इस्लाम में इबादतों और दुआओं का मक़ाम बहुत बुलंद है, लेकिन इन सबमें दुरूद शरीफ (Darood Sharif / دُرُود شَرِيف) वह मुक़द्दस और रूहानी तोहफ़ा है, जिसे खुद अल्लाह तआला ने अपनी शान से नवाज़ा है। जब एक मोमिन अपने प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ पर दुरूद व सलाम भेजता है, तो वह न सिर्फ अपने दिल की अक़ीदत पेश करता है, बल्कि अल्लाह तआला की बेपनाह रहमतों और बख़्शिश का हक़दार बन जाता है।
⚡ Quick Answer: दुरूद शरीफ क्या है और इसका क्या मतलब है?
दुरूद शरीफ (Darood Sharif) एक मसनून दुआ है, जिसके ज़रिए एक मुसलमान अल्लाह तआला के हुज़ूर यह इल्तिजा करता है कि वह हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर ख़ास रहमतें, सलामती और बरकतें नाज़िल फ़रमाए।
सबसे अफ़ज़ल दुरूद: दुरूद-ए-इब्राहीमी (Durood-e-Ibrahimi), जो नमाज़ में पढ़ा जाता है।
सबसे छोटा दुरूद: “सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम” (صَلَّى اللّٰهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ)।
क़ुरआनी हुक्म: सूरह अल-अहज़ाब (33:56) में अल्लाह तआला ने तमाम ईमान वालों को नबी ﷺ पर कसरत से दुरूद व सलाम भेजने का साफ़ हुक्म फ़रमाया है।
1. पवित्र क़ुरआन में दुरूद शरीफ का हुक्म (Divine Commandment)
इस्लाम में नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज जैसी इबादतों का हुक्म सीधे बंदों को दिया गया है, लेकिन दुरूद शरीफ वह वाहिद और अनोखी इबादत है जिसमें खुद कायनात का मालिक अल्लाह तआला और उसके मुक़र्रब फ़रिश्ते भी शामिल हैं। पवित्र क़ुरआन के पारा 22, सूरह अल-अहज़ाब (आयत 56) में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फ़रमाता है:
إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
हिंदी तर्जुमा (Surah Al-Ahzab 33:56):
“बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी (मुहम्मद ﷺ) पर दुरूद (रहमत) भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद भेजो और खूब सलाम भेजा करो।”
इस आयत से साफ़ ज़ाहिर होता है कि नबी करीम ﷺ पर दुरूद भेजना हर मोमिन पर फ़र्ज़ व वाजिब है। जब भी नबी ﷺ का नाम मुबारक सुना जाए, तो ज़बान से दुरूद अदा करना मोहब्बत और ईमान का तकाज़ा है।
2. दुरूद-ए-इब्राहीमी: अरबी इबारत, हिंदी उच्चारण और तर्जुमा (Durood-e-Ibrahimi)
सहाबा-ए-किराम ने जब रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा कि हम आप पर दुरूद कैसे भेजें, तो आप ﷺ ने खुद यह मुबारक दुरूद सिखाया (सहीह बुख़ारी: 3370)। यही वजह है कि इसे तमाम दुरूदों का सरदार और सबसे अफ़ज़ल दुरूद माना जाता है, जिसे हम अपनी नमाज़ के आखिरी क़ायदे (तशह्हुद) में अत्तहियात के बाद पढ़ते हैं।
पहला हिस्सा (First Part)
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration):
“अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मदिन कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद।”
हिंदी अर्थ (Hindi Meaning):
“ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा हज़रत मुहम्मद ﷺ पर और हज़रत मुहम्मद ﷺ की आल (परिवार) पर, जिस तरह तूने रहमत नाज़िल फ़रमाई हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) पर और हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) की आल पर, बेशक तू तारीफ़ के लायक़ और बड़ी बुज़ुर्गी वाला है।”
दूसरा हिस्सा (Second Part)
اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration):
“अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मदिन कमा बारकता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा इन्नका हमीदुम मजीद।”
हिंदी अर्थ (Hindi Meaning):
“ऐ अल्लाह! बरकत नाज़िल फ़रमा हज़रत मुहम्मद ﷺ पर और हज़रत मुहम्मद ﷺ की आल पर, जिस तरह तूने बरकत नाज़िल फ़रमाई हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) पर और हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) की आल पर, बेशक तू तारीफ़ के लायक़ और बड़ी बुज़ुर्गी वाला है।”

3. सबसे छोटा दुरूद शरीफ (Chota Darood Sharif in Hindi)
रोज़मर्रा के कामकाज, दफ़्तर या सफ़र के दौरान अक्सर लोग छोटा दुरूद पढ़ना चाहते हैं। इस्लाम ने हमारे लिए बहुत ही आसान और मुकम्मल छोटे दुरूद अता किए हैं:
| दुरूद शरीफ (अरबी) | हिंदी उच्चारण | हिंदी अर्थ | पढ़ने का मौका |
|---|---|---|---|
| صَلَّى اللّٰهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ | सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम | अल्लाह उन पर अपनी रहमत और सलामती नाज़िल करे। | जब भी नबी ﷺ का नाम मुबारक सुना या बोला जाए। |
| اَللّٰهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ عَلٰى نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ | अल्लाहुम्मा सल्लि व सल्लिम अला नबिय्यिना मुहम्मद | ऐ अल्लाह! हमारे नबी मुहम्मद ﷺ पर रहमत व सलामती भेज। | सुबह और शाम 10-10 मर्तबा विर्द करने के लिए। |
| اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَّعَلٰى آلِهِ وَسَلِّمْ | अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आलिही व सल्लिम | ऐ अल्लाह! मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर रहमत व सलाम भेज। | चलते-फिरते कसरत से तस्बीह पढ़ने के लिए। |
| جَزَى اللّٰهُ عَنَّا مُحَمَّدًا مَّا هُوَ أَهْلُهُ | जज़ल्लाहु अन्ना मुहम्मदम मा हुवा अहलुह | अल्लाह हमारी तरफ़ से मुहम्मद ﷺ को वह जज़ा दे जिसके वे हक़दार हैं। | हदीस के मुताबिक इसके सवाब से 70 फ़रिश्ते 1000 दिन तक थक जाते हैं। |
4. दुरूद शरीफ पढ़ने की अज़ीम फ़ज़ीलत व बरकतें (Hadith References)
रसूलुल्लाह ﷺ पर दुरूद शरीफ भेजने की जो अज़ीम फ़ज़ीलतें सहीह अहादीस में आई हैं, वे हर मुसलमान के ईमान को ताज़ा कर देती हैं:
1. एक दुरूद पर 10 रहमतें, 10 गुनाह माफ़ और 10 दर्जे बुलंद:
— सहीह मुस्लिम: 408; जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 484
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जो शख्स मुझ पर एक मर्तबा दुरूद भेजता है, अल्लाह तआला उस पर 10 रहमतें नाज़िल फ़रमाता है, उसके 10 गुनाह माफ़ कर देता है और उसके 10 दर्जात बुलंद फ़रमाता है।”
2. क़यामत के दिन नबी करीम ﷺ का सबसे क़रीबी मक़ाम:
— जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 484 (हसन सहीह)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“क़यामत के दिन लोगों में मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब वह शख्स होगा, जिसने दुनिया में मुझ पर सबसे ज़्यादा दुरूद पढ़ा होगा।”
3. तमाम परेशानियों और ग़मों से नजात:
— जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 2457 (हसन सहीह)
हज़रत उबई बिन कअब (रज़ि.) ने नबी करीम ﷺ से अर्ज़ किया: ‘या रसूलुल्लाह! मैं आप पर बहुत दुरूद पढ़ता हूँ, मैं अपनी दुआ में से कितना वक़्त दुरूद के लिए रखूं?’ जब सहाबी ने कहा कि ‘मैं अपनी सारी दुआओं का वक़्त आप पर दुरूद पढ़ने में लगा दूंगा’, तो प्यारे नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“तब तो तुम्हारी तमाम परेशानियां और चिंताएं दूर कर दी जाएंगी और तुम्हारे तमाम गुनाह बख़्श दिए जाएंगे।”
4. दुआओं की क़ुबूलियत की ज़मानत:
— जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 486
हज़रत उमर बिन खत्ताब (रज़ि.) फ़रमाते हैं:
“दुआ ज़मीन और आसमान के दरमियान तब तक रुकी रहती है और उसका कोई हिस्सा ऊपर नहीं जाता, जब तक कि तुम अपने नबी ﷺ पर दुरूद न भेज लो।”
5. हक़ीक़ी कंजूस (बख़ील) कौन है?:
— जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 3546
हज़रत अली (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“असली कंजूस वह शख्स है जिसके सामने मेरा ज़िक्र किया जाए और वह मुझ पर दुरूद न भेजे।”
5. जुमे के दिन दुरूद शरीफ की ख़ास अहमियत (Friday Virtues)
हफ़्ते के तमाम दिनों में जुमे का दिन सबसे अफ़ज़ल है। नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: “जुमे के दिन मुझ पर कसरत से दुरूद भेजा करो, क्योंकि तुम्हारा दुरूद मुझ पर पेश किया जाता है।” (सुनन अबू दाऊद: 1047)। जुमे के दिन कम से कम 100 या 300 मर्तबा दुरूद शरीफ पढ़ने की आदत हर मुसलमान को बनानी चाहिए।
6. दुरूद शरीफ पढ़ने के आदाब और सही तरीक़ा
नबी पाक ﷺ पर दुरूद भेजते समय इन इस्लामी आदाब का ख़्याल रखना चाहिए:
- बा-वुज़ू होना: दुरूद शरीफ पढ़ना अज़कार और इबादत का हिस्सा है। बा-वुज़ू होकर क़िब्ला रुख़ बैठकर पढ़ना सबसे अफ़ज़ल है, हालांकि बे-वुज़ू भी ज़बान से दुरूद पढ़ा जा सकता है।
- अदब और तवज्जोह: दुरूद को जल्दबाज़ी में अल्फ़ाज़ चबाकर न पढ़ें, बल्कि हर लफ़्ज़ को साफ़ और दिल में हुज़ूर ﷺ की अज़मत रखकर पढ़ें।
- दुआ के शुरू और आखिर में: जब भी कोई दुआ मांगें, जैसे मसनून दुआएं, ख़ासकर अज़ान के बाद की दुआ या अपनी हाजत की दुआ, तो शुरू और आखिर में दुरूद शरीफ ज़रूर पढ़ें, इससे दुआ की क़ुबूलियत यक़ीनी हो जाती है।
- एहसानमंदी की नियत: हमेशा अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसा) और नबी करीम ﷺ के एहसानात के शुक्राने के तौर पर जैसे हम किसी का शुक्रिया अदा करने के लिए जज़ाकल्लाहु खैरा कहते हैं, वैसे ही प्यारे नबी ﷺ के लिए दिल की गहराइयों से दुरूद पेश करें।
7. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (People Also Ask FAQ)
प्र. सबसे अच्छा दरूद शरीफ कौन सा है?
