इस्लाम में किसी मुसलमान के इंतिक़ाल (वफ़ात) के बाद उसके ज़िंदा मुसलमान भाइयों पर जो सबसे अहम और आख़िरी शरई हक़ आयद होता है, वह उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करना है। नमाज़-ए-जनाज़ा दरअसल मय्यत (मरहूम) के लिए अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बारगाह में मग़फ़िरत (बख़्शिश), रहमत और बख़्शाइश की एक इज्तेमाई (सामूहिक) दुआ है। शरीयत-ए-इस्लामिया में यह नमाज़ फ़र्ज़-ए-किफ़ाया (Farz-e-Kifaya) है, यानी अगर बस्ती या मोहल्ले के चंद लोग भी इसे बा-जमात अदा कर लें तो सब की तरफ़ से फ़र्ज़ अदा हो जाता है। इसी मुकद्दस इबादत को जनाज़ा की नमाज़ का तरीका (Janaza Ki Namaz Ka Tarika In Hindi) कहा जाता है।
चूंकि जनाज़ा की नमाज़ में न तो रुकूअ होता है और न ही सज्दा, बल्कि यह खड़े होकर चार तकबीरों के साथ पढ़ी जाती है, इसलिए बहुत से लोग इसमें पढ़ी जाने वाली सना, दुरूद शरीफ़ और बालिग़ या नाबालिग़ की मख़सूस दुआओं को लेकर कशमकश में रहते हैं। इस मुकम्मल गाइड में हम जनाज़ा की नमाज़ की नियत, 4 तकबीरों का आसान तरीक़ा, बालिग़ मर्द व औरत की दुआ, नाबालिग़ बच्चे व बच्ची की दुआ, अरबी मतन, आसान हिंदी उच्चारण और लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ हिंदी तर्जुमा जानेंगे।
हदीस-ए-मुबारका: हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “जो शख़्स ईमान की हालत में और सवाब की नीयत से किसी मुसलमान के जनाज़े के साथ जाए, यहाँ तक कि उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़े और दफ़न से फ़ारिग़ हो, तो वह दो क़ीरात सवाब लेकर लौटता है। हर क़ीरात उहुद पहाड़ के बराबर होता है।” (सहीह बुख़ारी: 47)
जनाज़ा की नमाज़ के अरकान व शर्तें (Key Rules)
- दो फ़र्ज़: नमाज़-ए-जनाज़ा में दो चीज़ें फ़र्ज़ हैं: (1) चार मर्तबा “अल्लाहु अकबर” कहना (चार तकबीरें), और (2) क़ियाम यानी खड़े होकर नमाज़ अदा करना (बिना शरई उज़्र के बैठकर पढ़ना जाइज़ नहीं)।
- तीन सुन्नतें: (1) अल्लाह तआला की हम्द व सना पढ़ना, (2) नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर दुरूद शरीफ़ पढ़ना, और (3) मय्यत के लिए मग़फ़िरत की दुआ मांगना।
- पाकी की शर्त: आम नमाज़ों की तरह जनाज़ा के लिए भी बदन, कपड़े और जगह का पाक होना और बा-वज़ू होना लाज़िमी शर्त है।
जनाज़ा की नमाज़ की नियत (Niyat for Janaza)
नियत दिल के इरादे को कहते हैं। दिल में यह इरादा रखते हुए ज़ुबान से भी इन अल्फ़ाज़ को दोहराना मुस्तहब है:
जनाज़ा की नियत हिंदी में:
“नियत की मैंने नमाज़-ए-जनाज़ा की, चार तकबीरों के साथ, फ़र्ज़-ए-किफ़ाया, सना वास्ते अल्लाह तआला के, दुरूद वास्ते रसूलुल्लाह (सल्ल.) के, दुआ वास्ते इस मय्यत के, मुंह मेरा किबला शरीफ़ की तरफ़, पीछे इस इमाम के, अल्लाहू अकबर।”
जनाज़ा की नमाज़ की 4 तकबीरों का मुकम्मल चार्ट
| तकबीर | हाथ उठाना / बांधना | क्या पढ़ा जाएगा? |
|---|---|---|
| पहली तकबीर | हाथ कानों तक उठाकर नाफ़ के नीचे बांध लें | सना (सुब्हानकल्लाहुम्मा… व जल्ला सनाउका के साथ) |
| दूसरी तकबीर | बिना हाथ उठाए सिर्फ़ “अल्लाहु अकबर” कहें | दुरूद-ए-इब्राहिमी (नमाज़ वाला दुरूद) |
| तीसरी तकबीर | बिना हाथ उठाए सिर्फ़ “अल्लाहु अकबर” कहें | मय्यत की मग़फ़िरत की दुआ (बालिग़ या नाबालिग़ की) |
| चौथी तकबीर | बिना हाथ उठाए “अल्लाहु अकबर” कहकर दोनों तरफ़ सलाम फेरें | सलाम फेरते हुए हाथ छोड़ दें |
जनाज़ा की दुआएं (अरबी मतन, हिंदी उच्चारण व तर्जुमा)
जनाज़ा की नमाज़ में तकबीरों के दरमियान पढ़ी जाने वाली तमाम दुआएं यहाँ तरतीब से दी जा रही हैं:
1. पहली तकबीर के बाद पढ़ी जाने वाली सना:
سُبْحَانَكَ اللّٰهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَىٰ جَدُّكَ، وَجَلَّ ثَنَاؤُكَ، وَلَا إِلٰهَ غَيْرُكَ
हिंदी उच्चारण: “सुब्हान-कल्लाहुम्मा व बि-हम्दिका, व तबारकस्मूका, व तआला जद्दुका, व जल्ला सनाउका, व ला इलाहा गैरुक।”
हिंदी तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! तेरी ज़ात पाक है और तेरी तारीफ़ के साथ है, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी बुज़ुर्गी बहुत आला है, तेरी तारीफ़ सबसे बुलन्द व आलीशान है, और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।”
