इस्लामी इतिहास का सबसे अनोखा, आलौकिक और मोजिज़ाती (चमत्कारी) वाक़या ‘वाक़या-ए-मेअराज’ (Waqia E Meraj In Hindi) है। यह वह मुकद्दस रात थी जब रब्बुल आलमीन ने अपने प्यारे हबीब, सरवरे कायनात हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को ज़मीन से आसमानों, सिदरतुल मुंतहा और अर्श-ए-बरीं की सैर कराकर अपनी दीदार व क़ुर्बत का अज़ीम शर्फ़ अता फ़रमाया।
इस मुकद्दस सफ़र को दो हिस्सों में बयान किया जाता है: पहला हिस्सा ‘इसरा’ (Isra) कहलाता है, जिसमें हुज़ूर ﷺ मस्जिद-ए-हराम (मक्का) से मस्जिद-ए-अक़्सा (बैतुल मुक़द्दस, फ़िलिस्तीन) तक तशरीफ़ ले गए। दूसरा हिस्सा ‘मेअराज’ (Miraj) कहलाता है, जिसमें आप सात आसमानों को पार करते हुए सिदरतुल मुंतहा से आगे अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बारगाह में हाज़िर हुए। यह पूरा सफ़र रात के एक मुख़्तसर से हिस्से में तय हुआ।
क़ुरआन मजीद में इसरा व मेअराज का ज़िक्र
سُبْحَانَ الَّذِي أَسْرَىٰ بِعَبْدِهِ لَيْلًا مِّنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِي بَارَكْنَا حَوْلَهُ
तर्जुमा (सूरह अल-इसरा, आयत 1): “पाक है वह ज़ात जो ले गई अपने बन्दे (मुहम्मद ﷺ) को रात ही रात में मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक़्सा तक, जिसके गिर्द हमने बरकतें रखी हैं, ताकि हम उन्हें अपनी निशानियाँ दिखाएँ। बेशक वही सब कुछ सुनने और देखने वाला है।”
मेअराज की पृष्ठभूमि: आमुल हुज़्न (ग़म का साल) और ताइफ़ की आज़माइश
नुबुव्वत के 10वें साल नबी-ए-करीम ﷺ पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। आपके मुशफ़िक़ चचा अबू तालिब और आपकी वफ़ादार ज़ौजा हज़रत ख़दीजातुल कुबरा (रज़ि.) का विसाल हो गया। इसे ‘आमुल हुज़्न’ (ग़म का साल) कहा गया। इसी दौरान जब आप दावत-ए-हक़ लेकर ताइफ़ गए, तो वहाँ के सरकशों ने पत्थरों से हुज़ूर ﷺ को लहूलुहान कर दिया।
जब ज़मीन वालों ने हर तरफ़ से बेरुखी और ज़ुल्म की इंतिहा कर दी, तब अल्लाह तआला ने अपने हबीब को आसमानों का मेहमान बनाने का फ़ैसला फ़रमाया ताकि आप जान लें कि अगर ज़मीन वाले मुख़ालिफ़ हैं तो तमाम कायनात का मालिक आपका हमदम और पुश्तपनाह है। रजब की 27वीं शब को यह अज़ीमुश्शान वाक़या पेश आया।
पहला पड़ाव: मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक़्सा (अल-इसरा)
हज़रत जिब्रील (अलै.) एक नूरानी सवारी ‘बुराक़’ (Buraq) लेकर हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए। बुराक़ की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि जहाँ तक नज़र जाती, उसका अगला क़दम वहीं पड़ता था। हुज़ूर ﷺ बुराक़ पर सवार होकर बैतुल मुक़द्दस (मस्जिद-ए-अक़्सा) पहुंचे।
मस्जिद-ए-अक़्सा में तमाम नबियों और रसूलों (अम्बिया-ए-किराम) की रूहें मौजूद थीं। हज़रत जिब्रील (अलै.) ने हुज़ूर ﷺ का दस्त-ए-मुबारक पकड़कर मुसल्ले पर आगे बढ़ाया। हुज़ूर ﷺ ने दो रकअत नमाज़ में तमाम अम्बिया की इमामत फ़रमाई, और इसी दिन आपका लक़ब ‘इमामुल अम्बिया’ साबित हुआ।
दूसरा पड़ाव: सात आसमानों का सफ़र और अम्बिया-ए-किराम से मुलाक़ात
बैतुल मुक़द्दस से आसमानों की तरफ सफ़र शुरू हुआ। हर आसमान पर फ़रिश्तों ने इस्तक़बाल किया और मुबारक़ हस्तियों से मुलाक़ात हुई:
| आसमान (मंज़िल) | मुलाक़ात किस पैग़म्बर से हुई | अहम् विवरण |
|---|---|---|
| पहला आसमान | हज़रत आदम (अलै.) | इंसानियत के बाप, अपनी नेक औलाद को देखकर मुस्कुराते और गुनहगारों पर रोते हुए। |
| दूसरा आसमान | हज़रत याह्या (अलै.) व हज़रत ईसा (अलै.) | दोनों ख़ालाज़ाद भाई, नबी ﷺ का गर्मजोशी से ख़ैर-मक़दम किया। |
| तीसरा आसमान | हज़रत यूसुफ़ (अलै.) | जिन्हें अल्लाह ने कायनात के हुस्न का आधा हिस्सा अता फ़रमाया था। |
| चौथा आसमान | हज़रत इदरीस (अलै.) | जिन्हें अल्लाह ने बुलंद मक़ाम पर उठाया था। |
| पाँचवाँ आसमान | हज़रत हारून (अलै.) | हज़रत मूसा (अलै.) के भाई और अपनी क़ौम में बेहद महबूब पैग़म्बर। |
