क़ुरआन मजीद अल्लाह तआला का वह मुक़द्दस कलाम है जो इंसान को ज़िंदगी जीने का तरीक़ा भी सिखाता है और मौत की हक़ीक़त से भी बा-ख़बर करता है। क़ुरआन करीम की एक ऐसी ही दिल को झकझोर देने वाली और हक़ीक़त बयां करने वाली आयत है — “कुल्लु नफ़्सिन ज़ाएक़तुल मौत” (كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ)।
अक्सर जब हम किसी के इंतिक़ाल की ख़बर सुनते हैं या क़ब्रिस्तान जाते हैं, तो यह आयत हमारी ज़बान पर आ जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस आयत का असल मतलब क्या है, अल्लाह तआला ने इसमें हमारे लिए क्या सबक़ रखा है और यह क़ुरआन की किन-किन सूरतों में आई है? आइए आज इस मुक़द्दस आयत के मायने, तफ़्सीर और इससे मिलने वाली नसीहत को आसान हिंदी में तफ़्सील से समझते हैं।
कुल्लु नफ़्सिन ज़ाएक़तुल मौत का हिंदी मतलब (Meaning in Hindi)
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ
उच्चारण (तल्फ़्फ़ुज़): कुल्लु नफ़्सिन ज़ाएक़तुल मौत (Kullu Nafsin Zaikatul Maut)
हिंदी तर्जुमा: “हर जानदार (प्राणी/नफ़्स) को मौत का मज़ा चखना है।”
सीधे और आसान अल्फ़ाज़ में इसका मतलब यह है कि इस पूरी कायनात में जिस भी चीज़ के अंदर जान (रूह) है — चाहे वह इंसान हो, जिन्नात हों, परिंदे हों या कोई भी मख़लूक़ — उन सबको एक न एक दिन मौत आनी तय है। दुनिया में कोई भी दौलत, ताक़त या ओहदा इंसान को मौत से नहीं बचा सकता।
लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ तर्जुमा (Word-by-Word Meaning)
अगर हम इस आयत के एक-एक लफ़्ज़ को अलग करके समझें, तो इसका मफ़हूम और भी ज़्यादा साफ़ हो जाता है:
| अरबी लफ़्ज़ | उच्चारण | हिंदी मानी (अर्थ) |
|---|---|---|
| كُلُّ (Kullu) | कुल्लु | हर एक / प्रत्येक / तमाम |
| نَفْسٍ (Nafsin) | नफ़्सिन | जान / रूह / जीवित प्राणी / इंसान |
| ذَائِقَةُ (Zaa-iqatu) | ज़ाएक़तु | चखने वाला / चखने वाली (स्वाद लेने वाली) |
| الْمَوْتِ (Al-Mawt) | अल-मौत | मौत / मृत्यु / इंतिक़ाल |
क़ुरआन करीम की किन-किन सूरतों में यह आयत आई है?
अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने क़ुरआन मजीद में इस अटल सच्चाई को 3 अलग-अलग सूरतों में बयान फ़रमाया है:
1. सूरह आले इमरान (आयत 185)
सूरह आले इमरान की यह आयत बहुत ही जामेअ है, जिसमें मौत के साथ-साथ आख़िरत की कामयाबी की भी बात कही गई है:
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۗ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۖ فَمَن زُحْزِحَ عَنِ النَّارِ وَأُدْخِلَ الْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ ۗ وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا مَتَاعُ الْغُرُورِ
हिंदी तर्जुमा: “हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है, और क़ियामत के दिन तुम्हें तुम्हारे आमाल के पूरे-पूरे बदले दिए जाएंगे। फिर जिसे जहन्नम की आग से बचा लिया गया और जन्नत में दाख़िल कर दिया गया, वही असल में कामयाब हुआ। और यह दुनियावी ज़िंदगी तो सिर्फ़ धोखे का सामान है।”
2. सूरह अल-अंबिया (आयत 35)
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۗ وَنَبْلُوكُم بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً ۖ وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ
हिंदी तर्जुमा: “हर नफ़्स को मौत का मज़ा चखना है। और हम तुम्हें बुराई (तकलीफ़) और भलाई (आसानी) दोनों के ज़रिए आज़माते हैं, और तुम सब हमारी ही तरफ़ लौटाए जाओगे।”
3. सूरह अल-अंकबूत (आयत 57)
كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ ۖ ثُمَّ إِلَيْنَا تُرْجَعُونَ
हिंदी तर्जुमा: “हर जानदार मौत का मज़ा चखने वाला है, फिर तुम सब हमारी ही तरफ़ पलट कर लाए जाओगे।”
मौत का ‘मज़ा चखना’ — इसका क्या मतलब है?
क़ुरआन पाक में यह नहीं कहा गया कि ‘हर इंसान ख़त्म हो जाएगा’, बल्कि लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ ‘ज़ाएक़ा’ (चखना)। इस्लामी उलमा और मुफ़स्सिरीन फ़रमाते हैं कि इसमें बहुत बड़ी हिकमत है:
- रूह कभी ख़त्म नहीं होती: जब कोई इंसान किसी चीज़ का ज़ायका चखता है, तो वह ख़ुद बाक़ी रहता है। इसी तरह मौत इंसान का आख़िरी ख़ात्मा नहीं है, बल्कि रूह जिस्म से अलग होकर क़ब्र (आलमे बरज़ख़) की ज़िंदगी में दाख़िल हो जाती है।
- अमीर और ग़रीब सब बराबर: दुनिया में कोई कितना ही दौलतमंद हो या कमज़ोर, मौत के सामने सब लाचार हैं। मलकुल मौत (मौत के फ़रिश्ते) के आने पर किसी को एक पल की भी मोहलत नहीं मिलती।
- दुनिया सिर्फ़ इम्तिहान है: जैसे इम्तिहान के बाद घंटी बजती है और पर्चा जमा हो जाता है, वैसे ही मौत इस इम्तिहान का वक़्त ख़त्म होने का ऐलान है।
इस आयत से हमें क्या सबक़ मिलता है?
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने फ़रमाया:
“लज़्ज़तों को ख़त्म करने वाली चीज़ — यानी मौत को कसरत से याद किया करो।” (तिर्मिज़ी शरीफ़)
जब एक मोमिन इस आयत को दिल से समझता है, तो उसकी ज़िंदगी में ये खूबसूरत बदलाव आते हैं:
- घमंड और तकब्बुर का ख़ात्मा: जब इंसान को मालूम हो कि एक दिन मिट्टी के नीचे सोना है, तो वह दूसरों को नीचा दिखाना और घमंड करना छोड़ देता है।
- तौबा में जल्दी: मौत का कोई तय वक़्त या उम्र नहीं होती। इसलिए अक़लमंद वही है जो हर दिन अपने गुनाहों की अल्लाह से तौबा करता रहे।
- तकलीफ़ों में सब्र: अगर दुनिया में कोई बीमारी या परेशानी आए, तो इंसान सब्र करता है कि यह दुनिया कुछ दिनों की है, असल सुकून तो जन्नत में मिलेगा।
- हलाल रिज़्क़ की पाबंदी: हराम के माल से बचना और अपनी नेक कमाई पर अल्लाह का शुक्र अदा करना।
किसी के इंतिक़ाल पर क्या पढ़ना चाहिए?
सुन्नत के मुताबिक़ जब भी किसी मुसलमान के इंतिक़ाल की ख़बर मिले या कोई सदमा पहुंचे, तो हमें यह दुआ पढ़नी चाहिए:
إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
“इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन”
तर्जुमा: “बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और हम सबको उसी की तरफ़ लौट कर जाना है।”
अगर आप इस दुआ की पूरी फ़ज़ीलत और तफ़्सीर जानना चाहते हैं, तो हमारा यह ख़ास लेख ज़रूर पढ़ें: इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन का मतलब और फ़ज़ीलत।
मुताल्लिक़ा ज़रूरी दुआएं और सूरह (Related Guides)
अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हिफ़ाज़त और बरकत के लिए इन अहम दुआओं और सूरतों को भी ज़रूर पढ़ें:
- सूरह यासीन हिंदी में पढ़ें (फ़ज़ीलत व तर्जुमा) — क़ुरआन का दिल कही जाने वाली सूरह यासीन।
- सफ़र की दुआ हिंदी में — सफ़र में हिफ़ाज़त और सलामती के लिए।
- घर से निकलने की दुआ — हर बला और परेशानी से महफ़ूज़ रहने के लिए।
- तवक्कुल का मतलब क्या है? — अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा करने का तरीक़ा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. ‘कुल्लु नफ़्सिन ज़ाएक़तुल मौत’ का आसान मतलब क्या है?
इसका सीधा सा अर्थ है कि “हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है।” यानी दुनिया में आने वाले हर इंसान और प्राणी का एक तय वक़्त पर इस दुनिया से जाना लाज़िमी है।
2. यह आयत क़ुरआन करीम के किस पारे में है?
यह आयत क़ुरआन करीम के पारा 4 (सूरह आले इमरान, आयत 185), पारा 17 (सूरह अल-अंबिया, आयत 35) और पारा 21 (सूरह अल-अंकबूत, आयत 57) में मौजूद है।
3. क्या मौत को याद रखने से मायूसी होती है?
जी नहीं, इस्लाम में मौत को याद रखना मायूसी नहीं, बल्कि ज़िंदगी को सही तरीक़े से जीने का ज़रिया है। मौत को याद रखने से इंसान बुरे कामों से बचता है, दूसरों का हक़ नहीं मारता और नेकियों में आगे बढ़ता है।
दुआ और निष्कर्ष
कुल्लु नफ़्सिन ज़ाएक़तुल मौत हमें यह पैग़ाम देता है कि ज़िंदगी बहुत मुख़्तसर है। हमें अपनी ज़िंदगी को अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की फ़रमाबरदारी में गुज़ारना चाहिए।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हम सबको नेक आमाल करने, हलाल रोज़ी कमाने, गुनाहों से बचने और जब भी हमारी मौत आए तो हम सबका ख़ातमा ईमान की सलामती (ख़ातमा बिल-ईमान) पर फ़रमाए। आमीन या रब्बल आलमीन!