इस्लामी साल के आठवें मुकद्दस महीने यानी माहे शाबान की 15वीं रात को ‘शब-ए-बरात’ (लाईलातुन निस्फ मिन शाबान) कहा जाता है। यह रहमतों, मग़फ़िरत और तक़दीर के फैसलों की अज़ीम रात है। इस मुबारका रात में मग़फ़िरत, रिज़्क़ में बरकत और सेहत-ओ-सलामती के लिए जो ख़ास दुआ बुज़ुर्गाने दीन और असलाफ़-ए-किराम से तवातिर के साथ पढ़ी जाती रही है, उसे दुआ ए निस्फ शाबान (Dua E Nisf Shaban In Hindi) कहा जाता है। अक्सर मोमिनीन इस मुबारका दुआ को हिंदी उच्चारण और तर्जुमे के साथ तलाश करते हैं ताकि इसे सही तरीके से पढ़कर अल्लाह की रहमत हासिल कर सकें।
हदीस शरीफ़ के मुताबिक़ 15वीं शाबान की रात अल्लाह तबारक व तआला आसमान-ए-दुनिया पर अपनी रहमत का ख़ास नुजूल फ़रमाता है और सुबह सादिक़ तक यह निदा दी जाती है कि ‘है कोई मग़फ़िरत तलब करने वाला जिसे मैं बख़्श दूँ? है कोई रिज़्क़ मांगने वाला जिसे मैं रिज़्क़ अता करूँ?’। इस जामे गाइड में हम दुआ ए निस्फ शाबान के मुकम्मल अरबी कलिमात, आसान हिंदी उच्चारण, हिंदी तर्जुमा, सूरह यासीन के साथ इसे पढ़ने का मसनून तरीका और शब-ए-बरात के अफ़ज़ल आमाल जानेंगे।
अहम फ़ज़ीलत: हज़रत अली (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया: “जब 15वीं शाबान की रात आए, तो रात को क़ियाम (इबादत) करो और दिन में रोज़ा रखो।” (सुनन इब्ने माजा: 1388)। इस रात की दुआएं बारगाहे इलाही में ख़ास तौर पर क़ुबूल की जाती हैं।
दुआ ए निस्फ शाबान अरबी, हिंदी और तर्जुमा (Dua E Nisf Shaban In Hindi)
यह मुबारका दुआ अल्लाह तआला की हम्द व सना, उसकी शान-ए-करीमी के एतराफ़ और तक़दीर में भलाई, रिज़्क़ की फराख़ी और नेक ख़ातिमे की जामे इल्तिजा पर मुश्तमिल है:
दुआ ए निस्फ शाबान अरबी में (Arabic Text):
اَللّٰهُمَّ يَا ذَا الْمَنِّ وَلَا يُمَنُّ عَلَيْهِ، يَا ذَا الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ، يَا ذَا الطَّوْلِ وَالْإِنْعَامِ، لَا إِلٰهَ إِلَّا أَنْتَ ظَهْرَ اللَّاجِئِينَ، وَجَارَ الْمُسْتَجِيرِينَ، وَأَمَانَ الْخَائِفِينَ۔ اَللّٰهُمَّ إِنْ كُنْتَ كَتَبْتَنِيْ عِنْدَكَ فِيْ أُمِّ الْكِتَابِ شَقِيًّا أَوْ مَحْرُوْمًا أَوْ مَطْرُوْدًا أَوْ مُقَتَّرًا عَلَيَّ فِي الرِّزْقِ، فَامْحُ اللّٰهُمَّ بِفَضْلِكَ شَقَاوَتِيْ وَحِرْمَانِيْ وَطَرْدِيْ وَإِقْتَارَ رِزْقِيْ، وَأَثْبِتْنِيْ عِنْدَكَ فِيْ أُمِّ الْكِتَابِ سَعِيْدًا مَّرْزُوْقًا مُّوَفَّقًا لِّلْخَيْرَاتِ، فَإِنَّكَ قُلْتَ وَقَوْلُكَ الْحَقُّ فِيْ كِتَابِكَ الْمُنْزَلِ عَلَى لِسَانِ نَبِيِّكَ الْمُرْسَلِ: «يَمْحُو اللّٰهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ»۔ إِلٰهِيْ بِالتَّجَلِّي الْأَعْظَمِ فِيْ لَيْلَةِ النِّصْفِ مِنْ شَهْرِ شَعْبَانَ الْمُكَرَّمِ، الَّتِيْ يُفْرَقُ فِيْهَا كُلُّ أَمْرٍ حَكِيْمٍ وَّيُبْرَمُ، أَنْ تَكْشِفَ عَنَّا مِنَ الْبَلَاءِ مَا نَعْلَمُ وَمَا لَا نَعْلَمُ، وَمَا أَنْتَ بِهِ أَعْلَمُ، إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعَزُّ الْأَكْرَمُ، وَصَلَّى اللّٰهُ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّعَلَى آلِهِ وَصَحْبِهِ وَسَلَّمَ۔
दुआ ए निस्फ शाबान हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration):
