इस्लाम में ईमान के बाद सबसे अज़ीम और बुनियादी रुकन नमाज़ है। हर मुसलमान पर दिन-रात में पाँच वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की गई है। लेकिन नमाज़ की क़बूलियत और उसके सही होने के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि नमाज़ के फ़राइज़ कितने हैं (Namaz Ke Faraiz Kitne Hain) और वे कौन-कौन से हैं। शरीअत की रोशनी में अगर नमाज़ का एक भी फ़र्ज़ छूट जाए, तो पूरी नमाज़ टूट (बातिल हो) जाती है और उसे दोबारा पढ़ना लाज़िम होता है।
फ़िक़्ह-ए-इस्लामी (ख़ास तौर पर फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी) के अनुसार नमाज़ के कुल 14 फ़राइज़ होते हैं। इन्हें दो बुनियादी हिस्सों में बांटा गया है: पहले 7 फ़र्ज़ नमाज़ से बाहर (जिन्हें ‘शर्तें’ या शराइत-ए-नमाज़ कहा जाता है) और दूसरे 7 फ़र्ज़ नमाज़ के अंदर (जिन्हें ‘अरकान’ या अरकान-ए-नमाज़ कहा जाता है)। इस मुकम्मल गाइड में हम इन सभी 14 फ़राइज़, उनके शरई अहकाम और अंतर को आसान हिंदी में समझेंगे।
फ़र्ज़ का शरीअत में दर्जा
‘फ़र्ज़’ (Fard) उस हुक्म को कहते हैं जो क़ुरआन मजीद या मुतवातिर हदीस से क़तई (ठोस) तौर पर साबित हो। नमाज़ में फ़र्ज़ की हैसियत रीढ़ की हड्डी जैसी है। अगर कोई शख़्स भूलकर भी कोई फ़र्ज़ छोड़ दे, तो सज्दा-ए-सहव करने से भी नमाज़ नहीं होती, बल्कि पूरी नमाज़ नए सिरे से दोबारा पढ़ना फ़र्ज़ होता है।
नमाज़ के 14 फ़राइज़ की संक्षिप्त सूची (Overview)
आसानी से याद रखने के लिए नमाज़ के 14 फ़राइज़ को इस तरह याद किया जाता है:
| भाग 1: नमाज़ से बाहर के 7 फ़र्ज़ (शर्तें) | भाग 2: नमाज़ के अंदर के 7 फ़र्ज़ (अरकान) |
|---|---|
| 1. बदन का पाक होना (तहारत) | 1. तकबीर-ए-तहरीमा (अल्लाहु अकबर कहना) |
| 2. कपड़ों का पाक होना (तहारत-ए-सौब) | 2. क़ियाम (सीधा खड़े होना) |
| 3. जगह का पाक होना (तहारत-ए-मकान) | 3. क़िरअत (क़ुरआन की तिलावत करना) |
| 4. सतर ढांकना (सत्र-ए-औरत) | 4. रुकूअ (झुकना) |
| 5. नमाज़ का वक़्त होना | 5. सजूद (हर रकात में दो सज्दे करना) |
| 6. क़िबला-रुख़ होना (इस्तक़बाल-ए-क़िबला) | 6. क़ादा-ए-अख़ीरा (आख़िरी बैठक) |
| 7. नियत करना (दिल का इरादा) | 7. ख़ुरूज-ए-बिसुनइही (सलाम फेरना) |

नमाज़ से बाहर के 7 फ़र्ज़ (शराइत-ए-नमाज़) का विस्तार
ये वे ज़रूरी शर्तें हैं जो नमाज़ शुरू करने से पहले पूरी होनी चाहिए। अगर इनमें से एक भी शर्त न पाई जाए, तो नमाज़ शुरू ही नहीं होती:
1. बदन का पाक होना (Taharat-e-Badan)
नमाज़ी का बदन हर तरह की नजासत से पाक होना चाहिए। इसमें ‘हदस-ए-असग़र’ (बे-वुज़ू होना) से वुज़ू के ज़रिए पाकी हासिल करना और ‘हदस-ए-अकबर’ (जनाबत व नापाकी) की हालत में ग़ुस्ल के 3 फ़र्ज़ अदा करके पाक होना शामिल है।
2. कपड़ों का पाक होना (Taharat-e-Saub)
जो कपड़े पहनकर नमाज़ अदा की जा रही है, वे हर क़िस्म की नजासत (पेशाब, ख़ून या गन्दगी) से पाक-साफ़ होने चाहिए।
3. जगह का पाक होना (Taharat-e-Makaan)
जिस जगह पर नमाज़ी खड़ा होता है और जहाँ सज्दा करता है, उस ज़मीन या मुसल्ले (जा-ए-नमाज़) का पाक होना फ़र्ज़ है।
4. सतर ढांकना (Satr-e-Awrat)
शरीअत के मुताबिक़ बदन के जिन हिस्सों को छुपाना लाज़िम है, उन्हें छुपाना फ़र्ज़ है। मर्दों के लिए: नाफ़ से लेकर घुटनों के नीचे तक। औरतों के लिए: चेहरे, दोनों हथेलियों और दोनों पांवों के पंजों के अलावा पूरा जिस्म (सिर के बाल सहित) छुपाना फ़र्ज़ है।
5. नमाज़ का वक़्त होना (Waqt)
जिस नमाज़ को पढ़ा जा रहा है, उसका तयशुदा शरई वक़्त दाख़िल हो चुका हो। वक़्त शुरू होने से पहले पढ़ी गई नमाज़ अदा नहीं होती, और वक़्त ख़त्म होने के बाद वह क़ज़ा हो जाती है।
6. क़िबला-रुख़ होना (Istiqbal-e-Qibla)
नमाज़ के दौरान काबा शरीफ़ (ख़ाना-ए-काबा, मक्का मुकर्रमा) की तरफ़ मुँह और सीना करके खड़ा होना फ़र्ज़ है।
7. नियत करना (Niyat)
दिल में इस बात का पुख़्ता इरादा होना कि मैं फ़लां वक़्त की नमाज़ (जैसे आज की ज़ुहर या ईशा) अल्लाह के वास्ते अदा कर रहा हूँ। जैसा कि हमने ईशा की नमाज़ की नियत में तफ़सील से बताया है, ज़बान से कहना मुस्तहब है, लेकिन दिल का इरादा फ़र्ज़ है।
नमाज़ के अंदर के 7 फ़र्ज़ (अरकान-ए-नमाज़) का विस्तार
ये वे आमाल हैं जो नमाज़ की हक़ीक़त और उसके अरकान कहलाते हैं। नमाज़ के दौरान इनमें से किसी एक का छूट जाना नमाज़ को ख़त्म कर देता है:
1. तकबीर-ए-तहरीमा (Takbeer-e-Tehreema)
नमाज़ शुरू करते वक़्त ज़बान से ‘अल्लाहु अकबर’ कहना। इसे तहरीमा इसलिए कहते हैं क्योंकि इसके कहते ही दुनिया की बातचीत, खाना-पीना और चलना-फिरना हराम हो जाता है।
2. क़ियाम (Qiyam – खड़ा होना)
फ़र्ज़ और वाजिब नमाज़ों में ताक़त रहते हुए सीधा खड़े होकर नमाज़ पढ़ना फ़र्ज़ है। बिना किसी शरई बीमारी या मजबूरी के बैठकर फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं है।
3. क़िरअत (Qirat – क़ुरआन पढ़ना)
नमाज़ में क़ुरआन मजीद की कम से कम एक बड़ी आयत या तीन छोटी आयतें पढ़ना फ़र्ज़ है। सूरह फ़ातिहा पढ़ना वाजिब है और उसके साथ नमाज़ की छोटी सूरह मिलाना सुन्नत व वाजिब के तहत आता है।
4. रुकूअ (Ruku – झुकना)
इतना झुकना कि दोनों हाथ घुटनों तक पहुँच जाएं और पीठ सीधी हो जाए। रुकूअ में कम से कम एक मर्तबा तस्बीह की मिक़दार ठहरना ज़रूरी है।
5. सजूद (Sujood – दो सज्दे करना)
हर रकात में दो मर्तबा सज्दा करना फ़र्ज़ है। सज्दे में पेशानी (माथा) और नाक की हड्डी का ज़मीन पर जमना फ़र्ज़ व वाजिब है।
6. क़ादा-ए-अख़ीरा (Qa’da-e-Akheera – आख़िरी बैठक)
नमाज़ की आख़िरी रकात मुकम्मल करने के बाद तशह्हुद यानी अत्तहिय्यात पूरा पढ़ने की मिक़दार तक बैठना फ़र्ज़ है।
7. ख़ुरूज-ए-बिसुनइही (Khurooj-e-Bisun’ihi – नमाज़ ख़त्म करना)
नमाज़ के तमाम अरकान मुकम्मल करने के बाद सलाम फेरकर या किसी ऐसे अमल से नमाज़ से बाहर आना जो नमाज़ को पूरा करता हो। (जमहूर उलेमा के नज़दीक दोनों तरफ़ अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह कहना वाजिब है)।

नमाज़ में फ़र्ज़ छूट जाने का शरई हुक्म
अक्सर लोग इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि अगर नमाज़ में कोई ग़लती हो जाए तो क्या सज्दा-ए-सहव से काम चल जाएगा? यहाँ फ़र्ज़, वाजिब और सुन्नत का शरई फ़र्क़ समझना बेहद ज़रूरी है:
- फ़र्ज़ छूटने पर: अगर इन 14 फ़र्ज़ों में से कोई एक फ़र्ज़ भी छूट गया—चाहे भूलकर छूटा हो या जानबूझकर—तो नमाज़ बिल्कुल नहीं होगी (बातिल हो जाएगी)। सज्दा-ए-सहव करने से भी फ़र्ज़ की भरपाई नहीं हो सकती। उस नमाज़ को शुरू से नए सिरे से दोबारा पढ़ना फ़र्ज़ है।
- वाजिब छूटने पर: अगर नमाज़ का कोई वाजिब (जैसे सूरह फ़ातिहा पढ़ना, पहला क़ादा, या दुआ-ए-क़ुनूत) भूलकर छूट जाए, तो आख़िर में सज्दा-ए-सहव (दो सज्दे) करने से नमाज़ सही हो जाती है। लेकिन अगर जानबूझकर वाजिब छोड़ा जाए, तो नमाज़ लौटाना (दोहराना) वाजिब होता है।
- सुन्नत छूटने पर: अगर कोई सुन्नत छूट जाए, तो नमाज़ नहीं टूटती और न ही सज्दा-ए-सहव की ज़रूरत होती है, लेकिन सवाब में कमी आती है।
13 फ़र्ज़ और 14 फ़र्ज़ में क्या फ़र्क़ है?
