दुरुद-ए-इब्राहिमी (Durood-e-Ibrahimi / دُرُودِ اِبرَاہِیمِی) तमाम दुरूदों में सबसे अफ़ज़ल और आला तरीन दुरूद शरीफ़ है। यह वही मुक़द्दस दुरूद है जिसकी तालीम ख़ुद सरकार-ए-दोआलम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (ﷺ) ने अपने सहाबा-ए-किराम को अता फ़रमाई थी जब उन्होंने पूछा था कि हम आप पर किस तरह दुरूद भेजें। हर मुसलमान दिन-रात की पाँचों वक़्त की नमाज़ों के आख़िरी क़ायदे (Tashahhud) में इस बाबरकत दुरूद को पढ़ता है।
अगर आप Durood E Ibrahim in Hindi, इसका हिंदी और इंग्लिश उच्चारण (Pronunciation / Lyrics), अरबी इबारत (Arabic text with Tashkeel), मुकम्मल हिंदी तर्जुमा (Meaning / Translation), नमाज़ में पढ़ने का सही तरीक़ा और हदीस के रौशनी में इसकी अज़ीम फ़ज़ीलतें जानना चाहते हैं, तो यह मुकम्मल गाइड आपके लिए तैयार की गई है।
एक नज़र में: दुरूद-ए-इब्राहिमी की अहमियत
अफ़ज़ल तरीन मक़ाम: सहीह बुख़ारी (हदीस 3370) और सहीह मुस्लिम (हदीस 405) में हज़रत का’ब बिन उजरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि जब सहाबा ने पूछा कि ‘ऐ अल्लाह के रसूल! हम आप पर सलाम भेजना तो जान चुके, लेकिन आप पर दुरूद कैसे भेजें?’, तब नबी ﷺ ने दुरूद-ए-इब्राहिमी के ये बाबरकत अल्फ़ाज़ सिखाए।
दुरूद-ए-इब्राहिमी क्या है और इसे क्यों पढ़ा जाता है?
दुरूद शरीफ़ का असल मक़सद नबी-ए-करीम ﷺ और उनकी आल (औलाद व अहले बैत) के लिए अल्लाह तआला की बारगाह में ख़ास रहमतों और बरकतों की दुआ करना है। क़ुरआन करीम की सूरह अल-अहज़ाब में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का फ़रमान है:
إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
तर्जुमा: “बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी (ﷺ) पर रहमत भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद भेजो और ख़ूब सलाम भेजा करो।” (सूरह अल-अहज़ाब: 56)
चूँकि अल्लाह तआला ने ईमान वालों को दुरूद भेजने का हुक्म दिया, इसलिए जब सहाबा-ए-किराम ने पूछा कि सबसे बेहतरीन तरीक़ा क्या है, तो आप ﷺ ने दुरूद-ए-इब्राहिमी की तालीम फ़रमाई। इसलिए फ़ुक़हा-ए-किराम के नज़दीक यह तमाम दुरूदों की सरदार है।
मुकम्मल दुरूद-ए-इब्राहिमी: अरबी, हिंदी और इंग्लिश (दो हिस्सों में)
दुरूद-ए-इब्राहिमी के दो मुख्य हिस्से हैं: पहले हिस्से में अल्लाह तआला से रहमत (Salat) नाज़िल फ़रमाने की दुआ है, और दूसरे हिस्से में बरकत (Barakah) अता फ़रमाने की दुआ की गई है। यहाँ दोनों हिस्सों को साफ़ अरबी, सही हिंदी उच्चारण और इंग्लिश में पेश किया गया है:
पहला हिस्सा (Allāhumma Salli) – रहमत की दुआ
Part 1
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَّعَلٰى اٰلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلٰى اِبْرَاهِيْمَ وَعَلٰى اٰلِ اِبْرَاهِيْمَ اِنَّكَ حَمِيْدٌ مَّجِيْدٌ
हिंदी उच्चारण (Hindi Pronunciation / Lyrics):
अल्लाहुम्मा सल्लि ‘अला मुहम्मदिंव व-‘अला आलि मुहम्मदिन कमा सल्लैता ‘अला इब्राहीमा व-‘अला आलि इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद।
इंग्लिश उच्चारण (English Transliteration):
Allāhumma salli ‘alā Muhammadin wa ‘alā āli Muhammadin, kamā sallayta ‘alā Ibrāhīma wa ‘alā āli Ibrāhīma, innaka Hamīdum Majīd.
हिंदी तर्जुमा व अर्थ (Hindi Tarjuma / Meaning):
“ऐ अल्लाह! तू रहमत नाज़िल फ़रमा हज़रत मुहम्मद (ﷺ) पर और उनकी आल पर, जैसा कि तूने रहमत नाज़िल फ़रमाई हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) पर और उनकी आल पर। बेशक तू बड़ी तारीफ़ और बुज़ुर्गी वाला है।”
दूसरा हिस्सा (Allāhumma Bārik) – बरकत की दुआ
Part 2
اَللّٰهُمَّ بَارِكْ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَّعَلٰى اٰلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلٰى اِبْرَاهِيْمَ وَعَلٰى اٰلِ اِبْرَاهِيْمَ اِنَّكَ حَمِيْدٌ مَّجِيْدٌ
हिंदी उच्चारण (Hindi Pronunciation / Lyrics):
अल्लाहुम्मा बारिक ‘अला मुहम्मदिंव व-‘अला आलि मुहम्मदिन कमा बारक्ता ‘अला इब्राहीमा व-‘अला आलि इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद।
इंग्लिश उच्चारण (English Transliteration):
Allāhumma bārik ‘alā Muhammadin wa ‘alā āli Muhammadin, kamā bārakta ‘alā Ibrāhīma wa ‘alā āli Ibrāhīma, innaka Hamīdum Majīd.
हिंदी तर्जुमा व अर्थ (Hindi Tarjuma / Meaning):
“ऐ अल्लाह! तू बरकत नाज़िल फ़रमा हज़रत मुहम्मद (ﷺ) पर और उनकी आल पर, जैसा कि तूने बरकत नाज़िल फ़रमाई हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) पर और उनकी आल पर। बेशक तू बड़ी तारीफ़ और बुज़ुर्गी वाला है।”

नमाज़ में दुरूद-ए-इब्राहिमी कब और कैसे पढ़ी जाती है?
नमाज़ के अंदर दुरूद-ए-इब्राहिमी का मक़ाम बेहद अहम है। इस्लाम के फ़िक़्ही क़ानून के मुताबिक़:
- क़ादा-ए-अख़ीरा (आख़िरी बैठक): नमाज़ चाहे 2 रकात वाली हो (जैसे फ़ज्र, जुमा या नफ़्ल) या 3 या 4 रकात वाली (जैसे ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा), दुरूद-ए-इब्राहिमी हमेशा आख़िरी रकात के बाद क़ादे में पढ़ी जाती है।
- पढ़ने की तरतीब: सबसे पहले तशह्हुद यानी अत्तहियात हिंदी में पढ़ी जाती है, उसके बाद दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ी जाती है, और फिर कोई दुआ-ए-मासूरा पढ़ी जाती है।
- शरई हैसियत: हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ नमाज़ के आख़िरी क़ायदे में दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ना सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। अगर कोई शख़्स इसे भूल जाए तो नमाज़ नहीं टूटती और न ही सज्दा-ए-सहव वाजिब होता है, लेकिन जानबूझकर छोड़ना सवाब से महरूमी का बाइस है। शाफ़ई और हंबली फ़िक़्ह में इसे वाजिब/फ़र्ज़ माना गया है। नमाज़ के तमाम फ़राइज़ समझने के लिए हमारा गाइड नमाज़ के फ़राइज़ कितने हैं पढ़ें।
दुरूद-ए-इब्राहिमी के बाद पढ़ी जाने वाली दुआ-ए-मासूरा
दुरूद-ए-इब्राहिमी मुकम्मल करने के बाद सलाम फेरने से पहले नबी ﷺ से साबित कोई मसनून दुआ पढ़नी चाहिए। सबसे मशहूर दुआ-ए-मासूरा यह है:
اَللّٰهُمَّ إِنِّيْ ظَلَمْتُ نَفْسِيْ ظُلْمًا كَثِيْرًا وَّلاَ يَغْفِرُ الذُّنُوْبَ إِلاَّ أَنْتَ فَاغْفِرْ لِيْ مَغْفِرَةً مِّنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِيْ إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُوْرُ الرَّحِيْمُ
हिंदी उच्चारण: “अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तु नफ़्सी ज़ुल्मन कसीरा, वला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अंता, फ़ग़फ़िर ली मग़फ़िरतम-मिन ‘इंदिका वरहम्नी, इन्नका अंतल-ग़फ़ूरुर-रहीम।”
तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान पर बहुत ज़ुल्म किया है, और तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता। पस अपनी ख़ास बख़्शिश से मुझे माफ़ फ़रमा दे और मुझ पर रहम कर, बेशक तू ही बख़्शने वाला और निहायत रहम फ़रमाने वाला है।” (सहीह बुख़ारी: 834)
इसके अलावा यह दुआ भी पढ़ी जा सकती है: “रब्बिज’अलनी मुक़ीमस सलाति वमिन ज़ुर्रिय्यती, रब्बना व तक़ब्बल दुआ, रब्बनग़फ़िर ली वलि वालिदिय्या वलिल मुमिनीना यौमा यक़ूमुल हिसाब।” इसके बाद दोनों तरफ़ सलाम फेरकर नमाज़ मुकम्मल की जाती है (विस्तार के लिए देखें: नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा Step by Step)।

दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ने की अज़ीम फ़ज़ीलतें व बरकतें
अहादीस-ए-मुबारका में दुरूद शरीफ़ पढ़ने के बेशुमार फ़ज़ाइल बयान किए गए हैं। जब कोई मुसलमान दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ता है, तो उसे यह ख़ास इनाम हासिल होते हैं:
1. एक मर्तबा पढ़ने पर 10 रहमतों का नुज़ूल
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जो शख़्स मुझ पर एक बार दुरूद भेजता है, अल्लाह तआला उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है।” (सहीह मुस्लिम: 408)
2. 10 गुनाहों की माफ़ी और 10 दर्जात की बुलंदी
हज़रत अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया: “जो मुझ पर एक बार दुरूद भेजता है, अल्लाह तआला उस पर 10 रहमतें भेजता है, उसके 10 गुनाह मिटा देता है और उसके 10 दर्जे बुलंद फ़रमाता है।” (सुनन अन-नसाई: 1297)
3. क़यामत के रोज़ नबी ﷺ का सबसे क़रीब होना
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “क़यामत के दिन लोगों में सबसे ज़्यादा मेरे क़रीब वह शख़्स होगा जो मुझ पर सबसे ज़्यादा दुरूद पढ़ता है।” (जामिअ तिर्मिज़ी: 484)
4. दुआओं की क़बूलियत की ज़मानत
हज़रत उमर फारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं: “दुआ ज़मीन और आसमान के दरमियान रुकी रहती है और ऊपर नहीं उठती जब तक कि तुम अपने नबी ﷺ पर दुरूद न भेजो।” (जामिअ तिर्मिज़ी: 486)। इसलिए हर दुआ की शुरुआत और आख़िर में दुरूद शरीफ़ पढ़ना चाहिए।
5. जुमे के दिन कसरत से पढ़ने का हुक्म
हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: “जुमे का दिन दिनों का सरदार है, इस दिन मुझ पर कसरत से दुरूद भेजा करो क्योंकि तुम्हारा दुरूद मुझ पर पेश किया जाता है।” (सुनन अबू दाऊद: 1047)
इसे ‘दुरूद-ए-इब्राहिमी’ क्यों कहा जाता है?
इस दुरूद में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनकी आल का तज़किरा ख़ास तौर पर किया गया है (“कमा सल्लैता ‘अला इब्राहीमा…”)। इस्लामी उलमा ने इसके पीछे कई हिकमतें बयान की हैं:
- अबुल-अंबिया (पैग़ंबरों के वालिद): हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) तमाम नबियों के जद्द-ए-अमजद हैं और नबी-ए-अकरम ﷺ उन्हीं की नस्ल-ए-मुबारका से तशरीफ़ लाए।
- मक़ाम-ए-ख़िल्लत: अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को अपना ‘ख़लील’ (गहरा दोस्त) मुक़र्रर फ़रमाया था और रसूलुल्लाह ﷺ को अपना ‘हबीब’ बनाया।
- काबा शरीफ़ की तामीर और दुआ: जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने खाना-ए-काबा की तामीर की थी, तब उन्होंने दुआ माँगी थी: “ऐ हमारे रब! इनके दरमियान इन्हीं में से एक रसूल भेज” (सूरह अल-बक़रह: 129)। नबी ﷺ उसी दुआ का समरा हैं, इसलिए इस दुरूद में उनका शुक्रगुज़ारी भरा ज़िक्र शामिल किया गया।
