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वाक़या-ए-करबला हिंदी में | Waqia E Karbala In Hindi (हज़रत इमाम हुसैन की शहादत, पूरी तारीख़ व दर्दनाक दास्तान)

By Mariya Ansari •

इस्लामी तारीख़ का सबसे दिलदोज़, दर्दनाक और ईमान-अफ़रोज़ वाक़या ‘वाक़या-ए-करबला’ (Waqia E Karbala In Hindi) है। यह कोई आम जंग या ज़मीनी हुकूमत की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह हक़ (सत्य) और बातिल (असत्य), इंसाफ़ और ज़ुल्म, तथा शरीअत-ए-मुहम्मदी और यज़ीदी फासिक़ीयत के बीच का वह अज़ीम मार्का था जिसने क़यामत तक के लिए साबित कर दिया कि सर कटाया जा सकता है लेकिन बातिल के आगे सर झुकाया नहीं जा सकता।

10 मुहर्रमुल हराम सन 61 हिजरी (10 अक्टूबर 680 ईस्वी) को इराक़ की तपती रेत पर रसूलुल्लाह ﷺ के लाडले नवासे, ख़ातून-ए-जन्नत हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (रज़ि.) और मौला अली (रज़ि.) के लख़्त-ए-जिगर सय्यिदुना हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) ने अपने 72 जांनिसार साथियों और अहले-बैत के साथ भूखे-प्यासे रहकर अपनी जान अल्लाह की राह में क़ुरबान कर दी। इस विस्तृत लेख में हम वाक़या-ए-करबला की पूरी तारीख़, शहादत-ए-हुसैन और इसके सबक़ को आसान हिंदी में जानेंगे।

वाक़या-ए-करबला: ऐतिहासिक तथ्य संक्षेप में

तारीख़: 10 मुहर्रमुल हराम, 61 हिजरी (यौम-ए-आशूरा)
स्थान: करबला का मैदान, दरिया-ए-फ़ुरात के किनारे (मौजूदा इराक़)
हक़ का लश्कर: हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) और उनके 72 अहले-बैत व जांनिसार साथी
बातिल की फ़ौज: यज़ीद की 22,000 से 30,000 की हथियारबंद लश्कर (कमांड: उमर बिन साद व शिम्र)
मक़सद: इस्लाम के उसूलों, ख़िलाफ़त और शरीअत की पाकीज़गी की हिफ़ाज़त।

करबला की पृष्ठभूमि (Background): यज़ीद का तख़्त और बयअत का इनकार

हज़रत मुआविया (रज़ि.) के इंतिक़ाल के बाद उनके बेटे यज़ीद ने दमिश्क़ में जबरन सत्ता संभाली। यज़ीद एक बद-किरदार, ज़ालिम और शरीअत की पाबंदियों को तोड़ने वाला इंसान था। वह चाहता था कि रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) उसकी हुकूमत पर बयअत (स्वीकृति की मुहर) लगा दें।

हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) अच्छी तरह जानते थे कि अगर उन्होंने यज़ीद जैसे फासिक़ और ज़ालिम के हाथ पर बयअत कर ली, तो क़यामत तक इस्लाम का निज़ाम ख़त्म हो जाएगा और हर ज़ालिम अपनी मनमानी को दीन का हिस्सा बना लेगा। चुनांचे इमाम आली-मक़ाम ने साफ़ फ़रमा दिया: “मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे की बयअत कभी नहीं कर सकता!”

कूफ़ा वालों के ख़तूत और मदीने से करबला का सफ़र

जब यज़ीद के गवर्नर वलीद ने मदीना में दबाव बनाया, तो हज़रत इमाम हुसैन अपने ख़ानदान को लेकर मक्का मुकर्रमा तशरीफ़ ले गए। इसी दौरान कूफ़ा (इराक़) के लोगों ने हज़ारों ख़तूत भेजकर इमाम से दरख़्वास्त की कि आप कूफ़ा तशरीफ़ लाएं, हम आपकी कयादत में कुरआन व सुन्नत का निज़ाम क़ायम करेंगे।

इमाम हुसैन ने हक़ीक़त जानने के लिए अपने चचेरे भाई हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील (रज़ि.) को कूफ़ा भेजा। कूफ़ा के गवर्नर इब्ने ज़ियाद ने ज़ुल्म व लालच के ज़ोर पर कूफ़ा वालों को डरा दिया और हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील को बेदर्दी से शहीद कर दिया। बेख़बर इमाम हुसैन अपने छोटे बच्चों, बहनों और मुख़्तसर साथियों के साथ कूफ़ा की तरफ बढ़ रहे थे कि करबला के तपते सहरा में यज़ीदी फ़ौज ने उन्हें घेर लिया।

दरिया-ए-फ़ुरात पर पानी की बंदिश (7 मुहर्रम)

7 मुहर्रम को यज़ीदी लश्कर ने दरिया-ए-फ़ुरात के किनारे पहरा बैठा दिया ताकि इमाम के ख़ेमों तक पानी की एक बूंद भी न पहुंच सके। नबी ﷺ का वह घराना, जिसके सदक़े दुनिया को रहमत का जाम मिला, तीन दिनों तक रेगिस्तान की तपती धूप में प्यास की शिद्दत झेलता रहा। छोटे-छोटे मासूम बच्चे ‘अल-अतश, अल-अतश’ (प्यास! प्यास!) पुकारते रहे।