2. तीसरी तकबीर: बालिग़ मय्यत (मर्द व औरत) की दुआ:
اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا، وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا، وَصَغِيرِنَا وَكَبِيرِنَا، وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا، اللّٰهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الْإِسْلَامِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الْإِيمَانِ
हिंदी उच्चारण: “अल्लाहुम्मग़फ़िर लि-हय्यिना व मय्यितिना, व शाहिदना व ग़ाइबिना, व सग़ीरिना व कबीरिना, व ज़करिना व उन्साना। अल्लाहुम्मा मन अहयैतहू मिन्ना फ़-अहयिही अलल-इस्लाम, व मन तवफ़्फ़ैतहू मिन्ना फ़-तवफ़्फ़हू अलल-ईमान।”
हिंदी तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! बख़्श दे हमारे ज़िंदों को और हमारे मुर्दों को, हमारे मौजूद लोगों को और हमारे ग़ायब लोगों को, हमारे छोटों को और हमारे बड़ों को, और हमारे मर्दों को और हमारी औरतों को। ऐ अल्लाह! हम में से तू जिसे ज़िंदा रखे उसे इस्लाम पर ज़िंदा रख, और जिसे तू मौत दे उसे ईमान पर मौत दे।”
3. नाबालिग़ लड़के के जनाज़े की दुआ:
اللّٰهُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَطًا، وَّاجْعَلْهُ لَنَا أَجْرًا وَّذُخْرًا، وَّاجْعَلْهُ لَنَا شَافِعًا وَّمُشَفَّعًا
हिंदी उच्चारण: “अल्लाहुम मज-अलहु लना फ़रतांव-वज-अलहु लना अज्रांव-व जुख्रांव-वज-अलहु लना शाफ़िआंव-व मुशफ़्फ़आ।”
हिंदी तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! इस बच्चे को हमारे लिए आगे पहुँच कर इंतज़ाम करने वाला बना, और इसे हमारे लिए अजर व सवाब और ज़ख़ीरा बना, और इसे हमारे हक़ में शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करने वाला और मक़बूल-ए-शफ़ाअत बना।”
4. नाबालिग़ लड़की के जनाज़े की दुआ:
اللّٰهُمَّ اجْعَلْهَا لَنَا فَرَطًا، وَّاجْعَلْهَا لَنَا أَجْرًا وَّذُخْرًا، وَّاجْعَلْهَا لَنَا شَافِعَةً وَّمُشَفَّعَةً
हिंदी उच्चारण: “अल्लाहुम मज-अलहा लना फ़रतांव-वज-अलहा लना अज्रांव-व जुख्रांव-वज-अलहा लना शाफ़िअतांव-व मुशफ़्फ़आ।”
हिंदी तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! इस बच्ची को हमारे लिए आगे पहुँच कर इंतज़ाम करने वाली बना, और इसे हमारे लिए अजर और ज़ख़ीरा बना, और इसे हमारे हक़ में शफ़ाअत करने वाली और मक़बूल-ए-शफ़ाअत बना।”
अगर किसी को जनाज़ा की दुआ याद न हो तो क्या पढ़े?
अगर किसी शख़्स को जनाज़ा की मख़सूस दुआ याद न हो, तो उसे नमाज़ छोड़े बिना जमात में शामिल होना चाहिए। ऐसी सूरत में वह तीसरी तकबीर के बाद यह आसान क़ुरआनी दुआ पढ़ सकता है:
رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ
उच्चारण: “रब्बनाग़-फ़िरली व लि-वालिदय्या व लिल-मुमिनीना यौमा यक़ूमुल हिसाब।”
तर्जुमा: “ऐ हमारे परवरदिगार! मुझे, मेरे वालिदैन को और तमाम मोमिनों को उस दिन बख़्श देना जिस दिन हिसाब क़ायम होगा।” या फिर केवल “अल्लाहुम्मग़फ़िर लहू” (ऐ अल्लाह इसे बख़्श दे) भी कह सकते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. क्या जनाज़ा की नमाज़ में रुकूअ और सज्दा होता है?
नहीं, जनाज़ा की नमाज़ में रुकूअ, क़ौमा, सज्दा या क़ाएदा नहीं होता। यह मुकम्मल नमाज़ खड़े होकर चार तकबीरों के साथ अदा की जाती है।
2. क्या जूते पहनकर जनाज़ा की नमाज़ पढ़ सकते हैं?
अगर जूते और ज़मीन दोनों पूरी तरह पाक और साफ़ हों तो जूते पहनकर नमाज़ पढ़ना जाइज़ है। लेकिन एहतियातन जूते उतारकर उन पर पैर रखकर खड़ा होना बेहतर माना जाता है ताकि नापाकी का शुबहा न रहे।
3. अगर किसी की एक या दो तकबीर छूट जाए तो वह कैसे शामिल हो?
जब इमाम अगली तकबीर कहे, तब आप “अल्लाहु अकबर” कहकर शामिल हो जाएं। जब इमाम सलाम फेरे, तो आप सलाम न फेरें बल्कि अपनी छूटी हुई तकबीरें कहकर सलाम फेर लें।
4. क्या औरतें भी जनाज़ा की नमाज़ में शरीक हो सकती हैं?
अगर औरतें घर में मरहूम के लिए नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना चाहें तो पढ़ सकती हैं, लेकिन क़ब्रिस्तान या आम मर्दों के मजमे में जाकर जनाज़ा में शामिल होना मकरूह-ए-तहरीमी है।