“अल्लाहुम्मा या ज़ल-मन्नि व ला युमन्नु अलैहि, या ज़ल-जलालि वल-इकराम, या ज़त-तौलि वल-इनआम, ला इलाहा इल्ला अंता ज़ह्रुल-लाजिईन, व जारुल-मुस्तजीरीन, व अमानुल-ख़ाइफ़ीन। अल्लाहुम्मा इन कुन्ता कतब-तनी इंदका फ़ी उम्मिल-किताबी शक़िय्यन औ महरूमन औ मतरूदन औ मुकत्तरन अल़य्या फिर-रिज़्क़ि, फमहूल्लाहुम्मा बि-फ़ज़्लिका शकावती व हिरमानी व तरदी व इक़तारा रिज़क़ी, व अस्बितनी इंदका फ़ी उम्मिल-किताबी सईदम-मरज़ूक़म-मुवफ़्फ़कल-लिलखैरात, फ-इन्नका क़ुलता व क़ौलुकल-हक़्क़ु फ़ी किताबिकल-मुन्ज़लि अला लिसानि नबिय्यिकल-मुर्सल: ‘यमहुल्लाहु मा यशा-उ व युस्बितु व इंदहू उम्मुल-किताब’। इलाही बित-तजल्लिल-आज़मी फ़ी लैलतिन-निस्फ़ि मिन शहरि शअ़बानल-मुकर्रम, अल्लती युफ़रक़ु फ़ीहा कुल्लु अम्रिन हकीमिंव-व युब्रम, अन तकशिफ़ा अन्ना मिनल-बलाई मा नालमु व मा ला नालम, व मा अंता बिही आलम, इन्नका अन्तस-अअज़्ज़ुल-अकरम, व सल्लल्लाहु अला सय्यिदिना मुहम्मदिंव-व अला आलिही व सहबिही व सल्लम।”
दुआ ए निस्फ शाबान का हिंदी तर्जुमा (Meaning In Hindi):
“ऐ अल्लाह! ऐ एहसान फ़रमाने वाले जिस पर कोई एहसान नहीं कर सकता! ऐ अज़मत और बुज़ुर्गी वाले! ऐ इनआम व अता फ़रमाने वाले! तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। तू पनाह मांगने वालों की पनाहगाह, हिफ़ाज़त चाहने वालों का मददगार और ख़ौफ़ज़दा लोगों का अमान है। ऐ अल्लाह! अगर तूने लौहे महफ़ूज़ में मुझे बदबख़्त, महरूम, दरगाह से ठुकराया हुआ या तंगदस्ती वाला लिखा है, तो ऐ अल्लाह! अपने फ़ज़्ल से मेरी बदबख़्ती, महरूमी और रिज़्क़ की तंगी को मिटा दे, और मुझे अपने पास नेकबख़्त, रिज़्क़ में बरकत वाला और भलाइयों की तौफ़ीक़ पाने वाला लिख दे। बेशक तेरा कौल सच्चा है जो तूने अपनी नाज़िल कर्दा किताब में फ़रमाया: ‘अल्लाह जिसे चाहता है मिटा देता है और जिसे चाहता है बाक़ी रखता है, और उसी के पास असल किताब है’। ऐ मेरे माबूद! माहे शाबान की इस पंद्रहवीं मुबारका रात की अज़ीम तजल्ली के सदके, जिसमें हर हिकमत वाले काम का फैसला सादिर किया जाता है, तू हमसे उन बलाओं को टाल दे जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते और जिन्हें तू सबसे बेहतर जानता है। बेशक तू सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला और करम फ़रमाने वाला है। और अल्लाह तआला हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद और आपकी आल व असहाब पर रहमत व सलामती नाज़िल फ़रमाए।”

सूरह यासीन के साथ दुआ ए निस्फ शाबान पढ़ने का तरीका
बुज़ुर्गाने दीन का यह मामूल रहा है कि शब-ए-बरात (14वीं शाबान का सूरज डूबने के बाद यानी मग़रिब की नमाज़ के बाद) 3 मर्तबा 2-2 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़कर सूरह यासीन शरीफ़ पढ़ी जाती है और हर बार ख़ास नीयत के साथ दुआ ए निस्फ शाबान मांगी जाती है:
| नफ़्ल व सूरह यासीन | ख़ास नीयत (मक़सद) | आमाल की तरतीब |
|---|---|---|
| पहला अमल | लंबी उम्र व ईमान की हिफ़ाज़त: अल्लाह तआला ईमान व सलामती के साथ उम्र-ए-दराज़ अता फ़रमाए। | 2 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ें, फिर 1 बार सूरह यासीन पढ़ें, और इसके बाद 1 बार दुआ ए निस्फ शाबान पढ़ें। |
| दूसरा अमल | बलाओं व आफ़तों से हिफ़ाज़त: साल भर की तमाम नागाहानी आफ़तों, बीमारियों और परेशानियों से नजात। | 2 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ें, फिर दूसरी बार सूरह यासीन पढ़ें, और इसके बाद 1 बार दुआ ए निस्फ शाबान पढ़ें। |
| तीसरा अमल | रिज़्क़ की बरकत व बे-नियाज़ी: अल्लाह तआला किसी का मोहताज न बनाए और हलाल व वाफ़िर रिज़्क़ दे। | 2 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ें, फिर तीसरी बार सूरह यासीन पढ़ें, और इसके बाद 1 बार दुआ ए निस्फ शाबान पढ़ें। |
शब-ए-बरात की रात के मसनून आमाल और 15वीं शाबान का रोज़ा
15वीं शाबान की मुबारका रात और दिन में मोमिनीन को इन आमाल का ख़ास एहतिमाम करना चाहिए:
- शब-बेदारी (रात में इबादत): पूरी रात या रात के एक हिस्से में जागकर नफ़्ल नमाज़ें (सलातुत तस्बीह, तहज्जुद), क़ुरआन मजीद की तिलावत और इस्तिग़फ़ार करें।
- कसरत से तौबा व इस्तिग़फ़ार: इस रात अल्लाह तआला अनगिनत गुनहगारों को दोज़ख़ की आग से बरी फ़रमाता है। इसलिए सच्चे दिल से अपने गुनाहों की मुआफ़ी मांगें।
- 15वीं शाबान का रोज़ा रखना: नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक़ 15वीं शाबान का नफ़्ल रोज़ा रखना बहुत बड़े सवाब और अफ़ज़लियत का हामिल है।
- क़ब्रिस्तान की ज़ियारत: हदीस शरीफ़ से साबित है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इस रात तन्हा जन्नतुल बक़ी तशरीफ़ ले गए और मरहूमीन के लिए मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाई। अलबत्ता मेले-ठेले लगाना या आतिशबाज़ी करना सख़्त गुनाह और बिदअत है।
इबादत और दुआओं से मुताल्लिक़ दीगर मुफ़ीद मक़ालात:
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. दुआ ए निस्फ शाबान कब पढ़नी चाहिए?
दुआ ए निस्फ शाबान 14वीं शाबान का सूरज डूबने के बाद यानी 15वीं रात (शब-ए-बरात) को मग़रिब की नमाज़ के बाद से लेकर फज्र तक कभी भी पढ़ी जा सकती है। मग़रिब के बाद सूरह यासीन के साथ पढ़ना सबसे अफ़ज़ल माना जाता है।
2. क्या दुआ ए निस्फ शाबान पढ़ने से तक़दीर बदल सकती है?
हदीस शरीफ़ में इरशाद है: ‘दुआ के सिवा कोई चीज़ तक़दीर (मुअल्लक़) को नहीं टाल सकती।’ इस दुआ में बंदा अल्लाह से अपनी तक़दीर में बदबख़्ती मिटाकर नेकबख़्ती और खैर लिखने की इल्तिजा करता है, और अल्लाह दुआ करने वालों की पुकार सुनता है।
3. अगर किसी को पूरी दुआ अरबी में याद न हो तो क्या करे?
अगर पूरी अरबी दुआ याद न हो तो आप इसे हिंदी में देखकर पढ़ सकते हैं, या इसके मफ़हूम और तर्जुमे को अपनी ज़बान में अल्लाह से रो-रो कर मांग सकते हैं। अल्लाह तआला दिलों के हाल और नीयतों को जानता है।
4. क्या शब-ए-बरात में आतिशबाज़ी या हलवा बनाना ज़रूरी है?
नहीं, आतिशबाज़ी, पटाखे जलाना या हलवे को ज़रूरी समझना शरीअत में कोई असल नहीं रखता। आतिशबाज़ी माल का ज़िया और गुनाह है। यह रात महज़ इबादत, नमाज़, तिलावते क़ुरआन और तौबा व इस्तिग़फ़ार के लिए है।
5. 15वीं शाबान का रोज़ा रखना फ़र्ज़ है या नफ़्ल?
15वीं शाबान का रोज़ा नफ़्ल (मुस्तहब) है। हदीस शरीफ़ में इस दिन रोज़ा रखने की ताकीद आई है। जो रखेगा उसे बड़ा सवाब मिलेगा, और अगर कोई किसी उज्र की वजह से न रख सके तो उस पर कोई गुनाह नहीं है।