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सूरह अस्र इन हिंदी (Surah Asr in Hindi) | अरबी मतन, हिंदी तर्जुमा, ज़माने की क़सम व फ़ज़ीलत

By Mariya Ansari •

पवित्र क़ुरआन मजीद की 103वीं सूरह सूरह अस्र (Surah Al-Asr) है। यह क़ुरआन करीम के 30 (अम्मा पारा) में स्थित है और इसमें कुल 3 आयतें हैं। सूरह अस्र क़ुरआन मजीद की एक निहायत जामेअ और संक्षिप्त सूरह है जिसमें केवल 3 आयतें हैं। इसमें अल्लाह तआला ने ज़माने (वक़्त) की क़सम खाकर फ़रमाया है कि तमाम इंसान घाटे (नुक़सान) में हैं, सिवाय उनके जो चार गुणों (ईमान, नेक अमल, हक़ की नसीहत और सब्र की ताकीद) को अपनाते हैं।

मुसलमानों के लिए इस सूरह को सही उच्चारण और तर्जुमे के साथ समझना बेहद ज़रूरी है क्योंकि यह रोज़मर्रा की पाँचों वक़्त की नमाज़ों में कसरत से पढ़ी जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण सूरतों में से एक है। इस विस्तृत लेख में सूरह अस्र का शुद्ध अरबी मतन, आसान हिंदी उच्चारण, शब्द-दर-शब्द तर्जुमा, शान-ए-नुज़ूल, सहीह हदीस के हवाले, फ़ज़ीलत व नमाज़ में पढ़ने का सुन्नत तरीक़ा पूरी तफ़्सील के साथ पेश किया गया है।

मुख़्तसर ख़ुलासा: सूरह अस्र क़ुरआन मजीद की एक निहायत जामेअ और संक्षिप्त सूरह है जिसमें केवल 3 आयतें हैं। इसमें अल्लाह तआला ने ज़माने (वक़्त) की क़सम खाकर फ़रमाया है कि तमाम इंसान घाटे (नुक़सान) में हैं, सिवाय उनके जो चार गुणों (ईमान, नेक अमल, हक़ की नसीहत और सब्र की ताकीद) को अपनाते हैं।

सूरह अस्र का संक्षिप्त परिचय (Overview Table)

विवरण (Aspect) प्रामाणिक जानकारी (Details)
सूरह संख्या (Surah Number) 103
पारा (Juz) 30 (अम्मा पारा)
कुल आयतें (Total Verses) 3 आयतें
कुल रुकूअ (Ruku) 1 रुकूअ
शब्द व अक्षर संख्या 14 कलिमात और 70 हुरूफ़
मक़ाम-ए-नुज़ूल (Classification) मक्की सूरह

सूरह अस्र अरबी मतन, हिंदी उच्चारण व तर्जुमा (आयत दर आयत)

नीचे सूरह अस्र की सभी आयतों का स्पष्ट अरबी मतन, आसान हिंदी उच्चारण (Transliteration) और अर्थ दिया गया है ताकि आप इसे सही तरीक़े से याद कर सकें:

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

हिंदी उच्चारण: बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

तर्जुमा: अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत मेहरबान और हमेशा रहम फ़रमाने वाला है।

आयत 1

وَالْعَصْرِ ﴿١﴾

हिंदी उच्चारण: वल-अस्र।

हिंदी तर्जुमा: ज़माने (गुज़रते वक़्त) की क़सम!

आयत 2

إِنَّ الْإِنسَانَ لَفِي خُسْرٍ ﴿٢﴾

हिंदी उच्चारण: इन्नल-इंसा-न लफ़ी ख़ुस्र।

हिंदी तर्जुमा: बेशक (तमाम) इंसान बड़े घाटे (नुक़सान और हलाकत) में है।

आयत 3

إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ ﴿٣﴾

हिंदी उच्चारण: इल्लल-लज़ी-न आ-मनू व अमिलुस्-सालिहाति व तवासौ बिल-हक़्क़ि व तवासौ बिस-स़ब्र।

हिंदी तर्जुमा: सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए, और जिन्होंने नेक आमाल किए, और जिन्होंने एक-दूसरे को हक़ की वसीयत की और सब्र की ताकीद की।

सूरह अस्र का शब्द-दर-शब्द अर्थ (Word-by-Word Meaning)

अरबी भाषा की गहराई और क़ुरआनी अल्फ़ाज़ के सही मफ़हूम को समझने के लिए प्रत्येक शब्द का अर्थ नीचे दी गई तालिका में देखें:

अरबी शब्द (Arabic) हिंदी उच्चारण शाब्दिक अर्थ (Hindi Meaning)
وَالْعَصْرِ वल-अस्र वक़्त / ज़माने की क़सम
إِنَّ इन्ना बेशक / यक़ीनन
الْإِنسَانَ अल्-इंसान मानव जाति / इंसान
لَفِي लफ़ी ज़रूर में है
خُسْرٍ ख़ुस्रिन घाटे / नुक़सान
إِلَّا इल्ला सिवाय / मगर
الَّذِينَ अल्लज़ीना वे लोग जो
آمَنُوا आमनू ईमान लाए
وَعَمِلُوا व अमिलू और उन्होंने किए
الصَّالِحَاتِ अस्-सालिहात नेक आमाल / भले काम
وَتَوَاصَوْا व तवासौ और एक-दूसरे को ताकीद की
بِالْحَقِّ बिल-हक़्क़ि हक़ (सत्य) की
وَتَوَاصَوْا व तवासौ और एक-दूसरे को नसीहत की
بِالصَّبْرِ बिस-सब्र सब्र (धैर्य व स्थिरता) की