सबसे अफज़ल और आला दरूद शरीफ ‘दुरूद-ए-इब्राहीमी’ (Durood-e-Ibrahimi) है। यह वही मुबारक दुरूद है जिसे खुद रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने सहाबा को सिखाया था (सहीह बुख़ारी: 3370) और जिसे हर मुसलमान अपनी पंजवक्ता नमाज़ के आखिरी कायदे (तशह्हुद) में पढ़ता है।
प्र. छोटा दुरूद शरीफ क्या है?
सबसे छोटा और आसान दुरूद शरीफ ‘صَلَّى اللّٰهُ عَلَيْهِ وَसَلَّمَ’ (उच्चारण: सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम – Sallallahu Alayhi Wasallam) है। इसके अलावा ‘اَللّٰهُمَّ صَلِّ وَसَلِّمْ عَلٰى نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ’ (अल्लाहुम्मा सल्लि व सल्लिम अला नबिय्यिना मुहम्मद) भी एक बहुत ही जामेअ और छोटा दुरूद है जिसे सुबह-शाम 10-10 बार पढ़ना सुन्नत है।
प्र. दरूदे पाक में क्या पढ़ा जाता है?
दरूदे पाक में अल्लाह तआला के हुज़ूर यह इल्तिजा और दुआ की जाती है कि वह हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ और उनकी आल (परिवार व औलाद) पर अपनी ख़ास रहमतें, बरकतें और सलामती नाज़िल फ़रमाए, जिस तरह उसने हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) और उनकी आल पर रहमतें नाज़िल फ़रमाईं।
प्र. नबी पर दरूद कैसे भेजें?
नबी करीम ﷺ पर दुरूद भेजने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा यह है कि दिल में रसूलुल्लाह ﷺ की सच्ची मोहब्बत और अदब रखकर ज़बान से दुरूद शरीफ के मुबारक अलफ़ाज़ दोहराए जाएं। इसके लिए बा-वुज़ू होना अफ़ज़ल है, लेकिन चलते-फिरते, काम करते हुए या बिना वुज़ू के भी ज़बान से दुरूद पाक पढ़ा जा सकता है।
प्र. दिन में कितनी बार दरूद शरीफ पढ़ना चाहिए?
हदीस शरीफ़ (जामिअ अत-तिर्मिज़ी: 2457) के मुताबिक जब हज़रत उबई बिन कअब (रज़ि.) ने अर्ज़ किया कि क्या मैं अपना सारा वक़्त दुरूद पढ़ने में लगा दूं, तो आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘तब तुम्हारी तमाम फिक्रें और परेशानियां दूर कर दी जाएंगी और तुम्हारे गुनाह बख़्श दिए जाएंगे।’ उलेमा रोज़ाना कम से कम 100 बार दुरूद पढ़ने की ताकीद करते हैं, ख़ासकर जुमे के दिन कसरत से दुरूद पढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
दुरूद शरीफ (Darood Sharif) वह मुबारक तोहफ़ा है जो मोमिन को अपने रब की रहमतों का हक़दार बनाता है और रसूलुल्लाह ﷺ की मोहब्बत का सबसे पाक ज़रिया है। ज़िंदगी की परेशानियां हों, रिज़्क़ की तंगी हो, या आख़िरत की फ़िक्र—दुरूद पाक का विर्द हर बंद ताले की चाबी है। आज से ही अहद करें कि अपनी ज़बान को हमेशा दुरूद शरीफ की महक से तर रखेंगे। अल्लाह तआला हम सबको कसरत से दुरूद व सलाम भेजने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन!