क़ुरआन मजीद अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का मुक़द्दस और मुअजिज़ाती कलाम है। क़ुरआन करीम की तमाम आयात में एक आयत ऐसी है जिसे नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ‘सैय्यदतुल आयात’ (तमाम आयतों की सरदार) और क़ुरआन की सबसे अज़ीम आयत क़रार दिया है। यह मुबारका आयत सूरह अल-बक़रह के तीसरे पारे (तिलकर रुसुल) की आयत नंबर 255 है, जिसे पूरी दुनिया में आयतल कुर्सी (Ayatul Kursi In Hindi) के नाम से जाना जाता है। इस आयत में अल्लाह तआला की वहदानियत (तौहीद), उसकी कुदरत, सल्तनत और उसके अर्श व कुर्सी की बेमिसाल शान को बेहद जलाल और ख़ूबसूरती के साथ बयान किया गया है।
मुसलमानों के लिए आयतल कुर्सी सिर्फ़ तिलावत की आयत नहीं, बल्कि रूहानी हिफ़ाज़त, जिन्नात, जादू, बुरी नज़र और शैतानी शरारतों से बचने का एक अटूट क़िला है। हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद और रात को सोते वक़्त इसे पढ़ना सुन्नत-ए-मुअक्कदा जैसा मामूल है। इस मुकम्मल और तहक़ीक़ी गाइड में हम आयतल कुर्सी का मुकम्मल अरबी मतन (Arabic Text), आसान हिंदी उच्चारण, लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ हिंदी तर्जुमा (Meaning In Hindi), इसके 10 मुक़द्दस जुमले और सहीह अहादीस की रोशनी में इसकी अज़ीम फ़ज़ीलत को तफ़सील से जानेंगे।
हदीस-ए-मुबारका: हज़रत उबय्य बिन कअब (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनसे पूछा: “ऐ अबू मुन्ज़िर! क्या तुम जानते हो कि अल्लाह की किताब (क़ुरआन) में सबसे अज़ीम आयत कौन सी है?” उन्होंने अर्ज किया: “अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल हय्युल क़य्यूम (आयतल कुर्सी)।” इस पर रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने उनके सीने पर हाथ मारा और फ़रमाया: “ऐ अबू मुन्ज़िर! तुम्हें तुम्हारा इल्म मुबारक हो!” (सहीह मुस्लिम: 810)
आयतल कुर्सी अरबी मतन (Ayatul Kursi in Arabic)
यहाँ आयतल कुर्सी का मुकम्मल अरबी मतन सहीह एअराब के साथ दिया गया है:
اللّٰهُ لَا إِلٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَّلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۖ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ
आयतल कुर्सी हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration)
जो लोग अरबी नहीं पढ़ सकते, वे इसे हिंदी हिज्जे के ज़रिए आसानी से सहीह तलफ़्फ़ुज़ के साथ याद कर सकते हैं:
“अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुव, अल-हय्युल क़य्यूम।
ला तअख़ुज़ुहू सिनतुंव-वला नौम।
लहू मा फ़िस-समावाति व मा फ़िल-अर्द।
मन ज़ल्लज़ी यश्फ़उ इन्दहू इल्ला बि-इज़्निह।
या’लमु मा बैना ऐदीहिम व मा ख़ल्फ़हुम।
वला युहीतूना बि-शैइम-मिन इल्मिही इल्ला बिमा शा-अ।
वसि-अ कुर्सीयुहुस-समावाति वल-अर्द।
वला यऊदुहू हिफ़्जुहुमा, वहुवल अलिय्युल अज़ीम।”
आयतल कुर्सी का मुकम्मल हिंदी तर्जुमा (Meaning In Hindi)
“अल्लाह—उसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह हमेशा ज़िंदा रहने वाला और सारी कायनात को संभालने वाला (क़ायम रखने वाला) है।
न उसे कभी ऊंघ आती है और न कभी नींद आती है।
उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। कौन है जो उसकी इजाज़त के बग़ैर उसके सामने किसी की सिफ़ारिश (शफ़ाअत) कर सके?
