हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम (Hazrat Ayyub Alaihissalam) अल्लाह तआला के वे जलीलुल क़द्र पैग़म्बर हैं जिनका नाम पूरी इंसानियत के इतिहास में सब्र, शुक्र और रज़ा-ए-इलाही (Patience & Gratitude) की सबसे बुलंद मिसाल माना जाता है। उर्दू, अरबी और हिंदी अदब में जब भी किसी इंसान के बेइंतहा सब्र की बात होती है, तो हमेशा यह मशहूर कहावत कही जाती है—“सब्र-ए-अय्यूब”।
पवित्र क़ुरआन करीम की सूरह अल-अंबिया (आयत 83-84) और सूरह साद (आयत 41-44) में अल्लाह तआला ने हज़रत अय्यूब (अलै.) की अज़ीम आज़माइश, उनकी शदीद बीमारी, उनकी मशहूर क़ुरआनी दुआ और अल्लाह द्वारा मुअजिज़ाना शिफ़ा व दोबारा दोगुनी नेमतें अता करने का भावुक व ईमान-अफ़रोज़ वाक़िआ बयान फ़रमाया है।
इस संपूर्ण लेख में आप हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का वाक़िआ (Hazrat Ayyub Alaihissalam Ka Waqia in Hindi), उनके सब्र के तीन कठिन दौर (दौलत, औलाद और सेहत का इम्तिहान), उनकी वफ़ादार बीवी हज़रत रहमा की बेमिसाल वफ़ादारी, बीमारी से शिफ़ा की प्रामाणिक क़ुरआनी दुआ, और इसराईली मनगढ़ंत कहानियों की सच्चाई विस्तार से जानेंगे।
हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम कौन थे? (Who was Prophet Ayyub A.S.?)
इस्लामी इतिहासकारों और मुफ़स्सिरीन के मुताबिक, हज़रत अय्यूब (अलै.) हज़रत इब्राहीम (अलै.) के पड़पोते और हज़रत इसहाक़ (अलै.) की नस्ल से थे। उनका इलाका मुल्क-ए-शाम (सीरिया/जॉर्डन के सीमावर्ती क्षेत्र हौरां) में था।
अल्लाह तआला ने आज़माइश से पहले हज़रत अय्यूब (अलै.) को दुनिया की तमाम नेमतों से नवाज़ा था:
- उनके पास हज़ारों ऊंट, गाय, बैल, भेड़-बकरियां और उपजाऊ खेती की ज़मीनें थीं।
- अल्लाह ने उन्हें 14 नेक व ख़ूबसूरत औलादें (बेटे और बेटियां) अता फ़रमाई थीं।
- वे बेहद सख़ी (दानवीर) थे; यतीमों, बेवाओं, मुसाफ़िरों और ग़रीबों की हर वक़्त मदद करते थे और दिन-रात अल्लाह का शुक्र अदा करते थे।
क़ुरआन मजीद की गवाही: “बेशक हमने उन्हें बड़ा साबिर (धैर्यवान) पाया। क्या ही बेहतरीन बंदे थे वे! बेशक वे बार-बार अल्लाह की तरफ़ रुजू करने वाले थे।” (सूरह साद, आयत: 44)
हज़रत अय्यूब (अलै.) का अज़ीम इम्तिहान और सब्र के तीन मरहले
अल्लाह तआला अपने प्यारे और मुक़र्रब बंदों का इम्तिहान लेता है ताकि उनके दर्जात दुनिया और आख़िरत में बुलंद हों। हज़रत अय्यूब (अलै.) पर एक के बाद एक तीन पहाड़ जैसी आज़माइशें आईं:
1. पहला इम्तिहान: तमाम माल व मवेशियों का ख़ात्मा
अल्लाह के हुक्म से सबसे पहले उनके तमाम मवेशी, ऊंट, बकरियां और लहलहाती फसलें आग, तूफ़ान और डाकुओं के ज़रिए तबाह हो गईं। जब लोगों ने आकर उन्हें यह ख़बर दी कि आपकी पूरी दौलत ख़त्म हो चुकी है, तो हज़रत अय्यूब (अलै.) ने अल्लाह के हुज़ूर सजदा किया और फ़रमाया: “अल्लाह ने दिया था और अल्लाह ही ने वापस ले लिया। वह जब चाहे अपनी अमानत ले सकता है, हर हाल में उसी का शुक्र है।”
2. दूसरा इम्तिहान: तमाम औलादों का एक साथ इंतिक़ाल
इसके बाद दूसरा दिल दहला देने वाला इम्तिहान आया। एक दिन उनके तमाम बेटे और बेटियां एक मकान में जमा थे कि अचानक ज़लज़ले या तूफ़ान से मकान की छत गिर पड़ी और सभी औलादें मलबे के नीचे दबकर शहीद हो गईं।
एक बाप के लिए अपनी सारी औलादों का जनाज़ा एक साथ देखना दुनिया का सबसे बड़ा ग़म है। हज़रत अय्यूब की आँखों से आँसू बहे, लेकिन उन्होंने अपने कपड़े नहीं फाड़े, कोई चीख़-पुकार नहीं की और न ही कोई शिकवा किया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा: “ऐ अल्लाह! तू ही ज़िन्दगी देने वाला है और तू ही मौत का मालिक है। मैं तेरी हर रज़ा पर राज़ी हूँ।”
3. तीसरा इम्तिहान: शदीद जिस्मानी बीमारी (Years of Illness)
दौलत और औलाद के चले जाने के बाद हज़रत अय्यूब (अलै.) के जिस्म पर एक शदीद और तकलीफ़देह बीमारी मुसल्लत हो गई। उनके जिस्म में शदीद दर्द, छाले और कमज़ोरी पैदा हो गई जिससे वे चलने-फिरने से लाचार हो गए। यह बीमारी कई सालों (इतिहासकारों के मुताबिक़ 7 से 18 साल तक) जारी रही।
इस लंबी बीमारी के दौरान उनके रिश्तेदार, दोस्त और मिलने वाले एक-एक करके साथ छोड़ गए। लेकिन इस पूरी मुद्दत में हज़रत अय्यूब (अलै.) का दिल और ज़ुबान एक पल के लिए भी अल्लाह के ज़िक्र और शुक्र से ग़ाफ़िल नहीं हुई।
क्या हज़रत अय्यूब (अलै.) के जिस्म में कीड़े पड़ गए थे? (इसराईली रिवायतों का खंडन)
आम बोलचाल और बाज़ कम-इल्म लोगों में यह ग़लत कहानी मशहूर है कि “हज़रत अय्यूब के जिस्म में कीड़े पड़ गए थे, बदबू आने लगी थी और लोगों ने उन्हें शहर से बाहर कूड़े पर फेंक दिया था।”
यह बिल्कुल बातिल, बेबुनियाद और इसराईली (मनगढ़ंत) रिवायत है। अल्लामा इब्ने कसीर, काज़ी अयाज़ (शिफ़ा शरीफ़ में) और इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी समेत तमाम जलीलुल क़द्र मुफ़स्सिरीन ने साफ़ लिखा है कि:
अंबिया-ए-किराम (अलैहिमुस्सलाम) अल्लाह के मासूम और सबसे मुअज्ज़ज़ बंदे होते हैं। अल्लाह तआला अपने नबियों को ऐसी किसी भी बीमारी (मुन्फ़िर मर्ज़) से पूरी तरह महफ़ूज़ रखता है जिससे देखने वालों को घिन या नफ़रत महसूस हो, क्योंकि ऐसी बीमारी नबूवत की शान और दावत के मक़सद के ख़िलाफ़ है।
हज़रत अय्यूब (अलै.) को शदीद जिस्मानी दर्द, कमज़ोरी और फफोले थे, लेकिन उनका चेहरा, दिल (क़ल्ब), दिमाग़ और ज़ुबान 100% महफ़ूज़ और नूरानी थे और वे हर वक़्त अल्लाह की हम्द बयान करते थे।
हज़रत अय्यूब (अलै.) की वफ़ादार बीवी: हज़रत रहमा (रज़ि.)