| छठा आसमान | हज़रत मूसा (अलै.) | कलीमुल्लाह, उम्मत-ए-मुहम्मदिया की बरकत देखकर रश्क व रहमत की दुआ की। |
| सातवाँ आसमान | हज़रत इब्राहिम (अलै.) | खलीलुल्लाह, बैतुल मामूर से टेक लगाए हुए जहाँ रोज़ाना 70,000 फ़रिश्ते तवाफ़ करते हैं। |
सिदरतुल मुंतहा और दीदार-ए-इलाही की सरहद
सातवें आसमान के बाद रसूलुल्लाह ﷺ ‘सिदरतुल मुंतहा’ पहुंचे। यह वह सरहद है जहाँ मख़लूक़ात का इल्म ख़त्म हो जाता है। यहाँ हज़रत जिब्रील (अलै.) रुक गए और अर्ज़ किया: “या रसूलुल्लाह! अगर मैं यहाँ से एक बाल बराबर भी आगे बढ़ा, तो अल्लाह के अनवार व तजल्लियात मेरे परों को जलाकर ख़ाक कर देंगे।”
इसके बाद हुज़ूर ﷺ तन्हा आगे बढ़े और अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के मुक़द्दस क़ुर्ब में पहुंचे जहाँ ‘क़ाबा क़ौसैनि अव अदना’ (दो कमानों या उससे भी कम फ़ासला) रह गया। हुज़ूर ﷺ ने अपने परवरदिगार से कलाम फ़रमाया और वह सब मुशाहिदा किया जो किसी आँख ने न देखा और न किसी दिल में जिसका गुमान गुज़रा।
शब-ए-मेअराज के तीन अज़ीम तोहफ़े (Divine Gifts)
मेअराज की रात अल्लाह तआला ने उम्मत-ए-मुहम्मदिया के लिए तीन बड़े तोहफ़े अता फ़रमाए:
- 5 वक़्त की नमाज़: शुरुआत में 50 वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ हुई थीं। हज़रत मूसा (अलै.) के मशवरे पर हुज़ूर ﷺ ने बारगाह-ए-इलाही में अर्ज़ करके इसे 5 वक़्त कराया। अल्लाह ने फ़रमाया: “ऐ मुहम्मद! अमल 5 नमाज़ों का रहेगा, लेकिन सवाब पूरे 50 नमाज़ों का ही दिया जाएगा।” इसी वजह से नमाज़ को मोमिन की मेअराज कहा गया है।
- सूरह अल-बक़रह की आख़िरी आयतें: सूरह बक़रह की आख़िरी दो आयतें (आमनर-रसूलु…) जो सीधे अर्श के ख़ज़ाने से अता की गईं।
- शिरक न करने वालों की मग़फ़िरत: जो शख़्स अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं ठहराएगा, उसके कबीरा गुनाहों की बख़्शिश का मुज़दा सुनाया गया।
हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) और ‘सिद्दीक़’ का लक़ब
सुबह जब हुज़ूर ﷺ ने अहले-मक्का को इस मुकद्दस सफ़र की ख़बर दी, तो मुशरिक़ीन ने मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया कि जो सफ़र महीनों में तय होता है वह एक रात में कैसे मुमकिन है! मुशरिक़ीन दौड़कर हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) के पास गए और कहा कि तुम्हारा साथी कहता है कि वह रात में बैतुल मुक़द्दस और आसमानों की सैर करके लौट आया।
हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) ने एक पल भी सोचे बिना फ़रमाया: “अगर मुहम्मद ﷺ ने यह फ़रमाया है, तो बिल्कुल सच फ़रमाया है! मैं तो सुबह-शाम आसमान से आने वाली वही (आसमानी पैग़ाम) की तस्दीक़ करता हूँ, तो यह सफ़र उनके लिए क्या मुश्किल है!” इसी बिना पर हुज़ूर ﷺ ने आपको ‘अस्-सिद्दीक़’ (सबसे सच्चा) का लक़ब अता फ़रमाया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. शब-ए-मेअराज किस इस्लामी महीने और तारीख़ को हुई थी?
मशहूर इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़ वाक़या-ए-मेअराज रजबुल मुरज्जब की 27वीं शब को नुबुव्वत के दसवें या ग्यारहवें साल हिजरत से पहले पेश आया था।
2. इसरा (Isra) और मेअराज (Miraj) में क्या फ़र्क़ है?
मक्का (मस्जिद-ए-हराम) से बैतुल मुक़द्दस (मस्जिद-ए-अक़्सा) तक के ज़मीनी सफ़र को ‘इसरा’ कहा जाता है, और बैतुल मुक़द्दस से सात आसमानों और अर्श-ए-बरीं तक के आसमानी सफ़र को ‘मेअराज’ कहा जाता है।
3. मेअराज की रात उम्मत को क्या सबसे बड़ा तोहफ़ा मिला?
मेअराज की रात उम्मत-ए-मुहम्मदिया को पाँच वक़्त की नमाज़ का तोहफ़ा अता हुआ। अल्लाह तआला ने पाँच नमाज़ों पर पूरे पचास नमाज़ों के बराबर सवाब का वादा फ़रमाया।
4. क्या मेअराज का सफ़र जिस्मानी था या सिर्फ़ रूहानी?
अहले सुन्नत वल जमाअत के जमहूर उलेमा और मुफ़स्सिरों के मुताबिक़ रसूलुल्लाह ﷺ का इसरा व मेअराज का मुकद्दस सफ़र ब-ऐनही जिस्म और रूह दोनों के साथ बेदारी (जागते हुए) की हालत में हुआ था।