दुरूद पढ़ने के आदाब और तलफ़्फ़ुज़ की सावधानियाँ
दुरूद शरीफ़ पढ़ते वक़्त कुछ अहम आदाब का ख़्याल रखना बेहद ज़रूरी है ताकि इबादत की रूह क़ायम रहे:
- तहारात व पाकीज़गी: नमाज़ में तो वुज़ू शर्त है ही, लेकिन नमाज़ के बाहर भी बा-वुज़ू होकर दुरूद पढ़ना अफ़ज़ल है (ग़ुस्ल के अहकाम के लिए पढ़ें: ग़ुस्ल की दुआ और सही तरीक़ा)।
- तलफ़्फ़ुज़ की सही अदायगी: अरबी लफ़्ज़ ‘सल्लि’ (صَلِّ) पर तशदीद और ज़ेर है, इसे ‘सल्ली’ (यानी खींचकर) नहीं पढ़ना चाहिए। इसी तरह ‘बारिक’ (بَارِكْ) पर ‘काफ़’ साकिन है।
- मुहब्बत व हुज़ूरी-ए-क़ल्ब: दुरूद को सिर्फ़ ज़बान से दोहराने के बजाय दिल में रसूलुल्लाह ﷺ की अज़मत और मुहब्बत को हाज़िर रखकर पढ़ना चाहिए।
मज़ीद अहम इस्लामिक दुआएं व नमाज़ गाइड
क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में अपनी रोज़मर्रा की इबादतों को दुरुस्त करने के लिए हमारे ये मुफ़ीद मजामीन भी ज़रूर मुलाहिज़ा फ़रमाएं:
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. दुरूद-ए-इब्राहिमी नमाज़ में किस रकात में पढ़ी जाती है?
दुरूद-ए-इब्राहिमी हमेशा नमाज़ के आख़िरी क़ायदे (क़ादा-ए-अख़ीरा) में अत्तहियात पढ़ने के फ़ौरन बाद पढ़ी जाती है। 2 रकात वाली नमाज़ में दूसरी रकात के बाद, और 3 या 4 रकात वाली नमाज़ में आख़िरी रकात के बाद पढ़ी जाती है। पहले क़ायदे (क़ादा-ए-ऊला) में फ़र्ज़ नमाज़ों में सिर्फ़ अत्तहियात पढ़ी जाती है।
2. क्या नमाज़ के अलावा भी दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ सकते हैं?
हाँ, बिल्कुल। दुरूद-ए-इब्राहिमी तमाम दुरूदों में सबसे अफ़ज़ल है। नमाज़ के अलावा भी आम औक़ात में, जुमे के दिन, महफ़िलों में और दुआ माँगते वक़्त इसे पढ़ना बेइंतिहा सवाब और बरकत का बाइस है।
3. अगर नमाज़ में दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ना भूल जाएं तो क्या नमाज़ हो जाएगी?
हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ नमाज़ में दुरूद-ए-इब्राहिमी पढ़ना सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। अगर कोई शख़्स भूलकर इसे छोड़ दे और सीधे दुआ या सलाम फेर दे, तो नमाज़ फ़ासिद (बातिल) नहीं होती और न ही सज्दा-ए-सहव करना पड़ता है, नमाज़ अदा हो जाती है। लेकिन जानबूझकर छोड़ना बेहद नापसंदीदा है।
4. दुरूद-ए-इब्राहिमी का हिंदी में तर्जुमा क्या है?
इसका तर्जुमा है: “ऐ अल्लाह! रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमा हज़रत मुहम्मद (ﷺ) पर और उनकी आल पर, जैसा कि तूने रहमत और बरकत नाज़िल फ़रमाई हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) पर और उनकी आल पर। बेशक तू बड़ी तारीफ़ और बुज़ुर्गी वाला है।”
5. सबसे अफ़ज़ल और सबसे छोटा दुरूद शरीफ़ कौन सा है?
सबूत और सनद के लिहाज़ से सबसे अफ़ज़ल दुरूद ‘दुरूद-ए-इब्राहिमी’ है जिसे नबी ﷺ ने ख़ुद सिखाया। जबकि ज़िक्र व तस्बीह के लिए सबसे छोटा दुरूद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ (صَلَّى اللّٰهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ) है।
6. दुरूद-ए-इब्राहिमी के बाद कौन सी दुआ पढ़नी चाहिए?
दुरूद के बाद दुआ-ए-मासूरा पढ़नी चाहिए, जैसे: ‘अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तु नफ़्सी ज़ुल्मन कसीरा…’ (सहीह बुख़ारी) या क़ुरआनी दुआ ‘रब्बिज’अलनी मुक़ीमस सलाति…’। इसके बाद दोनों तरफ़ सलाम फेरना चाहिए।