इस पूरे वाक़िए का सबसे भावुक और रूहानी पहलू हज़रत अय्यूब (अलै.) की नेक और वफ़ादार बीवी हज़रत रहमा (हज़रत बीबी रहमा) का किरदार है। वे हज़रत यूसुफ़ (अलै.) के बेटे इफ़्राईम की बेटी (यानी हज़रत यूसुफ़ की नवासी) थीं।
जब तमाम दुनिया ने हज़रत अय्यूब का साथ छोड़ दिया, तो सिर्फ़ हज़रत रहमा ने उनका साथ निभाया। वे अपने बीमार शौहर को नहलातीं, खाना खिलातीं, कपड़े धोतीं और उनकी सेवा के लिए लोगों के घरों में मेहनत-मज़दूरी करके रोटी लाती थीं। दुनिया के इतिहास में एक वफ़ादार बीवी की ऐसी मिसाल कहीं और नहीं मिलती।

हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीमारी से शिफ़ा की दुआ (Dua of Hazrat Ayyub)
जब आज़माइश अपनी इंतिहा को पहुँच गई, तो हज़रत अय्यूब (अलै.) ने किसी शिकवे या शिकायत के बिना अल्लाह की बारगाह में अपनी तकलीफ़ पेश की। क़ुरआन मजीद (सूरह अल-अंबिया, आयत: 83) में यह अज़ीम दुआ दर्ज है:
أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ
“अन्नी मस्स-नियज़-ज़ुर्रु व-अन्त अरहमुर-राहिमीन।”
हिंदी तर्जुमा: “ऐ मेरे रब! मुझे यह तकलीफ़ व बीमारी आ पहुंची है, और तू सबसे बड़ा रहम फ़रमाने वाला है।”
इस दुआ का अज़ीम अदब (Spiritual Etiquette):
ग़ौर फ़रमाएं कि हज़रत अय्यूब (अलै.) ने यह नहीं कहा कि “ऐ अल्लाह! मुझे जल्द शिफ़ा दे दे”, बल्कि उन्होंने सिर्फ अपनी बेबसी अल्लाह के सामने रखी और अल्लाह की रहमत की सिफ़त “अरहमुर-राहिमीन” (तमाम रहम करने वालों से बड़ा रहम करने वाला) को पुकारा। यही दुआ मांगने का सबसे आला मक़ाम है।
शिफ़ा का मुअजिज़ा और ठंडे चश्मे का फूटना (The Miraculous Spring)
हज़रत अय्यूब (अलै.) की आजिज़ी भरी दुआ अल्लाह की बारगाह में तुरंत क़ुबूल हुई। सूरह साद (आयत 41-42) में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
اذْكُضْ بِرِجْلِكَ ۖ هَٰذَا مُغْتَسَلٌ بَارِدٌ وَشَرَابٌ
“अपने पाँव से ज़मीन पर ठोकर मारो; यह नहाने के लिए ठंडा पानी है और पीने के लिए भी।” (सूरह साद: 42)
जैसे ही हज़रत अय्यूब (अलै.) ने ज़मीन पर अपना पाँव मारा, अल्लाह के हुक्म से ज़मीन से एक साफ़, ठंडा और शिफ़ा-बख़्श चश्मा फूट पड़ा:
- चश्मे के पानी से नहाना: जब उन्होंने इस पानी से गुस्ल किया, तो उनके जिस्म के तमाम ज़ख़्म, दर्द और बीमारी के निशान ऐसे ग़ायब हो गए जैसे कभी थे ही नहीं।
- चश्मे का पानी पीना: जब उन्होंने यह पानी पिया, तो उनके पेट और अंदरूनी जिस्म की तमाम बीमारियाँ ख़त्म हो गईं और वे पूरी तरह तंदुरुस्त व नौजवान हो गए।
अल्लाह द्वारा नेमतों की दोगुनी वापसी (Restoration of Double Blessings)
जब हज़रत अय्यूब (अलै.) सब्र के इस अज़ीम इम्तिहान में 100% कामयाब हो गए, तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने उन पर अपनी रहमतों के दरवाज़े खोल दिए:
- सेहत व जवानी की वापसी: अल्लाह ने उन्हें पहले से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत सेहत और ताज़गी बख्शी। जब हज़रत रहमा लौटीं, तो वे अपने शौहर को पहचान न सकीं क्योंकि वे दोबारा नौजवान हो चुके थे।
- दोगुनी औलादों की नेमत: सूरह साद (आयत 43) के अनुसार, अल्लाह ने उन्हें उनकी पहली औलाद जैसी ही नेक औलादें और उनसे दोगुनी तादाद में बच्चे अता फ़रमाए।
- बेहिसाब दौलत (सोने की टिड्डियों की बारिश): सहीह बुख़ारी (हदीस: 3391) में रिवायत है कि जब हज़रत अय्यूब नहा रहे थे, तो अल्लाह की तरफ़ से सोने की टिड्डियों (Golden Locusts) की बारिश हुई और वे उन्हें अपने कपड़े में समेटने लगे। अल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ अय्यूब! क्या मैंने तुम्हें इस चीज़ से बेपरवाह नहीं कर दिया?” हज़रत अय्यूब ने अर्ज़ किया: “बेशक मेरे रब! लेकिन मैं तेरी बरकत से कभी बेपरवाह नहीं हो सकता।”
हज़रत अय्यूब (अलै.) के वाक़िए से मिलने वाले 5 अहम सबक़ (Lessons)
- आज़माइश गुनाहों की सज़ा नहीं होती: अगर किसी मोमिन पर बीमारी या ग़रीबी आती है, तो यह ज़रूरी नहीं कि वह गुनाहगार है। अल्लाह अपने सबसे पसंदीदा बंदों को भी आज़माता है।
- सब्र का हक़ीक़ी मफ़हूम: सब्र का मतलब यह है कि दिल में ग़म हो, आँखों में आँसू हों, लेकिन ज़ुबान से कभी रब की नाशुुक्री का एक लफ़्ज़ भी न निकले।
- अल्लाह की रहमत से मायूस न होना: हज़रत अय्यूब ने 18 साल तक सब्र किया और आख़िरकार अल्लाह की रहमत ने उन्हें सब कुछ दोगुना लौटा दिया।
- बीमारी में यह दुआ पढ़ना मुजर्रब है: किसी भी गंभीर बीमारी या लाइलाज मर्ज़ में सूरह अंबिया की यह दुआ “रब्बी अन्नी मस्स-नियज़-ज़ुर्रु व-अन्त अरहमुर-राहिमीन” पढ़ना शिफ़ा के लिए बेहद तासीरदार है।
- मुसीबत में जीवनसाथी का साथ: हज़रत रहमा का किरदार हर शौहर और बीवी के लिए सबक़ है कि अच्छे दिनों के साथ-साथ मुफ़लिसी और बीमारी में भी अपने जीवनसाथी का वफ़ादारी से साथ निभाना चाहिए।
इस्लामी इतिहास व महत्वपूर्ण क़ुरआनी वाक़िआत अवश्य पढ़ें:
Frequently Asked Questions (FAQs)
1. हज़रत अय्यूब (अलै.) की बीमारी कितने साल तक रही?
हदीसों और मुफ़स्सिरीन के विभिन्न कथनों के अनुसार हज़रत अय्यूब (अलै.) की बीमारी की मुद्दत 7 साल से लेकर 18 साल तक बताई गई है। इस पूरी मुद्दत में वे सब्र और अल्लाह के शुक्र पर क़ायम रहे।
2. हज़रत अय्यूब (अलै.) ने बीमारी से शिफ़ा के लिए कौन सी दुआ मांगी थी?
सूरह अल-अंबिया (आयत 83) में हज़रत अय्यूब की मशहूर दुआ है: “अन्नी मस्स-नियज़-ज़ुर्रु व-अन्त अरहमुर-राहिमीन” (ऐ मेरे रब! मुझे यह तकलीफ़ आ पहुंची है, और तू सबसे बड़ा रहम करने वाला है)।
3. क्या हज़रत अय्यूब के जिस्म में कीड़े पड़ गए थे?
नहीं, यह इसराईली और मनगढ़ंत रिवायत है। इस्लामी अक़ीदे के अनुसार नबियों का जिस्म ऐसी घिनौनी बीमारियों से पाक होता है जिससे लोग नफ़रत करें। उन्हें दर्द और छाले थे, लेकिन उनका दिल, दिमाग़ और ज़ुबान पूरी तरह महफ़ूज़ थे।
4. हज़रत अय्यूब (अलै.) की वफ़ादार बीवी का क्या नाम था?
उनकी बीवी का नाम हज़रत रहमा (बीबी रहमा) था, जो हज़रत यूसुफ़ (अलै.) के खानदान से थीं। उन्होंने बीमारी के पूरे दौर में अपनी बेमिसाल खिदमत और वफ़ादारी से इतिहास रच दिया।
5. हज़रत अय्यूब (अलै.) को शिफ़ा कैसे मिली?
अल्लाह के हुक्म से उन्होंने ज़मीन पर पाँव मारा, जिससे एक ठंडा और शिफ़ा-बख़्श चश्मा फूट पड़ा। उस पानी से नहाने पर उनका बाहरी जिस्म और पानी पीने पर अंदरूनी जिस्म पूरी तरह तंदुरुस्त हो गया।