क़ुरआन मजीद की 18वीं सूरह ‘सूरह अल-कहफ़’ में बयान किया गया सबसे हैरतअंगेज़, ईमान-अफ़रोज़ और सबक़आमो़ज़ वाक़या ‘असहाब-ए-कहफ़ का वाक़या’ (Ashab E Kahf Ka Waqia In Hindi) है। अरबी ज़बान में ‘कहफ़’ का मतलब बड़ा पहाड़ या विशाल गुफा (ग़ार) होता है, और ‘असहाब-ए-कहफ़’ का अर्थ है ‘गुफा वाले’।
यह वाक़या उन चंद नौजवान मोमिनों का है जिन्होंने एक ज़ालिम और बुतपरस्त बादशाह के ज़ुल्म से अपने ईमान और तौहीद (अल्लाह के एक होने का यक़ीन) की हिफ़ाज़त के लिए अपने ऐशो-आराम, ख़ानदान और वतन को छोड़ दिया और एक वीरान पहाड़ की गुफ़ा में पनाह ली। अल्लाह तआला ने उन पर ऐसी नींद तारी फ़रमाई कि वे अपने एक वफ़ादार कुत्ते के साथ लगातार 309 सालों तक सोते रहे, और जब जागे तो ज़माना बिल्कुल बदल चुका था।
सूरह अल-कहफ़ में असहाब-ए-कहफ़ की दुआ
رَبَّنَا آتِنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً وَهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًا
तर्जुमा (सूरह अल-कहफ़, आयत 10): “ऐ हमारे रब! हमें अपने पास से रहमत अता फ़रमा, और हमारे इस मामले में हमारे लिए भलाई और सही रास्ता आसान कर दे।”
पृष्ठभूमि: ज़ालिम दक़यानूस (Decius) का दौर और तौहीद पर पहरा
तफ़सीर और इतिहास की किताबों के मुताबिक़ यह वाक़या ईसा (अलै.) के बाद और नबी-ए-करीम ﷺ के आने से पहले रूमी सल्तनत (अफ़सूस शहर, वर्तमान तुर्की/जॉर्डन क्षेत्र) का है। उस दौर में दक़यानूस (Decius) नाम का एक निहायत ज़ालिम और मुशरिक बादशाह हुकूमत करता था।
दक़यानूस अपनी प्रजा को मूर्तियों की पूजा करने पर मजबूर करता था। जो कोई एक सच्चे ख़ुदा की इबादत करता, उसे बेरहमी से क़त्ल कर दिया जाता था। उस शहर के कुछ बा-असर और अमीर घरानों के नेक नौजवानों के दिलों में अल्लाह ने हिदायत का नूर भर दिया। उन्होंने ज़ालिम बादशाह के सामने झुकने और बुतपरस्ती करने से साफ़ इनकार कर दिया।
शहर से हिजरत और ग़ार में पनाह
जब बादशाह दक़यानूस ने उन्हें क़त्ल की धमकी दी और चंद दिनों की मोहलत दी, तो उन नौजवानों ने आपस में मशवरा किया। उन्होंने दुनियावी दौलत और शानो-शौकत के मुक़ाबले अपने ईमान की हिफ़ाज़त को चुना। वे रात के अंधेरे में शहर से निकल पड़े और क़रीब के एक पहाड़ की गुफ़ा (कहफ़) में जाकर छुप गए।
रास्ते में उनका एक वफ़ादार कुत्ता भी उनके साथ हो लिया, जिसे रिवायतों में ‘क़ितमीर’ (Qitmir) कहा गया है। उन नौजवानों ने गुफ़ा में पहुंचकर अल्लाह के हुज़ूर सजदा किया और रहमत व हिफ़ाज़त की दुआ मांगी। अल्लाह ने उनकी दुआ क़बूल फ़रमाई और उन पर ऐसी गहरी नींद डाल दी जिसने दुनिया के कुदरती नियमों को हैरत में डाल दिया।
गुफ़ा में कुदरत का अज़ीम करिश्मा (309 साल की नींद)
क़ुरआन मजीद ने सूरह अल-कहफ़ (आयत 17-18) में इस बात का बेहद वैज्ञानिक और आलौकिक नक़्शा खींचा है कि अल्लाह ने 3 शताब्दियों से अधिक वक़्त तक उनकी हिफ़ाज़त कैसे फ़रमाई:
- सूरज की धूप से हिफ़ाज़त: जब सूरज निकलता तो गुफ़ा के दाईं तरफ से कतरा कर निकल जाता, और जब डूबता तो बाईं तरफ से हट जाता। धूप की सीधी तपन उनके जिस्मों पर नहीं पड़ती थी जिससे उनके जिस्म और कपड़े महफ़ूज़ रहे।
- करवट बदलना: अल्लाह तआला उन्हें दाएँ और बाएँ करवटें बदलवाता रहता था ताकि ज़मीन उनके जिस्म के गोश्त और खाल को ख़राब न कर सके।
- कुत्ते का पहरा: उनका कुत्ता चौखट पर दोनों हाथ फैलाए बैठा था। उन पर ऐसा रअब और हैबत तारी थी कि अगर कोई इंसान उन्हें देखता तो ख़ौफ़ के मारे पीछे भाग खड़ा होता।
- 309 साल की मुद्दत: क़ुरआन फ़रमाता है: “और वे अपनी गुफ़ा में तीन सौ साल रहे, और नौ साल और ज़्यादा।” (शम्सी यानी सोलर कैलेंडर के 300 साल कमरी यानी लूनर कैलेंडर के 309 साल के बराबर होते हैं)।
309 साल बाद जागना और पुराना सिक्का
जब अल्लाह ने उन्हें जगाया, तो उन्हें लगा कि वे सिर्फ़ एक दिन या दिन का कुछ हिस्सा ही सोए हैं। भूख की शिद्दत महसूस हुई तो उन्होंने अपने एक साथी (तमलीख़ा) को कुछ चांदी के सिक्के देकर शहर भेजा और ताकीद की कि होशियारी से हलाल और पाकीज़ा खाना ख़रीद कर लाए ताकि दक़यानूस के सिपाही पहचान न लें।
जब वह साथी शहर पहुंचा तो नक़्शा पूरी तरह बदल चुका था। सड़कें, मकान और लोगों की ज़बान बदल चुकी थी। जब उसने एक दुकानदार को खाना ख़रीदने के लिए चांदी का सिक्का दिया, तो दुकानदार चौंक गया क्योंकि उस सिक्के पर 300 साल पुराने बादशाह दक़यानूस की तस्वीर छपी थी। लोग समझे कि इस नौजवान को कोई पुराना गड़ा हुआ ख़ज़ाना हाथ लग गया है।
मामला उस वक़्त के नेक दिल और मोमिन बादशाह तक पहुंचा। जब सारी हक़ीक़त खुली तो सब हैरान रह गए। बादशाह और शहर के हज़ारों लोग उस मोमिन के साथ गुफ़ा पहुंचे। असहाब-ए-कहफ़ ने अपने साथियों को देखा, अल्लाह का शुक्र अदा किया और फिर उसी गुफ़ा में लेट गए। अल्लाह तआला ने उन्हें हमेशा की नींद (इंतिक़ाल) सुला दिया। लोगों ने उनकी यादगार में उस जगह पर एक इबादतगाह (मस्जिद) तामीर कर दी।
क़ुरआन मजीद में असहाब-ए-कहफ़ की तादाद
अल्लाह तआला ने सूरह अल-कहफ़ की आयत 22 में फ़रमाया कि लोग उनकी तादाद के बारे में अंदाज़ा लगाते हैं—कोई तीन कहता है चौथा कुत्ता, कोई पाँच कहता है छठा कुत्ता। लेकिन सही बात यह है कि वे सात थे और आठवाँ उनका कुत्ता था। क़ुरआन ने नसीहत की कि उनकी गिनती पर बहस करने के बजाय उनके वाक़ये से मिलने वाले सबक़ और नसीहत पर ध्यान दिया जाए।
असहाब-ए-कहफ़ के वाक़ये से मिलने वाले अज़ीम सबक़
| सबक़ (Rulings) | इस्लामी महत्व व जीवन में अमल |
|---|---|
| ईमान की हिफ़ाज़त सर्वोच्च प्राथमिकता | अगर मुआशरा (समाज) बुराइयों से घिर जाए तो अपने ईमान को बचाने के लिए बुराई से किनारा कर लेना चाहिए। |
| अल्लाह पर कामिल तवक्कुल | जो बंदा अल्लाह के लिए क़ुरबानी देता है, अल्लाह कुदरत के नियमों को बदलकर भी उसकी हिफ़ाज़त फ़रमाता है। |
| क़ियामत व दोबारा ज़िंदा होने की दलील | जो ज़ात 309 साल बाद इंसानों को बिना किसी नुक़सान के जगा सकती है, वह मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर है। |
| नेक सोहबत की बरकत | नेक लोगों का साथ इख़्तियार करने की वजह से एक कुत्ते का ज़िक्र भी क़यामत तक क़ुरआन मजीद की आयतों में महफ़ूज़ हो गया। |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. असहाब-ए-कहफ़ कितने साल तक गुफ़ा में सोते रहे?
सूरह अल-कहफ़ की आयत 25 के मुताबिक़ असहाब-ए-कहफ़ गुफ़ा में 300 शम्सी (सोलर) साल यानी 309 कमरी (लूनर) साल तक सोते रहे।
2. असहाब-ए-कहफ़ के कुत्ते का क्या नाम था?
तफ़सीर और इस्लामी तारीख़ की मशहूर किताबों के अनुसार असहाब-ए-कहफ़ के वफ़ादार कुत्ते का नाम ‘क़ितमीर’ (Qitmir) था।
3. असहाब-ए-कहफ़ कुल कितने नौजवान थे?
क़ुरआन मजीद (सूरह कहफ़ आयत 22) और हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि.) की रिवायत के अनुसार असहाब-ए-कहफ़ सात मोमिन नौजवान थे और आठवाँ उनका कुत्ता था।
4. जुमा के दिन सूरह कहफ़ पढ़ने की क्या फ़ज़ीलत है?
हदीस शरीफ़ के मुताबिक़ जो शख़्स जुमा के दिन सूरह अल-कहफ़ की तिलावत करता है, उसके लिए दो जुमों के दरमियान नूर चमकता रहता है और वह दज्जाल के फ़ितनों से महफ़ूज़ रहता है।