो, और ज़ालिमों के बारे में मुझसे कोई सिफ़ारिश न करना, बेशक वे ग़र्क़ (डूबने) वाले हैं।" (सूरह हूद: 37)।
हज़रत नूह ने दरख़्त लगाए, उनकी लकड़ियां काटीं और सूखे रेगिस्तान व मैदान में एक बहुत बड़ा जहाज़ बनाना शुरू किया। जब क़ौम के काफ़िर वहाँ से गुज़रते तो हंसते हुए कहते: "ऐ नूह! पैग़म्बरी छोड़ अब बढ़ई का काम शुरू कर दिया? सूखे मैदान में कश्ती कैसे तैराओगे?" हज़रत नूह ने फ़रमाया: "अगर आज तुम हम पर हंसते हो, तो एक दिन हम तुम पर हंसेंगे जैसा तुम हंसते हो!"
कश्ती की बनावट व 3 मंज़िलें
इस्लामी रिवायतों और तफ़सीर (जैसे इब्ने कसीर) के अनुसार, कश्ती तीन मंज़िला (Three Decks) थी:
- निचली मंज़िल (Lower Deck): जंगली जानवरों, चौपायों और रेंगने वाले जीवों के लिए निर्धारित थी।
- मध्यम मंज़िल (Middle Deck): हज़रत नूह (अ.स.) और ईमान लाने वाले इंसानों के रहने के लिए थी।
- ऊपरी मंज़िल (Upper Deck): परिंदों, राशन, खाने-पीने की सामग्री और मीठे पानी के भंडारण के लिए रखी गई थी।
तन्दूर का उबलना और तूफ़ान का आरंभ
अल्लाह तआला ने तूफ़ान के आने की निशानी मुक़र्रर फ़रमाई थी: "ह़त्ता इज़ा जा-अ अम्रुना व फ़ारत-तन्नूर…" यानी जब हमारा हुक्म आ पहुंचा और तन्दूर से पानी उबलने लगा (सूरह हूद: 40)। तन्दूर आमतौर पर आग का स्थान होता है, लेकिन जब उससे पानी का फ़व्वारा फूटा तो हज़रत नूह समझ गए कि ईश्वरीय अज़ाब का समय आ चुका है।
अल्लाह के हुक्म से हर जानदार का एक-एक जोड़ा (नर व मादा) कश्ती में सवार कराया गया ताकि धरती से जीवन का बीज समाप्त न हो। हज़रत नूह और उनके साथ ईमान लाने वाले कुल लगभग 80 निष्ठावान मोमिन कश्ती में सवार हुए। कश्ती में क़दम रखते ही हज़रत नूह ने यह मुबारक दुआ पढ़ी:
بِسْمِ اللَّهِ مَجْرَاهَا وَمُرْسَاهَا ۚ إِنَّ رَبِّي لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ
सवारी की दुआ (सूरह हूद: 41): "बिस्मिल्लाहि मजरैहा व मुरसाहा, इन्ना रब्बी लग़फ़ूरुर-रहीम" (अल्लाह के नाम से इसका चलना और इसका ठहरना है, बेशक मेरा रब बड़ा बख़्शने वाला और मेहरबान है)।
पुत्र कनान की नाफ़रमानी और ईमान का इम्तिहान
तूफ़ान के दौरान पानी की लहरें पहाड़ों जितनी ऊंची उठ रही थीं। हज़रत नूह ने अपने बेटे ‘कनान’ (या याम) को पुकारा, जो किनारे पर खड़ा था: "ऐ मेरे प्यारे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा और काफ़िरों का साथ न दे!"
बेटे ने घमंड में उत्तर दिया: "मैं किसी ऊंचे पहाड़ की शरण ले लूँगा जो मुझे पानी से बचा लेगा।" हज़रत नूह ने फ़रमाया: "आज अल्लाह के अज़ाब से कोई बचाने वाला नहीं सिवाय उसके जिस पर अल्लाह रहम फ़रमाए।" इतने में एक प्रचंड लहर दोनों के बीच आ गई और बेटा डूब कर हलाक हो गया (सूरह हूद: 42-43)।
हज़रत नूह ने पैग़म्बराना शफ़क़त से अल्लाह के दरबार में अर्ज़ की: "ऐ मेरे रब! मेरा बेटा तो मेरे अहले खाना (परिवार) में से था और तेरा वादा सच्चा है।" अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "ऐ नूह! वह तेरे अहले खाना में से नहीं है, क्योंकि उसके अमल नेक नहीं थे।" (सूरह हूद: 46)। इस घटना ने क़यामत तक के लिए यह शाश्वत नियम स्थापित कर दिया कि इस्लाम में ख़ून के रिश्ते नहीं, बल्कि ईमान और अमल की पाकीज़गी ही इंसान की नजात का असली आधार है।
तूफ़ान का थमना और 10 मुहर्रम (आशूरा) का दिन
महीनों तक पानी के तूफ़ान में रहने के बाद जब ज़मीन ने पानी सोख लिया और आसमान का बरसना बंद हो गया, तो कश्ती माउंट जूदी पर सुरक्षित ठहर गई। इस्लामी तारीख़ की मोअतबर रिवायतों के मुताबिक़, जिस दिन कश्ती जूदी पहाड़ पर टिकी वह 10 मुहर्रम (यौमे आशूरा) का मुबारक़ दिन था। हज़रत नूह और उनके साथियों ने अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए इस दिन रोज़ा रखा।
क़ुरआन और अंबिया-ए-किराम के अन्य महत्वपूर्ण वाक़यात पढ़ें:
- क़सासुल अंबिया हिंदी में (Qasasul Ambiya In Hindi) – हज़रत आदम से लेकर तमाम पैग़म्बरों के पवित्र जीवन चरित्र
- असहाब-ए-कहफ़ का वाक़या हिंदी में (Ashab E Kahf) – 309 साल तक गुफ़ा में सोने वाले 7 मोमिनों का मोजिज़ा
- क़ुरआन शरीफ़ में कितने पारे, सूरह और आयतें हैं? – क़ुरआने मजीद का संपूर्ण विवरण
- सहीह बुख़ारी हिंदी में (Sahih Bukhari In Hindi) – प्रामाणिक हदीसों का संग्रह व तर्जुमा
6. वाक़या-ए-नूह से इंसानियत के लिए 4 अहम सबक़
- सब्र व निरंतर प्रयास (Patience): हज़रत नूह ने 950 वर्षों तक बिना थके और बिना निराश हुए सच्चाई का पैग़ाम दिया। यह सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर नतीजे की परवाह किए बिना निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।
- अल्लाह के अहकाम पर अडिग भरोसा: सूखे मैदान में कश्ती बनाना सांसारिक बुद्धि के विपरीत प्रतीत होता था, परंतु पैग़म्बर ने अल्लाह के आदेश पर बिना किसी हिचकिचाहट के अमल किया। ईश्वरीय आज्ञाकारिता में ही सच्ची विजय निहित है।
- ईमान सबसे बड़ा रिश्ता है: नूह (अ.स.) के बेटे का डूबना यह साबित करता है कि किसी बड़े नबी, पीर या नेक इंसान की संतान होने से निजात नहीं मिल सकती जब तक व्यक्ति का स्वयं का ईमान और आचरण शुद्ध न हो।
- सत्य की अंतिम विजय: दुनियावी दृष्टि से कमज़ोर और साधनहीन दिखने वाले 80 मोमिन बच गए, जबकि सत्ता और धन के मद में चूर पूरी कौम पानी के तूफ़ान में ग़र्क़ हो गई।
Frequently Asked Questions (FAQs) – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती इस वक़्त कहाँ है (Nooh ali salam ki kashti is waqt kahan hai)?
क़ुरआने मजीद (सूरह हूद: 44) के स्पष्ट बयान के अनुसार, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती माउंट जूदी (Cudi Dağı) पर ठहरी थी। यह पर्वत वर्तमान समय में दक्षिण-पूर्वी तुर्की (Turkey) के सिरनाक (Şırnak) प्रांत में स्थित है, जो सीरिया और इराक़ की सीमा के निकट पड़ता है।
2. नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती किस पहाड़ पर रुकी थी (Nooh ali salam ki kashti kahan ruki thi)?
क़ुरआन में साफ़ तौर पर उल्लेख है: ‘वस्तवत अलल-जूदी’, यानी कश्ती जूदी पहाड़ पर रुकी थी। बाइबिल में इसे ‘अरारात के पहाड़ों’ का क्षेत्र कहा गया है, जिसकी भौगोलिक परिधि में प्राचीन काल में माउंट जूदी ही सम्मिलित था।
3. क्या नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती मिल चुकी है (Nooh ali salam ki kashti kahan mili)?
आधुनिक भू-वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों को माउंट जूदी और दुरुपिनार स्थल पर 3D सब-सरफ़ेस रडार स्कैन में 515 फ़ीट लंबी एक नौका-आकार आकृति मिली है। इसके अतिरिक्त, तुर्की के विश्वविद्यालयों द्वारा किए गए मृदा परीक्षणों में 5000 ईसा पूर्व के समुद्री जीवाश्म और समुद्री अवसाद के प्रमाण पाए गए हैं, जो तूफ़ान-ए-नूह की पुष्टि करते हैं।
4. कश्ती में कुल कितने लोग सवार थे?
अधिकांश ऐतिहासिक व इस्लामी तफ़सीर रिवायतों के अनुसार, कश्ती में हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम), उनके परिजन और ईमान लाने वाले कुल लगभग 80 निष्ठावान मोमिन सवार थे। इनके साथ प्रत्येक जीव-जंतु का एक-एक जोड़ा भी सवार कराया गया था।
5. क़ुरआन और बाइबिल में कश्ती के स्थान को लेकर क्या अंतर है?
बाइबिल में ‘माउंटेन्स ऑफ़ अरारात’ (Urartu क्षेत्र) का सामान्य उल्लेख है, जिसे बाद के दौर में आर्मेनियाई सीमा पर स्थित 5,137 मीटर ऊंचे ग्लेशियर वाले ज्वालामुखी पर्वत से जोड़ दिया गया। इसके विपरीत, क़ुरआने मजीद ने बिल्कुल सटीक स्थान ‘माउंट जूदी’ बताया, जो 2,089 मीटर ऊंचा सुगम पठार है जहाँ से मानव जीवन और सभ्यता का दोबारा शुरू होना तार्किक व भौगोलिक रूप से संभव था।