वह जानता है जो कुछ बंदों के सामने है (यानी उनका हाल और मुस्तक़बिल) और जो कुछ उनके पीछे है (यानी उनका माज़ी)।
और वे लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ का अहाता (घेराव) नहीं कर सकते, सिवाय उस क़द्र के जितना वह खुद चाहे।
उसकी कुर्सी (सल्तनत व इक़्तिदार) तमाम आसमानों और ज़मीन पर फैली हुई है, और इन दोनों की हिफ़ाज़त करना उसे ज़रा भी थकाती नहीं।
और वही सबसे बुलन्द और सबसे अज़ीम (बुज़ुर्ग) है।”
आयतल कुर्सी के 10 अज़ीम पैग़ाम (Tafseer & Meaning)
| नं. | क़ुरआनी हिस्सा | अज़ीम मफ़हूम व हिकमत |
|---|---|---|
| 1 | अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुव | खालिस तौहीद का ऐलान—अल्लाह के सिवा कोई माबूद व इबादत के लायक़ नहीं। |
| 2 | अल-हय्युल क़य्यूम | वह हमेशा ज़िंदा रहने वाला है और उसी के सहारे पूरी कायनात चल रही है। |
| 3 | ला तअख़ुज़ुहू सिनतुंव-वला नौम | इंसानी कमज़ोरियों (ऊंघ और नींद) से अल्लाह पाक है, वह हर लम्हा बाख़बर है। |
| 4 | लहू मा फ़िस-समावाति व मा फ़िल-अर्द | ज़मीन और आसमानों की हर चीज़ का तन्हा मालिक वही है। |
| 5 | मन ज़ल्लज़ी यश्फ़उ इन्दहू इल्ला बि-इज़्निह | उसकी अज़मत के सामने कोई उसकी इजाज़त के बग़ैर सिफ़ारिश नहीं कर सकता। |
| 6 | या’लमु मा बैना ऐदीहिम व मा ख़ल्फ़हुम | उसका इल्म कामिल है, वह इंसान के माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल से वाक़िफ़ है। |
| 7 | वला युहीतूना बि-शैइम-मिन इल्मिही… | मख़लूक़ को सिर्फ़ उतना ही इल्म मिल सकता है जितना अल्लाह चाहे। |
| 8 | वसि-अ कुर्सीयुहुस-समावाति वल-अर्द | उसकी कुर्सी इतनी वसीअ है कि सातों आसमान व ज़मीन उसमें समाए हुए हैं। |
| 9 | वला यऊदुहू हिफ़्जुहुमा | तमाम कायनात को संभालना और हिफ़ाज़त करना उसके लिए ज़रा भी भारी नहीं। |
| 10 | वहुवल अलिय्युल अज़ीम | वही सबसे आला, बुलन्द और अज़ीमुश्शान रब है। |
आयतल कुर्सी पढ़ने की अज़ीम फ़ज़ीलत व बरकतें
- जन्नत में दाख़िले की ज़मानत: हज़रत अबू उमामा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया: “जिस शख़्स ने हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद आयतल कुर्सी पढ़ी, उसे जन्नत में दाख़िल होने से मौत के सिवा कोई चीज़ नहीं रोक सकती।” (सुनन नसाई कुबरा: 9848)
- रात भर फ़रिश्ते की निगरानी: सहीह बुख़ारी में हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) की मशहूर रिवायत है कि जो शख़्स रात को सोते वक़्त आयतल कुर्सी पढ़ ले, तो अल्लाह की तरफ़ से सुबह तक उसके लिए एक मुहाफ़िज़ (फ़रिश्ता) मुक़र्रर रहता है और शैतान उसके क़रीब भी नहीं आ सकता।
- घर से शैतान का भागना: जिस घर में आयतल कुर्सी पढ़ी जाती है, उस घर से शैतान भाग जाता है और जादू व जिन्नात के असरात ज़ाइल (ख़त्म) हो जाते हैं।
- सफ़र और जान-माल की हिफ़ाज़त: घर से निकलते वक़्त या सफ़र पर जाते वक़्त आयतल कुर्सी पढ़ने से इंसान हर तरह के हादसों और नुक्सान से महफ़ूज़ रहता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. आयतल कुर्सी क़ुरआन की किस सूरह में है?
आयतल कुर्सी क़ुरआन मजीद की दूसरी सूरह ‘सूरह अल-बक़रह’ के तीसरे पारे में आयत नंबर 255 है।
2. आयतल कुर्सी को ‘कुर्सी’ क्यों कहा जाता है?
इस आयत में लफ़्ज़ ‘कुर्सिय्युहु’ (उसकी कुर्सी) आया है, जो अल्लाह तआला के अज़ीम इल्म, सल्तनत, बादशाही और कुदरत की वस्अत को ज़ाहिर करता है। इसी मुनासबत से इसका नाम आयतल कुर्सी पड़ा।
3. क्या हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद आयतल कुर्सी पढ़ना ज़रूरी है?
यह फ़र्ज़ नहीं बल्कि सुन्नत-ए-मुस्तहब्बा है। हदीस के मुताबिक जो शख़्स हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद इसे पढ़ता है, उसके और जन्नत के दरमियान सिर्फ़ मौत का फ़ासला रह जाता है।
4. क्या बिना वज़ू ज़बानी आयतल कुर्सी पढ़ सकते हैं?
हाँ, अगर क़ुरआन मजीद को हाथ न लगाया जाए, तो ज़बानी याददाश्त से बिना वज़ू आयतल कुर्सी पढ़ना पूरी तरह जाइज़ है। अलबत्ता बा-वज़ू पढ़ना ज़्यादा सवाब का बाइस है।