कई इस्लामिक किताबों में नमाज़ के कुल 13 फ़र्ज़ लिखे होते हैं और कई में 14 फ़र्ज़। इसकी वजह यह है कि कुछ फ़ुक़हा ‘तकबीर-ए-तहरीमा’ को नमाज़ की शर्त (बाहर का फ़र्ज़) मानते हैं और ‘ख़ुरूज-ए-बिसुनइही’ को वाजिब क़रार देते हैं, जिससे कुल गिनती 13 हो जाती है। जबकि अन्य फ़ुक़हा दोनों को अलग-अलग गिनकर कुल 14 फ़राइज़ बयान करते हैं। हक़ीक़त में दोनों का मक़सद एक ही है और तमाम अरकान का अदा करना लाज़िम है।
नमाज़ के फ़राइज़ से मुताल्लिक़ ज़रूरी मसायल
- कपड़ों में नजासत की मिक़दार: अगर कपड़े या बदन पर एक दिरहम (हथेली के फैलाव) से ज़्यादा नजासत-ए-ग़लीज़ा लगी हो, तो नमाज़ बिल्कुल नहीं होगी। उसे धोकर पाक करना फ़र्ज़ है।
- सतर खुलने का मसला: अगर नमाज़ की हालत में किसी आज़ा (अंग) का चौथाई हिस्सा एक रुकन (तीन बार सुब्हानअल्लाह कहने) की मिक़दार खुला रह जाए, तो नमाज़ फ़ासिद (टूट) हो जाती है।
- क़ियाम न कर पाने पर: अगर कोई मरीज़ इतना बीमार हो कि खड़ा नहीं हो सकता या खड़े होने से बीमारी बढ़ जाएगी, तो शरीअत उसे बैठकर या इशारे से नमाज़ पढ़ने की छूट देती है।
- जनाज़ा की नमाज़ के फ़र्ज़: जैसा कि हमारे जनाज़ा की नमाज़ का तरीका गाइड में बताया गया है, जनाज़ा की नमाज़ में रुकूअ व सज्दा नहीं होता, बल्कि सिर्फ़ दो फ़र्ज़ होते हैं: 4 मर्तबा तकबीर कहना और क़ियाम (खड़े होना)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. नमाज़ के कुल कितने फ़राइज़ होते हैं?
नमाज़ के कुल 14 फ़राइज़ होते हैं: 7 फ़र्ज़ नमाज़ से बाहर (शर्तें) और 7 फ़र्ज़ नमाज़ के अंदर (अरकान)।
2. नमाज़ से बाहर के कितने फ़र्ज़ हैं और कौन से हैं?
नमाज़ से बाहर के 7 फ़र्ज़ (शर्तें) हैं: बदन का पाक होना, कपड़ों का पाक होना, जगह का पाक होना, सतर ढांकना, नमाज़ का वक़्त होना, क़िबला-रुख़ होना और दिल से नियत करना।
3. नमाज़ के अंदर के 7 फ़र्ज़ (अरकान) कौन-कौन से हैं?
नमाज़ के अंदर के 7 फ़र्ज़ हैं: तकबीर-ए-तहरीमा कहना, क़ियाम (खड़े होना), क़िरअत (क़ुरआन पढ़ना), रुकूअ करना, सजूद (दो सज्दे करना), क़ादा-ए-अख़ीरा में बैठना और ख़ुरूज-ए-बिसुनइही (सलाम फेरना)।
4. अगर नमाज़ में कोई फ़र्ज़ छूट जाए तो क्या सज्दा-ए-सहव से नमाज़ हो जाएगी?
नहीं, फ़र्ज़ छूटने पर नमाज़ पूरी तरह टूट जाती है। सज्दा-ए-सहव केवल वाजिब भूलने पर किया जाता है। फ़र्ज़ छूटने पर नमाज़ को शुरू से दोबारा पढ़ना लाज़िम है।
5. क्या तकबीर-ए-तहरीमा नमाज़ की शर्त है या रुकन?
जमहूर फ़ुक़हा के नज़दीक तकबीर-ए-तहरीमा शर्त और रुकन दोनों के बीच की कड़ी है, इसीलिए कुछ उलमा इसे बाहर के फ़राइज़ में गिनते हैं और कुछ अंदर के अरकान में। दोनों ही सूरतों में इसका अदा करना फ़र्ज़-ए-ऐन है।