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रोज़ा खोलने की दुआ हिंदी में | Roza Kholne Ki Dua in Hindi (इफ़्तार की सुन्नत दुआ, फ़ोटो व तरीक़ा)

By Mariya Ansari •

माह-ए-रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का सबसे बरकत और रहमतों वाला महीना है। इस मुक़द्दस महीने में सुबह सादिक़ से लेकर सूरज डूबने (ग़ुरूब-ए-आफ़ताब) तक भूखे-प्यासे रहकर अल्लाह की रज़ा के लिए रोज़ा रखा जाता है। जब दिन भर की इबादत, सब्र और परहेज़गारी के बाद शाम को रोज़ा खोलने का वक़्त आता है, तो उस पवित्र पल को इफ़्तार (Iftar) कहा जाता है। इस्लाम में इफ़्तार के वक़्त को बहुत अज़ीम मक़ाम हासिल है, क्योंकि हदीस-ए-पाक के मुताबिक़ इस नाज़ुक वक़्त में रोज़ेदार की कोई भी दुआ रद्द नहीं होती। हर मुसलमान के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि Roza Kholne Ki Dua in Hindi क्या है, इफ़्तार की सुन्नत दुआएं कौन सी हैं और सही तरीक़े से रोज़ा कैसे खोला जाता है।

हदीस-ए-रसूल: हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “इफ़्तार के वक़्त रोज़ेदार के लिए एक ऐसी दुआ होती है जो कभी रद्द नहीं की जाती।” (सुनन इब्न माजा: 1753)

दुआ का नाम (Dua Category) हदीस संदर्भ (Hadith Source) पढ़ने का सही समय (Recitation Time)
सुन्नत इफ़्तार दुआ (ज़हबज़्ज़म-उ…) सुनन अबू दाऊद: 2357 (हसन/सहीह) इफ़्तार का पहला घूंट पानी या खजूर खाने के तुरंत बाद
मशहूर इफ़्तार दुआ (अल्लाहुम्मा लका सुम्तु…) सुनन अबू दाऊद: 2358 (मुरसल) इफ़्तार करते समय या उससे कुछ लम्हे पहले
मेज़बान के लिए दुआ (इफ़्तार कराने वाले को) सुनन अबू दाऊद: 3854 (सहीह) किसी के घर दावत-ए-इफ़्तार खाने के बाद
सुन्नत इफ़्तार सामग्री तिर्मिज़ी: 695 / अबू दाऊद: 2356 ताज़ी खजूर (रुतब), सूखी खजूर (तम्र) या साफ़ पानी

1. सहीह हदीस की सुन्नत इफ़्तार दुआ (Dua 1)

हदीस की किताबों में सनद के लिहाज़ से सबसे प्रामाणिक (Authentic) दुआ वह है जिसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने रिवायत किया है। जब प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इफ़्तार फ़रमाते, तो यह दुआ पढ़ते थे:

ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ

हिंदी उच्चारण (Hindi Pronunciation):

ज़हबज़्ज़म-उ वब्तल्लतिल ‘उरूक़ु व सबतल अजरु इन शा अल्लाह।

English Transliteration: Dhahaba adh-Dhama’u wabtallatil-‘urooqu wa thabatal-ajru in sha Allah.

हिंदी तर्जुमा (Meaning): “प्यास बुझ गई, रगें (नसें) तर हो गईं और अगर अल्लाह ने चाहा तो अज्र (सवाब) पक्का हो गया।” (सुनन अबू दाऊद: 2357)

इस दुआ के अल्फ़ाज़ पर ग़ौर करें तो इसमें अल्लाह की नेमत का गहरा शुक्रिया छुपा है। पूरे दिन की गर्मी और तिश्नगी के बाद जैसे ही पानी हलक़ से नीचे उतरता है, इंसान की नस-नस में ताज़गी दौड़ जाती है। उस वक़्त यह दुआ दिल से निकलती है कि सिर्फ़ प्यास ही नहीं बुझी, बल्कि अल्लाह के वादे के मुताबिक़ इस रोज़े का सवाब भी हमेशा के लिए नाम-ए-आमाल में दर्ज हो गया।

2. मशहूर और आम पढ़ी जाने वाली इफ़्तार दुआ (Dua 2)

मुस्लिम घरों और दस्तरख़्वान पर आम तौर पर जो दुआ सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती है, वह हज़रत मुआज़ बिन ज़ोहरा (रहमतुल्लाह अलैह) से मरवी रिवायत है:

اللَّهُمَّ إِنِّي لَكَ صُمْتُ وَعَلَى رِزْقِكَ أَفْطَرْتُ

हिंदी उच्चारण (Hindi Pronunciation):

अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु व’अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु।

English Transliteration: Allahumma inni laka sumtu wa ‘ala rizqika aftartu.

हिंदी तर्जुमा (Meaning): “ऐ अल्लाह! मैंने तेरे ही लिए रोज़ा रखा और तेरे ही दिए हुए रिज़्क़ से इफ़्तार किया।” (सुनन अबू दाऊद: 2358)

दुआ में ‘वबिका आमन्तु’ जोड़ने की शरई वज़ाहत

हमारे भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश) में बहुत से लोग इस दुआ को इस तरह पढ़ते हैं: “अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु वबिका आमन्तु व’अलैका तवक्कल्तु व’अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु”। उलमा-ए-किराम की तहक़ीक़ के मुताबिक़ हदीस की मूल किताबों में सिर्फ़ “अल्लाहुम्मा लका सुम्तु व’अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु” ही आया है। “वबिका आमन्तु व’अलैका तवक्कल्तु” (और तुझ पर ईमान लाया और तुझ पर भरोसा किया) के मानी अच्छे और सही हैं, लेकिन सुन्नत के मुतालिक़ हदीस के मूल अल्फ़ाज़ पढ़ना ज़्यादा अफ़ज़ल है।

इफ़्तार की दुआ कब पढ़नी चाहिए: पहले या बाद में?

बहुत से रोज़ेदारों के ज़हन में यह सवाल रहता है कि क्या दुआ खाने-पीने से पहले पढ़नी है या खा-पी लेने के बाद? उलमा और हदीस के व्याख्याकारों ने दोनों दुआओं के लफ़्ज़ों को देखकर बहुत साफ़ तरीक़ा बयान किया है:

  • इफ़्तार से ठीक पहले: जब मग़रिब की अज़ान हो जाए या सूरज डूब जाए, तो “बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर-रहीम” और “अल्लाहुम्मा लका सुम्तु व’अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु” पढ़कर खजूर या पानी मुंह में रखें।
  • इफ़्तार का पहला घूंट लेने के बाद: जब एक घूंट पानी पी लें या एक खजूर खा लें, तब “ज़हबज़्ज़म-उ वब्तल्लतिल ‘उरूक़ु व सबतल अजरु इन शा अल्लाह” पढ़ें, क्योंकि इस दुआ का मतलब ही यह है कि ‘प्यास बुझ गई और नसें तर हो गईं’। प्यास बुझने का यह शब्द पानी पीने के बाद ही सच साबित होता है।

मेज़बान के लिए दुआ (किसी के घर इफ़्तार करने पर)

रमज़ान में रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दोस्तों के यहां इफ़्तार की दावत खाना आम बात है। इस्लाम ने सिखाया है कि जो शख़्स आपको इफ़्तार कराए, उसके लिए दिल खोलकर दुआ करनी चाहिए। जब नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हज़रत साद बिन उबादा (रज़ियल्लाहु अन्हु) के यहां इफ़्तार फ़रमाते थे, तो मेज़बान को यह दुआ देते थे:

أَفْطَرَ عِنْدَكُمُ الصَّائِمُونَ وَأَكَلَ طَعَامَكُمُ الأَبْرَارُ وَصَلَّتْ عَلَيْكُمُ الْمَلاَئِكَةُ

हिंदी उच्चारण (Hindi Pronunciation):

अफ़्तरा ‘इन्दकुमुस-सा-इमूना व अकाला तआ़मकुमुल अब्रारु व सल्लत ‘अलैकुमुल मलाइ-काह।

हिंदी तर्जुमा: “रोज़ेदार तुम्हारे यहां इफ़्तार करें, नेक लोग तुम्हारा खाना खाएं और फ़रिश्ते तुम्हारे लिए रहमत व बख़्शिश की दुआ करें।” (सुनन अबू दाऊद: 3854)

इफ़्तार करने का सही और मुकम्मल सुन्नत तरीक़ा (Step by Step)

इफ़्तार सिर्फ़ भूख मिटाने का नाम नहीं है, बल्कि यह बंदगी का एक मुक़द्दस अमल है। सुन्नत के मुताबिक़ इफ़्तार करने के 5 अहम क़दम ये हैं:

  1. इफ़्तार में जल्दी करना: जैसे ही सूरज पूरी तरह डूब जाए और अज़ान का वक़्त हो जाए, फ़ौरन इफ़्तार करना सुन्नत है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “मेरी उम्मत के लोग तब तक भलाई पर रहेंगे जब तक वे इफ़्तार करने में जल्दी करेंगे।” (सहीह बुख़ारी: 1957)। बिना वजह देर करना यहूद व नसारा का तरीक़ा है।
  2. इफ़्तार से पहले तौबा व इस्तिग़फ़ार: अज़ान से 10-15 मिनट पहले दस्तरख़्वान पर बैठकर दुनियावी गपशप छोड़कर कसरत से इस्तिग़फ़ार (अस्तग़फ़िरुल्लाह) पढ़ना चाहिए और अपनी ज़रूरतों के लिए दुआ मांगनी चाहिए, क्योंकि यह क़बूलियत का वक़्त होता है।
  3. खजूर या सादे पानी से शुरुआत: रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) नमाज़-ए-मग़रिब से पहले ताज़ा खजूरों (रुतब) से इफ़्तार फ़रमाते थे, अगर ताज़ा खजूर न होतीं तो सूखी खजूर (छोहारे) से, और अगर वह भी न होतीं तो पानी के चंद घूंट से रोज़ा खोलते थे। (सुनन तिर्मिज़ी: 695)
  4. बिस्मिल्लाह और दुआ पढ़ना: पहला निवाला या घूंट लेते वक़्त बिस्मिल्लाह कहें और मसनून इफ़्तार दुआएं पढ़ें।
  5. फ़ौरन नमाज़-ए-मग़रिब की तैयारी: इफ़्तार में इतना ज़्यादा न खाएं कि जमाअत छूट जाए। सुन्नत तरीक़ा यह है कि खजूर और पानी या हल्का नाश्ता करके पहले वज़ू के साथ मग़रिब की फ़र्ज़ नमाज़ बा-जमाअत अदा की जाए, उसके बाद इत्मीनान से खाना खाया जाए।

शिया और सुन्नी इफ़्तार के समय व दुआ का अंतर (Shia Roza Kholne Ki Dua)

बहुत से लोग इंटरनेट पर “Shia roza kholne ki dua hindi” भी सर्च करते हैं। अहले सुन्नत (सुन्नी) और अहले तशय्यु (शिया) मकतब-ए-फ़िक्र में इफ़्तार के समय और दुआओं को लेकर थोड़ा सा अंतर है:

  • इफ़्तार का समय: सुन्नी फ़िक़्ह के मुताबिक़ जैसे ही सूरज की टिकिया पूरी तरह क्षितिज (Horizon) में डूब जाती है, इफ़्तार का वक़्त हो जाता है। वहीं शिया फ़िक़्ह (जाफ़री) के मुताबिक़ सूरज डूबने के बाद जब पूरब (East) की तरफ़ की लाली (हुमरह मश्रिक़िया) भी आसमान से ग़ायब हो जाती है, तब इफ़्तार किया जाता है (यह सुन्नी समय से लगभग 10 से 15 मिनट बाद होता है)।
  • शिया इफ़्तार दुआ: शिया हज़रात इफ़्तार के समय यह दुआ पढ़ते हैं: “अल्लाहुम्मा लका सुम्तु व’अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु व’अलैका तवक्कल्तु”। साथ ही सूरह अल-क़द्र की तिलावत करना भी उनके यहां मुस्तहब माना जाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions)

1. रोज़ा खोलने की सबसे अफ़ज़ल और सहीह दुआ कौन सी है?

हदीस की सनद के एतबार से सबसे अफ़ज़ल दुआ ‘ज़हबज़्ज़म-उ वब्तल्लतिल उरूक़ु व सबतल अजरु इन शा अल्लाह’ (सुनन अबू दाऊद: 2357) है। हालांकि ‘अल्लाहुम्मा लका सुम्तु व’अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु’ पढ़ना भी जायज़ और मुस्तहब है।

2. क्या खजूर से ही रोज़ा खोलना ज़रूरी है अगर खजूर न मिले तो क्या करें?

खजूर से रोज़ा खोलना सुन्नत है, फ़र्ज़ या वाजिब नहीं। अगर खजूर मौजूद न हो तो सादे साफ़ पानी से इफ़्तार करना नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत है। अगर पानी भी न हो तो किसी भी हलाल खाने-पीने की चीज़ से रोज़ा खोला जा सकता है।

3. अगर कोई इफ़्तार की दुआ पढ़ना भूल जाए और खा ले तो क्या रोज़ा होगा?

जी हाँ, रोज़ा बिल्कुल सही और मुकम्मल रहेगा। इफ़्तार की दुआ पढ़ना सुन्नत और मुस्तहब है, यह रोज़े की शर्त या फ़र्ज़ नहीं है। अगर कोई दुआ पढ़ना भूल जाए, तो जब याद आए तब पढ़ ले।

4. क्या इफ़्तार के लिए अज़ान पूरी होने का इंतज़ार करना ज़रूरी है?

नहीं, जैसे ही मुअज़्ज़िन अज़ान में ‘अल्लाहु अकबर’ कहे और सूरज डूबने का यक़ीन हो जाए, तुरंत इफ़्तार कर लेना चाहिए। अज़ान ख़त्म होने तक इंतज़ार करना सुन्नत के ख़िलाफ़ है, क्योंकि हदीस में इफ़्तार में जल्दी करने की ताकीद की गई है।

5. क्या इफ़्तार की दुआ दिल में पढ़ सकते हैं या ज़बान से बोलना ज़रूरी है?

दुआ को ज़बान से धीमी आवाज़ में बोलना बेहतर और सुन्नत है ताकि लफ़्ज़ों की अदायगी हो सके। हालांकि अगर कोई दिल में भी अल्लाह को याद करके दुआ के अल्फ़ाज़ दोहराए, तो भी सवाब मिल जाएगा।

Mariya Ansari
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Mariya Ansari

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