हज़रत इमाम हुसैन के वफ़ादार भाई हज़रत अब्बास अलमदार (रज़ि.) जब मासूम सकीना और बच्चों की प्यास न देख सके, तो वे मशकीज़ा लेकर दरिया पर गए। उन्होंने दरिया से पानी भरा, लेकिन खुद एक घूंट भी नहीं पिया क्योंकि इमाम और बच्चे प्यासे थे। वापसी पर यज़ीदी फ़ौज ने चारों तरफ से तीर बरसाए, उनके दोनों बाज़ू क़लम कर दिए गए और मशकीज़ा तीरों से छलनी हो गया। हज़रत अब्बास दरिया के किनारे शहीद हो गए।

10 मुहर्रम (आशूरा): अहले-बैत की दर्दनाक शहादतें

यौम-ए-आशूरा की सुबह हज़रत इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ नमाज़-ए-फ़ज्र अदा की। इसके बाद एक-एक करके जांनिसार मैदान में उतरे और अपनी जान क़ुरबान करते गए:

  • हज़रत अली अकबर (रज़ि.): इमाम हुसैन के 18 साला नौजवान बेटे, जिनकी सूरत व सीरत हुज़ूर ﷺ से मिलती-जुलती थी, सीने पर नैज़ा खाकर शहीद हुए।
  • हज़रत क़ासिम बिन हसन (रज़ि.): हज़रत इमाम हसन (रज़ि.) के 13 साला यतीम बेटे ने बेमिसाल शुजाअत दिखाते हुए जाम-ए-शहादत नोश किया।
  • हज़रत अली असग़र (रज़ि.): 6 महीने के मासूम बच्चे की प्यास से सूखती ज़बान देखकर इमाम हुसैन ने मैदान में लाकर यज़ीदियों से पानी मांगा। पाषाण-हृदय हरमला ने मासूम की नन्हीं गर्दन पर ज़हर बुझा तीन नोक वाला तीर चला दिया, जिससे असग़र अपने बाप के हाथों पर मुस्कुराते हुए शहीद हो गए।

हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) की अज़ीम शहादत

जब तमाम साथी और अहले-बैत शहीद हो गए, तो नबी का लाडला नवासा तन्हा मैदान में उतरा। भूख और प्यास की इंतिहा के बावजूद जब आपने तलवार उठाई तो यज़ीदी लश्कर में भगदड़ मच गई। इसी दौरान नमाज़-ए-अस्र का वक़्त हो गया। इमाम ने तलवार रोक दी और मैदान-ए-कर्बला में नमाज़ की नीयत बांध ली।

जैसे ही हज़रत इमाम हुसैन ने अपने परवरदिगार के सामने सजदे में अपना मुकद्दस सर रखा, बदबख़्त शिम्र ज़िलजौशन ने पीछे से खंजर चलाकर रसूलुल्लाह ﷺ के उस मुबारक़ सर को तन से जुदा कर दिया जिसे नबी अपनी गोद में बिठाकर चूमा करते थे। इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन।

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी (रह.) का मशहूर फ़ारसी कलाम:

شاہ است حُسین، بادشاہ است حُسین ۝ دیں است حُسین، دیں پناہ است حُسین ۝ سرداد، نداد دست در دستِ یزید ۝ حقا کہ بنائے لا الٰہ است حُسین ۝

तर्जुमा: “हुसैन सरदार हैं, हुसैन बादशाह हैं। हुसैन ही सच्चा दीन हैं और दीन के पनाहगाह हैं। अपना सर दे दिया लेकिन यज़ीद के हाथ में हाथ (बयअत) नहीं दिया। सच तो यह है कि ला इलाहा इल्लल्लाह की बुनियाद ही हुसैन हैं।”

करबला से इंसानियत के लिए 5 अज़ीम सबक़

  • हक़ के लिए सब कुछ क़ुरबान करना: सच्चाई और इंसाफ़ के रास्ते में जान और माल की परवाह न करना।
  • ज़ुल्म के सामने न झुकना: तादाद और ताक़त कितनी भी बड़ी हो, बातिल के आगे सर न झुकाना।
  • नमाज़ की पाबंदी: तीरों और नेज़ों की बारिश में भी सजदे को न छोड़ना।
  • सब्र और रज़ा-ए-इलाही: हर मुसीबत में अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी रहना और इस्तिरजा पढ़ना।
  • यज़ीदियत हमेशा मुर्दा है: यज़ीद अपनी ताक़त के बावजूद तारीख़ में लानती बन गया, और हुसैन (रज़ि.) कटी गर्दन के साथ भी दिलों के शहंशाह बने रहे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. वाक़या-ए-करबला कब और कहाँ हुआ था?

वाक़या-ए-करबला 10 मुहर्रमुल हराम सन 61 हिजरी (10 अक्टूबर 680 ईस्वी) को इराक़ में दरिया-ए-फ़ुरात के क़रीब करबला के तपते मैदान में हुआ था।

2. करबला में इमाम हुसैन के साथ कितने साथी शहीद हुए थे?

करबला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) के साथ उनके अहले-बैत और जांनिसार मिलाकर कुल 72 साथी शहीद हुए थे।

3. इमाम हुसैन ने यज़ीद की बयअत क्यों नहीं की?

यज़ीद ज़ालिम, फासिक़ और शरीअत की सीमाओं को तोड़ने वाला था। अगर नबी के नवासे उसकी बयअत कर लेते, तो तानाशाही और ज़ुल्म को इस्लामी मान्यता मिल जाती और हक़ का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाता।

4. आशूरा (10 मुहर्रम) के दिन क्या रोज़ा रखना चाहिए?

हाँ, 10 मुहर्रम (यौम-ए-आशूरा) का रोज़ा रखना सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। हदीस शरीफ़ के मुताबिक़ आशूरा का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है। सुन्नत यह है कि 9 और 10 या 10 और 11 मुहर्रम का दो रोज़ा रखा जाए।

Mariya Ansari
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Mariya Ansari

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