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हज़रत ज़ुलक़रनैन का वाक़िआ | Hazrat Zulqarnain History in Hindi & Urdu (सूरह कहफ़, याजूज माजूज की दीवार व तारीख़ी हक़ीक़त)

By Mariya Ansari •

हज़रत ज़ुलक़रनैन (Hazrat Zulqarnain) का वाक़िआ पवित्र क़ुरआन के 15वें पारे की मशहूर सूरह कहफ़ (Surah Al-Kahf, आयत 83 से 98) में बयान किया गया एक बेहद अज़ीम, रूहानी और ऐतिहासिक वाक़िआ है। अल्लाह तआला ने हज़रत ज़ुलक़रनैन को बेमिसाल सल्तनत, बेपनाह ताकत, उन्नत तकनीकी इल्म और हर तरह के असबाब व साधन अता फ़रमाए थे। वे एक सच्चे मोमिन (Muwahhid), इंसाफ़पसंद और खुदा-परस्त बादशाह थे, जिन्होंने पूरब से लेकर पश्चिम तक पूरी दुनिया में अदल-ओ-इंसाफ़ का परचम लहराया।

इस संपूर्ण शोधपरक लेख में आप हज़रत ज़ुलक़रनैन का इतिहास (Hazrat Zulqarnain History in Hindi), उनके तीन आलमी सफ़र, याजूज-माजूज (Gog and Magog) के फ़ितने को रोकने के लिए लोहे व पिघले तांबे की अभेद्य दीवार (सद्द-ए-ज़ुलक़रनैन) का निर्माण, और इस मशहूर सवाल की तारीख़ी हक़ीक़त जानेंगे कि क्या हज़रत ज़ुलक़रनैन ही सिकंदर-ए-आज़म (Alexander the Great) थे या दोनों अलग-अलग शख्सियतें थीं?

हज़रत ज़ुलक़रनैन कौन थे? (Who was Hazrat Zulqarnain?)

अरबी भाषा में ‘ज़ुलक़रनैन’ (ذو القرنين) का शाब्दिक अर्थ होता है—“दो सींगों वाला” या “दो दौर (ज़मानों) का मालिक” या “दुनिया के दोनों कोनों (पूरब और पश्चिम) तक पहुँचने वाला।” क़ुरआन मजीद में उनका असल नाम ज़िक्र नहीं किया गया, बल्कि ‘ज़ुलक़रनैन’ उनका एक मुकद्दस लक़ब (Title) है।

मुफ़स्सिरीन-ए-किराम (क़ुरआन के व्याख्याकार) और इस्लामी इतिहासकारों के मुताबिक, उन्हें ‘ज़ुलक़रनैन’ इसलिए कहा गया क्योंकि उनकी हुकूमत और फुतूहात (विस्तार) सूरज निकलने के कोने (मशरिक़) से लेकर सूरज डूबने के कोने (मग़रिब) तक फैल चुकी थी। अरब मुहावरे में सूरज के दोनों सिरों को ‘क़रनैन’ कहा जाता है। बाज़ उलमा के अनुसार उनके मुकुट (ताज) पर दो सींग जैसी सुंदर आकृतियाँ बनी थीं, इसलिए भी उन्हें इस लक़ब से पुकारा गया।

क़ुरआन मजीद की गवाही: “बेशक हमने उसे ज़मीन पर सत्ता व हुकूमत बख्शी और हर चीज़ का साधन व रास्ता अता फ़रमाया।” (सूरह कहफ़, आयत: 84)

क्या हज़रत ज़ुलक़रनैन नबी थे या बादशाह? (Was Hazrat Zulqarnain a Prophet or a King?)

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या ज़ुलक़रनैन अल्लाह के पैग़म्बर थे या सिर्फ़ एक बादशाह? हदीस शरीफ़ और सहाबा-ए-किराम के अक़वाल में इसका स्पष्ट जवाब मिलता है:

सुनन अबी दाऊद (हदीस: 4674) और मुस्तदरक अल-हाकिम में हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इरशाद फ़रमाया:

مَا أَدْرِي أَذُو الْقَرْنَيْنِ نَبِيًّا كَانَ أَمْ لاَ

“मैं नहीं जानता कि ज़ुलक़रनैन नबी थे या नहीं।” (सुनन अबी दाऊद: 4674)

अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ि.) से जब ज़ुलक़रनैन के बारे में पूछा गया कि “क्या वे कोई नबी या फ़रिश्ता थे?” तो हज़रत अली (रज़ि.) ने फ़रमाया: “वे न तो कोई नबी थे और न ही फ़रिश्ता, बल्कि वे अल्लाह के एक नेक, मुत्तक़ी और सालेह बंदे थे। उन्होंने अल्लाह से सच्ची मुहब्बत की और अल्लाह ने उनसे मुहब्बत फ़रमाई। उन्होंने अल्लाह के दीन की मदद की और अल्लाह ने उनकी रहनुमाई फ़रमाई।”

जुमहूर उलमा और मुफ़स्सिरीन का यही फैसला है कि हज़रत ज़ुलक़रनैन एक आदिल मोमिन बादशाह (वलीउल्लाह) थे, जिन्हें अल्लाह ने पूरी दुनिया में अदल-ओ-इंसाफ़ क़ायम करने का हुक्म दिया था।

सूरह कहफ़ में हज़रत ज़ुलक़रनैन का ज़िक्र क्यों आया? (शान-ए-नुज़ूल)

जब नबी-ए-करीम (ﷺ) मक्का मुकर्रमा में तौहीद की दावत दे रहे थे, तो कुरैश के मुशरिकीन ने मदीना के यहूदी रब्बियों (विद्वानों) के पास अपना वफ़्द भेजा ताकि वे मुहम्मद (ﷺ) की नबूवत की सच्चाई की जांच कर सकें। यहूदी उलमा ने मुशरिकीन से कहा कि तुम उनसे तीन सवाल पूछो, अगर वे सही जवाब दे दें तो समझ लो कि वे अल्लाह के सच्चे नबी हैं:

  1. उन नौजवानों का क्या वाक़िआ है जो प्राचीन काल में अपनी कौम से भागकर एक ग़ार (गुफा) में छिप गए थे? (असहाब-ए-कहफ़)
  2. उस अज़ीम मुसाफ़िर व बादशाह का क्या हाल है जिसने पूरब और पश्चिम तक ज़मीन का चक्कर लगाया था? (हज़रत ज़ुलक़रनैन)
  3. रूह (Soul / आत्मा) की हक़ीक़त क्या है?

इन सवालों के जवाब में अल्लाह तआला ने सूरह कहफ़ नाज़िल फ़रमाई और इरशाद फ़रमाया:

وَيَسْأَلُونَكَ عَن ذِي الْقَرْنَيْنِ ۖ قُلْ سَأَتْلُو عَلَيْكُم مِّنْهُ ذِكْرًا

“और (ऐ नबी!) वे आपसे ज़ुलक़रनैन के बारे में पूछते हैं। आप फ़रमा दीजिए कि मैं तुम्हें उनका कुछ हाल पढ़कर सुनाता हूँ।” (सूरह कहफ़: 83)

हज़रत ज़ुलक़रनैन के तीन अज़ीम आलमी सफ़र (The Three Great Expeditions)

क़ुरआन मजीद में हज़रत ज़ुलक़रनैन के तीन बहुत बड़े और ऐतिहासिक सफ़रों का तफ़्सील से ज़िक्र किया गया है:

1. पहला सफ़र: मग़रिब (पश्चिम) की ओर

हज़रत ज़ुलक़रनैन अपनी अज़ीम लश्कर के साथ पश्चिम की ओर रवाना हुए। वे वहाँ पहुँचे जहाँ ज़मीन खत्म होती थी और विशाल समुंदर शुरू होता था। क़ुरआन फ़रमाता है कि उन्होंने सूरज को काले कीचड़ वाले पानी के एक बड़े चश्मे में डूबते हुए महसूस किया (“फ़ि ऐनिन हमिअह” – सूरह कहफ़: 86)। मुफ़स्सिरीन के मुताबिक यह काला सागर (Black Sea), कैस्पियन सागर या अटलांटिक महासागर का तटीय इलाका था।

वहाँ एक नाफ़रमान कौम आबाद थी। अल्लाह तआला ने ज़ुलक़रनैन को इख़्तियार दिया कि चाहे तो उन्हें सज़ा दे या उनके साथ भलाई करे। हज़रत ज़ुलक़रनैन ने एक आदिल इस्लामी हुक्मरान का उसूल पेश करते हुए कहा: “जो ज़ुल्म करेगा हम उसे दुनिया में सज़ा देंगे और फिर वह अपने रब के पास लौटेगा जहाँ उसे सख्त अज़ाब होगा। और जो ईमान लाएगा और नेक अमल करेगा, उसके लिए बेहतरीन बदला है और हम अपने काम में भी उसके साथ आसानी का बर्ताव करेंगे।”

2. दूसरा सफ़र: मशरिक़ (पूरब) की ओर

इसके बाद उन्होंने पूरब की ओर कूच किया। वे उस सुदूर पूर्वी इलाके में पहुँचे जहाँ सूरज एक ऐसी कौम पर तुलू होता था जिनके पास धूप और गर्मी से बचने के लिए न कोई मकान थे और न ही घने दरख़्त (सूरह कहफ़: 90)। यह एक बेहद सादा और क़बीलाई जिंदगी बसर करने वाले लोग थे। हज़रत ज़ुलक़रनैन ने उन पर ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि इंसाफ़ के साथ उनके मामलात तय किए और उनकी हिफ़ाज़त का इंतज़ाम किया।

3. तीसरा सफ़र: दो पहाड़ों के दरमियान (उत्तर की ओर)

हज़रत ज़ुलक़रनैन का तीसरा और सबसे मशहूर सफ़र उत्तर दिशा में दो विशाल और दुर्गम पहाड़ों के दरमियान था, जिसे क़ुरआन ने “बैनस सद्देन” (दो रुकावटों/पहाड़ों के बीच) कहा है। यह इलाका ऐतिहासिक रूप से काकेशस (Caucasus) पर्वत श्रृंखला का माना जाता है।

वहाँ एक ऐसी कौम रहती थी जिनकी भाषा को समझना बेहद मुश्किल था। उन लाचार लोगों ने ज़ुलक़रनैन की अज़ीम ताकत और इंसाफ़ को देखकर फरियाद की कि पहाड़ों के पीछे याजूज और माजूज (Gog and Magog) नाम की वहशी और जालिम क़ौमें आबाद हैं, जो बार-बार दर्रे से निकलकर कत्लोगारत, लूटमार और फसाद फैलाती हैं।

सद्द-ए-ज़ुलक़रनैन दीवार का निर्माण - लोहे की सिल्लियां और पिघला हुआ तांबा
हज़रत ज़ुलक़रनैन द्वारा दो पहाड़ों के बीच लोहे की बड़ी सिल्लियों और पिघले तांबे से सद्द-ए-ज़ुलक़रनैन का निर्माण (कलात्मक इलस्ट्रेशन)

याजूज-माजूज के ख़िलाफ़ लोहे व तांबे की दीवार का निर्माण (Sadd-e-Zulqarnain)

पहाड़ों के पास रहने वाले मजलूम लोगों ने हज़रत ज़ुलक़रनैन से गुज़ारिश की कि हम आपको भारी लगान और माल (टैक्स) देने को तैयार हैं, बशर्ते आप हमारे और याजूज-माजूज के बीच एक मज़बूत दीवार खड़ी कर दें।

यहाँ हज़रत ज़ुलक़रनैन के बेमिसाल इस्लामी किरदार और सादगी का इज़हार होता है। उन्होंने कोई भी माल या दौलत लेने से साफ़ इनकार कर दिया और फ़रमाया:

“जो कुछ मेरे रब ने मुझे अता फ़रमाया है, वह तुम्हारे माल और दौलत से कहीं बेहतर है। तुम बस अपनी जिस्मानी ताकत और मेहनत (श्रम) से मेरी मदद करो, मैं तुम्हारे और उनके बीच एक अभेद्य दीवार बना दूंगा।” (सूरह कहफ़: 95)

इसके बाद हज़रत ज़ुलक़रनैन ने प्राचीन इंजीनियरिंग का ऐसा अजूबा तैयार किया जिसकी मिसाल पूरी मानव इतिहास में नहीं मिलती:

  • लोहे की सिल्लियां मंगवाना (ज़ुबरल हदीद): उन्होंने दोनों पहाड़ों के बीच की खाई में लोहे की विशाल सिल्लियों (Iron Blocks) को चुनवाना शुरू किया, यहाँ तक कि दीवार दोनों पहाड़ों की चोटियों के बराबर ऊँची हो गई।
  • विशाल धौंकनी (Bellows) से आग भड़काना: इसके बाद उन्होंने भट्ठियाँ तैयार करवाईं और बड़ी-बड़ी धौंकनियों से हवा फूँककर लोहे की दीवार को लाल दहकती आग की तरह गर्म कर दिया।
  • पिघला हुआ तांबा उड़ेलना (क़ित्रन): जब लोहा आग बनकर सुलग उठा, तो उन्होंने विशाल देगों में पिघला हुआ तांबा (Molten Copper/Brass) उस पर उड़ेला। पिघला हुआ तांबा लोहे के तमाम सुराखों और जोड़ों में समा गया और ठंडा होने पर वह फौलादी मिश्र धातु (Alloy) की ऐसी चिकनी और सख्त दीवार बन गई जिस पर चढ़ना नामुमकिन था।

इस दीवार के बन जाने के बाद याजूज-माजूज न तो उस पर चढ़ने की ताकत रखते थे और न ही उसमें कोई सुराख़ करने में कामयाब हो सके (सूरह कहफ़: 97)।

अज़ीम कामयाबी पर आजिज़ी का इज़हार: इस हैरानकुन दीवार को पूरा करने के बाद हज़रत ज़ुलक़रनैन ने अपनी इंजीनियरिंग का घमंड करने के बजाय अल्लाह के आगे झुकते हुए फ़रमाया:

قَالَ هَٰذَا رَحْمَةٌ مِّن رَّبِّي ۖ فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ رَبِّي جَعَلَهُ دَكَّاءَ ۖ وَكَانَ وَعْدُ رَبِّي حَقًّا

“यह मेरे रब की रहमत है। फिर जब मेरे रब का वादा (क़यामत) आ जाएगा, तो वह इसे रेज़ा-रेज़ा (धूल) कर देगा, और मेरे रब का वादा बिल्कुल सच्चा है।” (सूरह कहफ़: 98)

क्या हज़रत ज़ुलक़रनैन और सिकंदर-ए-आज़म एक ही थे? (तारीख़ी हक़ीक़त)

उर्दू और फारसी की पुरानी किताबों में अक्सर लोग यूनान के सिकंदर (Alexander of Macedonia / सिकंदर मकदूनी) को ‘सिकंदर ज़ुलक़रनैन’ कह देते हैं, जिससे आम लोगों में यह ग़लतफ़हमी फैल गई कि क़ुरआन के ज़ुलक़रनैन वही सिकंदर-ए-आज़म थे।

हाफ़िज़ इब्ने कसीर, अल्लामा इब्ने हजर अस्क़लानी, इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी और आधुनिक काल के महान शोधकर्ता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद व मौलाना मौदूदी ने ठोस ऐतिहासिक व धार्मिक प्रमाणों से यह साबित किया है कि हज़रत ज़ुलक़रनैन और सिकंदर मकदूनी दोनों बिल्कुल अलग-अलग शख्सियतें थीं:

  • अक़ीदा व तौहीद (Faith): सिकंदर मकदूनी एक मुशरिक (मूर्तिपूजक) यूनानी था और दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) का शागिर्द था। इसके विपरीत, क़ुरआन के हज़रत ज़ुलक़रनैन अल्लाह के सच्चे मुवह्हिद (एक ईश्वर को मानने वाले) और मुत्तक़ी मोमिन थे।
  • ज़माना (Historical Era): हज़रत ज़ुलक़रनैन का दौर हज़रत इब्राहीम (अलै.) के ज़माने का या ईसा मसीह से हज़ारों साल पुराना है। जबकि सिकंदर मकदूनी ईसा मसीह से महज़ 330 साल पहले (356–323 ईसा पूर्व) हुआ था।
  • दीवार का निर्माण: सिकंदर मकदूनी ने अपनी ज़िंदगी में कभी याजूज-माजूज के ख़िलाफ़ लोहे और तांबे की कोई दीवार नहीं बनाई। वह महज़ 32 वर्ष की उम्र में शराबनोशी और बीमारी की वजह से बेबीलोन (इराक़) में मर गया था।
  • तारीख़ी पहचान (Historical Identity): मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की प्रसिद्ध पुस्तक में की गई गंभीर ऐतिहासिक पड़ताल के मुताबिक, क़ुरआन के ज़ुलक़रनैन की तमाम निशानियाँ प्राचीन फारस (ईरान) के मोमिन व आदिल बादशाह सायरस-ए-आज़म (Cyrus the Great / कूरुश) से मुकम्मल तौर पर मिलती हैं, या वे यमन के प्राचीन हिमायती मुवह्हिद बादशाहों (असअद ज़ुलक़रनैन) में से थे। दोनों ही स्थितियों में उनका यूनानी सिकंदर से कोई ताल्लुक़ नहीं है।

हज़रत ज़ुलक़रनैन के वाक़िए से मिलने वाले अज़ीम सबक़ (Moral Lessons)

क़ुरआन मजीद में बयान किए गए वाक़िआत महज़ ऐतिहासिक किस्से नहीं होते, बल्कि वे क़यामत तक आने वाली इंसानियत के लिए हिदायत का मीनार हैं:

  1. हुकूमत और ताकत अल्लाह की अमानत है: ज़ुलक़रनैन के पास बेपनाह सल्तनत थी, लेकिन उन्होंने कभी ज़ुल्म या तानाशाही नहीं की, बल्कि कमज़ोरों की हिफ़ाज़त और इंसाफ़ क़ायम करने में अपनी ताकत लगाई।
  2. निःस्वार्थ जनसेवा (बिना लालच खिदमत): जब लाचार कौम ने दीवार बनाने के बदले भारी टैक्स देने की पेशकश की, तो उन्होंने साफ मना कर दिया और अल्लाह की रज़ा के लिए मुफ्त में उनकी मदद की।
  3. सफलता पर आजिज़ी व विनम्रता: दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा (लोहे-तांबे की दीवार) तैयार करने के बाद उन्होंने अपनी तारीफ़ करने के बजाय कहा—“यह मेरे रब की रहमत है।” एक सच्चे मोमिन की यही शान होती है कि वह हर कामयाबी का सेहरा अल्लाह के करम पर बांधता है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

1. हज़रत ज़ुलक़रनैन का नाम ज़ुलक़रनैन क्यों पड़ा?

‘ज़ुलक़रनैन’ का अर्थ है दो सींगों वाला या दो सिरों का मालिक। मुफ़स्सिरीन के अनुसार उनकी सल्तनत सूरज निकलने (पूरब) और सूरज डूबने (पश्चिम) के दोनों सिरों तक फैली हुई थी, या उनके मुकुट पर दो सींग जैसी आकृतियाँ बनी थीं, इसलिए उन्हें ज़ुलक़रनैन कहा गया।

2. क्या हज़रत ज़ुलक़रनैन नबी थे या सिर्फ़ एक बादशाह?

हदीस शरीफ़ (सुनन अबी दाऊद: 4674) में नबी (ﷺ) ने फ़रमाया कि मैं नहीं जानता कि वे नबी थे या नहीं। हज़रत अली (रज़ि.) और अधिकांश इस्लामी विद्वानों के अनुसार वे नबी नहीं बल्कि अल्लाह के एक नेक, मुत्तक़ी और आदिल मोमिन बादशाह (वलीउल्लाह) थे।

3. क्या सिकंदर-ए-आज़म (Alexander the Great) ही ज़ुलक़रनैन थे?

नहीं, दोनों बिल्कुल अलग हैं। सिकंदर मकदूनी एक मुशरिक (मूर्तिपूजक) यूनानी था और अरस्तू का शागिर्द था। जबकि क़ुरआन के ज़ुलक़रनैन एक पक्के तौहीद-परस्त मोमिन बादशाह थे जो सिकंदर से सदियों पहले हुए और जिन्होंने याजूज-माजूज की दीवार बनाई।

4. याजूज माजूज की दीवार किस चीज़ से बनाई गई थी?

सूरह कहफ़ (आयत 96) के अनुसार, यह दीवार लोहे की विशाल सिल्लियों (ज़ुबरल हदीद) को आग की भट्ठियों में दहकाकर और उसके ऊपर पिघला हुआ तांबा (क़ित्रन) उड़ेलकर तैयार की गई थी, जिससे यह अभेद्य फौलादी दीवार बन गई।

5. क्या याजूज माजूज की दीवार क़यामत के क़रीब टूट जाएगी?

हाँ, क़ुरआन (सूरह कहफ़: 98 व सूरह अल-अंबिया: 96) और सहीह हदीसों के मुताबिक, क़यामत की बड़ी निशानियों में से एक यह है कि अल्लाह के हुक्म से यह दीवार रेज़ा-रेज़ा हो जाएगी और याजूज-माजूज हर ढलान से तेज़ी के साथ निकल पड़ेंगे।

Mariya Ansari
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