सूरह अस्र का शान-ए-नुज़ूल (पृष्ठभूमि व अवतरण का कारण)

अरब के लोग शाम के वक़्त (अस्र के समय) आपस में गपशप और फुज़ूल बातों में वक़्त ज़ाया करते थे और अक्सर ज़माने को बुरा-भला कहते थे कि ज़माने ने हमें बर्बाद कर दिया। तब अल्लाह तआला ने ज़माने की क़सम खाकर फ़रमाया कि ज़माना तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा रहा, बल्कि तुम अपनी ग़फ़लत, कुफ़्र और वक़्त की बर्बादी की वजह से ख़ुद नुक़सान में हो। इंसान की असली कामयाबी वक़्त की क़द्र करने और दीन पर अमल करने में है।

सूरह अस्र की फ़ज़ीलत व रूहानी बरकत
सूरह अस्र की तिलावत से मोमिन के दिल में ईमान की ताज़गी और रूहानी सुकून हासिल होता है।

सूरह अस्र की फ़ज़ीलत पर प्रामाणिक सहीह अहादीस

हदीस की किताबों में सूरह अस्र की असीम फ़ज़ीलतें दर्ज हैं:

इमाम शाफ़ई (रह.) का अज़ीम कौल

प्रसिद्ध इमाम, हज़रत इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं: ‘अगर अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ पर क़ुरआन मजीद में से सिर्फ़ सूरह अस्र के सिवा कुछ भी नाज़िल न फ़रमाता, तो यह सूरह ही इंसानों की हिदायत और कामयाबी के लिए काफ़ी हो जाती।’

तबरानी – सहाबा-ए-किराम का मामूल

हज़रत अबी मदीना दारमी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दो सहाबा जब भी आपस में मुलाक़ात करते, तो उस वक़्त तक एक-दूसरे से जुदा नहीं होते थे जब तक कि उनमें से एक दूसरे को सूरह अस्र पढ़कर न सुना देता, और फिर एक-दूसरे को सलाम करते।

सहीह बुख़ारी (हदीस 6412) – दो नेमतों की क़द्र

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: ‘दो नेमतें ऐसी हैं जिनके बारे में अक्सर लोग धोखे (ग़फ़लत) में रहते हैं: एक सेहत और दूसरा फ़ुर्सत (ख़ाली वक़्त)।’ सूरह अस्र वक़्त की इसी अहमियत को उजागर करती है।

सूरह अस्र पढ़ने के रूहानी व व्यावहारिक फ़ायदे

इस पवित्र सूरह की नियमित तिलावत से हासिल होने वाले प्रमुख आध्यात्मिक लाभ निम्नलिखित हैं:

  • वक़्त की क़ीमत का एहसास होना और फ़ुज़ूल कामों व समय की बर्बादी से नजात।
  • ज़िंदगी में घाटे और नुक़सान से बचकर वास्तविक सफलता (फ़लाह) का मार्ग मिलना।
  • मुसीबतों और आज़माइशों के वक़्त सब्र और सच्चाई पर क़ायम रहने की ताक़त।
  • आपसी भाईचारे और एक-दूसरे को हक़ व सब्र की दावत देने की भावना पैदा होना।

नमाज़ में सूरह अस्र पढ़ने का मसनून तरीक़ा व नियम

सूरह अस्र को नमाज़ में सूरह फ़ातिहा के बाद पढ़ा जाता है। चूंकि यह संक्षिप्त सूरह है, इसलिए नमाज़ की किसी भी रकात में इसे पढ़ना आसान और सवाब का बाइस है।

क़ुरआन मजीद की प्रमुख सूरतों के विस्तृत लेख

Frequently Asked Questions (FAQs)

1. इमाम शाफ़ई ने सूरह अस्र के बारे में क्या फ़रमाया था?

इमाम शाफ़ई रह. ने फ़रमाया था कि अगर क़ुरआन में केवल सूरह अस्र ही नाज़िल होती, तो यह पूरी इंसानियत की हिदायत के लिए काफ़ी थी, क्योंकि इसमें कामयाबी के चारों मूल सिद्धांत समाहित हैं।

2. घाटे से बचने के लिए सूरह अस्र में कौन से 4 गुण बताए गए हैं?

1. सच्चा ईमान, 2. नेक आमाल (सत्कर्म), 3. एक-दूसरे को हक़ (सत्य) की नसीहत, और 4. मुश्किलों में सब्र की ताकीद।

3. सूरह अस्र में किस चीज़ की क़सम खाई गई है?

सूरह अस्र की पहली आयत में ‘ज़माने’ (वक़्त/गुज़रते समय) की क़सम खाई गई है ताकि इंसान समझ सके कि उसकी उम्र की बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है।

4. सूरह अस्र में कुल कितनी आयतें हैं?

सूरह अस्र में कुल 3 आयतें, 14 शब्द और 70 अक्षर हैं। यह क़ुरआन की सबसे संक्षिप्त सूरतों में से एक है।

5. सहाबा-ए-किराम विदा होते समय सूरह अस्र क्यों पढ़ते थे?

सहाबा-ए-किराम एक-दूसरे को ईमान, हक़ और सब्र की याद दिलाने और वक़्त की क़द्र करने के लिए विदाई के समय सूरह अस्र सुनाया करते थे।

6. सूरह अस्र का सूरह नंबर और पारा कौन सा है?

सूरह अस्र क़ुरआन मजीद की 103वीं सूरह है और यह 30वें पारे (अम्मा पारा) में स्थित है।

Mariya Ansari
लेखक के बारे में

Mariya Ansari

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